उत्तर प्रदेश में 16 साल बाद होने जा रही जनगणना 2027 को लेकर प्रशासनिक तैयारियां अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी हैं. लेकिन इसी बीच जातिगत जनगणना को लेकर सियासी बहस भी तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने BJP पर तीखा हमला बोलते हुए इसे “जुमला” करार दिया है और आरोप लगाया है कि जनगणना की अधिसूचना में जाति का कॉलम ही नहीं है.
प्रशासनिक तैयारियों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच जनगणना 2027 उत्तर प्रदेश में एक बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक इवेंट के रूप में उभर रही है. उत्तर प्रदेश में जनगणना दो मुख्य चरणों में होगी. पहला चरण हाउस-लिस्टिंग और हाउसिंग जनगणना का होगा, जो इसी साल पूरा किया जाएगा.
इसके बाद 2027 की शुरुआत में जनसंख्या गणना की जाएगी. गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 के बीच 30 दिनों की एक तय विंडो में हाउस-लिस्टिंग ऑपरेशन पूरा किया जाए. इसी के तहत उत्तर प्रदेश ने 22 मई से 20 जून 2026 के बीच यह प्रक्रिया पूरी करने का फैसला किया है.
राज्य में इस विशाल अभियान के लिए करीब 5.5 लाख एन्यूमरेटर (प्रगणक) और एन्यूमरेटर सुपरवाइजर को प्रशिक्षण दिया जा रहा है. जनगणना संचालन निदेशालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, जनवरी के दूसरे हफ्ते में उत्तर प्रदेश के आठ अधिकारियों ने दिल्ली में “नेशनल ट्रेनर” के रूप में अपनी ट्रेनिंग पूरी कर ली है. ये नेशनल ट्रेनर आगे लगभग 300 मास्टर ट्रेनर को प्रशिक्षित कर रहे हैं. मास्टर ट्रेनर करीब 7,000 फील्ड ट्रेनर तैयार करेंगे और यही फील्ड ट्रेनर आखिर में उन लाखों एन्यूमरेटर और सुपरवाइजर को ट्रेनिंग देंगे, जो गांव-गांव और शहर-शहर जाकर जनगणना का वास्तविक काम करेंगे. व्यवस्था के तहत हर छह एन्यूमरेटर पर एक सुपरवाइजर तैनात किया जाएगा, ताकि डेटा की गुणवत्ता और निगरानी सुनिश्चित की जा सके.
हाउस-लिस्टिंग चरण जनगणना की बुनियाद माना जाता है. इस चरण में राज्य के हर ढांचे का घर-घर जाकर सर्वे किया जाएगा. एन्यूमरेटर यह दर्ज करेंगे कि इमारत का उपयोग किस लिए हो रहा है, वह कच्ची है या पक्की, निर्माण में कौन-सी सामग्री इस्तेमाल हुई है, कमरों की संख्या कितनी है और मकान मालिकाना है या किराए का. इसके अलावा पेयजल, बिजली, शौचालय, रसोई ईंधन, गंदे पानी की निकासी, स्नान की सुविधा जैसी बुनियादी सुविधाओं का ब्योरा लिया जाएगा. संपत्तियों के रूप में मोबाइल फोन, इंटरनेट, रेडियो, टीवी, साइकिल, दोपहिया और चारपहिया वाहनों की उपलब्धता भी दर्ज होगी.
इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी. एन्यूमरेटर स्मार्टफोन पर एक विशेष मोबाइल एप के जरिए डेटा भरेंगे. हाल ही में बुलंदशहर जिले की अनूपशहर तहसील, बहराइच जिले की मिहीनपुरवा तहसील और प्रयागराज नगर निगम के कुछ वार्डों में इसका प्री-टेस्ट किया गया. अधिकारियों के मुताबिक यह अभ्यास एक फुल-ड्रेस रिहर्सल जैसा था, जिसमें तय इलाकों में जाकर घरों का सर्वे किया गया और मोबाइल एप पर डेटा सफलतापूर्वक अपलोड किया गया. एप में ऑफलाइन मोड की सुविधा भी होगी, ताकि इंटरनेट न होने की स्थिति में भी डेटा संग्रह प्रभावित न हो और बाद में सुरक्षित रूप से अपलोड किया जा सके.
प्रशासनिक स्तर पर भी कई अहम फैसले किए गए हैं. हाउस-लिस्टिंग से पहले राज्य की सभी प्रशासनिक इकाइयों को 31 दिसंबर 2025 तक फ्रीज कर दिया गया है. 1 जनवरी 2026 से 31 मार्च 2027 तक किसी भी जिले, तहसील, नगर पालिका, ग्राम या स्थानीय निकाय की सीमा में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनगणना के दौरान क्षेत्रीय सीमाओं को लेकर कोई भ्रम या विवाद न हो. जनवरी में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव एस. पी. गोयल की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय जनगणना समन्वय समिति की बैठक हुई. इस बैठक में जनगणना के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती, प्रशिक्षण और फील्डवर्क से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई थी.
बैठक में निदेशक (जनगणना संचालन) शीतल वर्मा ने बताया कि पहली बार नागरिकों को स्व-गणना की सुविधा भी दी जाएगी, ताकि जो लोग चाहें, वे खुद अपनी जानकारी डिजिटल माध्यम से दर्ज कर सकें. राज्य में सामान्य प्रशासन विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है, जो अन्य विभागों के साथ समन्वय करेगा.
जनगणना 2027 का दूसरा बड़ा चरण जनसंख्या गणना का होगा, जो 9 फरवरी से 28 फरवरी 2027 के बीच पूरा किया जाना प्रस्तावित है. इस चरण में हर घर के प्रत्येक सदस्य से जुड़ी विस्तृत जानकारी जुटाई जाएगी. इसमें उम्र, लिंग, शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, प्रवासन, धर्म, भाषा, जाति और विकलांगता जैसी जानकारियां शामिल होंगी. इसके बाद मार्च 2027 में रिवीजन का चरण होगा, जिसमें पहले से भरी गई सूचनाओं की जांच की जाएगी और जन्म या मृत्यु जैसी घटनाओं को अपडेट किया जाएगा.
इस बार जनगणना में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा. पहली बार लोगों से उनके खानपान से जुड़ा सवाल पूछा जाएगा. हर परिवार से यह जानकारी ली जाएगी कि उनकी थाली में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला अनाज कौन-सा है. इसमें चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा, मक्का या अन्य अनाज के विकल्प दिए जाएंगे. अधिकारियों के मुताबिक इसका मकसद क्षेत्रीय जरूरतों के हिसाब से भविष्य की योजनाओं को बेहतर बनाना है, खासकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली और पोषण से जुड़े कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी बनाने में यह डेटा मददगार होगा.
प्रदेश में इस विशाल अभ्यास के लिए पांच लाख से ज्यादा कर्मचारियों की तैनाती की जाएगी. पहले चरण में करीब साढ़े चार लाख प्रगणक लगाए जाएंगे, जिनमें बड़ी संख्या में शिक्षक और अन्य विभागों के कर्मचारी शामिल होंगे. इनके काम की निगरानी के लिए लगभग 75 हजार सुपरवाइजर तैनात किए जाएंगे. एक प्रगणक को 30 दिनों में औसतन 150 घर या लगभग 800 आबादी की गणना करनी होगी. सरकार ने मानदेय भी तय कर दिया है. पहले चरण के लिए 9 हजार रुपये और दूसरे चरण के लिए 16 हजार रुपये दिए जाएंगे.
इसी बीच जनगणना को लेकर राजनीतिक माहौल भी गर्म है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जातिगत जनगणना को लेकर BJP पर सीधा हमला बोला है. उन्होंने कहा है कि जातीय जनगणना BJP का सिर्फ एक जुमला है और जनगणना की अधिसूचना में जाति का कॉलम तक नहीं है. अखिलेश यादव का आरोप है कि BJP का फार्मूला साफ है. न गिनती होगी और न ही आनुपातिक आरक्षण और अधिकार देने का कोई ठोस जनसांख्यिकीय आधार बनेगा. उनके मुताबिक जातिगत जनगणना न कराना पीडीए समाज के खिलाफ साजिश है और जब इस पर विरोध होगा तो BJP इसे टाइपिंग मिस्टेक बताकर पल्ला झाड़ लेगी.
अखिलेश यादव के बयान के बाद सियासी बहस और तेज हो गई है. विपक्ष का कहना है कि अगर जाति से जुड़े सवाल स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किए गए तो सामाजिक न्याय और नीति निर्माण के लिए जरूरी डेटा अधूरा रह जाएगा. वहीं सरकार और प्रशासन का तर्क है कि जनगणना एक तय संवैधानिक प्रक्रिया है और इसमें शामिल प्रश्न केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित प्रारूप के अनुसार होंगे.
जातिगत जनगणना को लेकर उठ रहे सवाल इस प्रक्रिया को राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम बना रहे हैं. आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि जनगणना के आंकड़े नीतिगत फैसलों और सियासी विमर्श को किस दिशा में ले जाते हैं.

