बजट भाषण आम तौर पर खर्च, कर्ज, कर और योजनाओं के सूखे आंकड़ों का दस्तावेज होता है. लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार के दूसरे कार्यकाल, यानी योगी 2.0 के पांच वर्षों में विधानसभा ने इन आंकड़ों के साथ काफिया भी सुना. सदन में राजकोषीय घाटे, पूंजीगत व्यय और विकास योजनाओं के बीच शेर, शायरी, चौपाइयों और कविताओं की गूंज भी रही. इस अलग रंग के केंद्र में रहे प्रदेश के वित्त मंत्री सुरेश खन्ना.
साल 2022 से 2026 तक पेश किए गए पांचों बजटों में उन्होंने जिस अंदाज में वित्तीय दस्तावेज को काव्यात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ा, उसने उन्हें महज एक प्रशासकीय मंत्री नहीं, बल्कि खर्च, कर्ज और काफिया को साथ लेकर चलने वाले ‘शायराना वित्त मंत्री’ की पहचान दे दी.
26 मई 2022 को जब योगी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट पेश हुआ, तब सुरेश खन्ना ने शुरुआत ही कविता से की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व की तारीफ करते हुए उन्होंने पढ़ा, “वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जिस पथ पर बिखरे शूल न हों...” यह संकेत था कि आगे की राह चुनौतियों से भरी है, लेकिन सरकार उसे अवसर में बदलेगी. इसी भाषण में गृह विभाग और कानून व्यवस्था पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “जब तलक भोर का सूरज नजर नहीं आता, काम मेरा है उजालों की हिफाजत करना...” यह शेर सिर्फ अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई का संदेश नहीं था, बल्कि सरकार की छवि को एक सख्त और सतर्क शासन के रूप में स्थापित करने की कोशिश भी था.
बजट भाषण के अंत में उन्होंने उम्मीद जताई, “तेरे जुनूं का नतीजा जरूर निकलेगा, इसी स्याह समंदर से नूर निकलेगा.” ये पंक्तियां राजनीतिक संदेश और भावनात्मक अपील, दोनों का मिश्रण थीं.
अगले साल 22 फरवरी 2023 को पेश बजट होली से पहले आया था. उस समय सुरेश खन्ना ने बजट को प्रदेश की खुशहाली की सौगात बताते हुए कविता पढ़ी, “सुधर गई है कानून व्यवस्था, उद्योगों की अलख जगी...”. विपक्ष पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा, “फकत किनारे बैठे-बैठे लहरों से मत सवाल कर, डूब के खुद गहरे पानी में पानी का फलसफा समझ.” सदन में यह सिर्फ व्यंग्य नहीं था, बल्कि विपक्ष को चुनौती भी थी. संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग की घोषणाओं के दौरान उन्होंने राष्ट्रवादी भावनाओं को स्वर दिया, “मैं पंछी तूफानों से राह बनाता...”. बजट के अंत में उन्होंने कटाक्ष किया था, “हमने तो समंदर के रुख बदले हैं... आपने कहा था कुछ नहीं होगा, हमने आपके भी सोचने के तरीके बदले हैं.” यह शायरी सत्ता के आत्मविश्वास का प्रदर्शन थी.
अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठता के बाद 5 फरवरी 2024 को बजट पेश करते हुए सुरेश खन्ना ने रामचरितमानस की चौपाई से शुरुआत की थी. “जिमि सरिता सागर महुं जाहीं...” का पाठ कर उन्होंने कहा कि जो धर्म के अनुकूल चलता है, उसके पास संपत्ति स्वयं चली आती है. जब उन्होंने कहा कि प्रदेश का शासन कहीं न कहीं रामराज्य की अवधारणा से प्रेरित है, तो सदन में “जय श्रीराम” के नारे गूंज उठे थे. बजट भाषण के अंत में खन्ना ने ये लाइनें कहीं -
"तुम्हारी शख्सियत से ये सबक लेगी नई नस्लें,
वही मंजिल पर पहुंचा है, जो अपने पांव चलता है
डूबो देता है कोई नाम तक भी खानदानों का,
किसी के नाम से मशहूर होकर गांव चलता है..."
दिलचस्प बात यह रही कि इस अंतिम शायरी पर वित्तमंत्री ने तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अखिलेश यादव की ओर इशारा करते हुए तंज कसा था. इस शायरी पर सीएम योगी ने भी हंसते हुए खन्ना की पीठ थपथपाई थी.
20 फरवरी 2025 को पेश नौवें बजट में सुरेश खन्ना ने सवा घंटे के भाषण में 11 बार शेर या श्लोक का सहारा लिया. शुरुआत में मुख्यमंत्री को समर्पित चार पंक्तियां पढ़ीं, “इस धरा से हर अंधेरे को मिटाकर, सूर्य का पर्याय बनना चाहता हूं...”. इसके बाद मानस की चौपाई और प्रयागराज महाकुंभ से जुड़ा श्लोक पढ़कर उन्होंने धार्मिक-सांस्कृतिक संदर्भों को बजट विमर्श का हिस्सा बनाया था. अंत में उन्होंने कहा था, “मेरी तो निगाहें हैं सूरज के ठिकानों तक.” यह पंक्ति सरकार की महत्वाकांक्षा को रेखांकित करती थी।
11 फरवरी 2026 को योगी 2.0 का आखिरी बजट पेश करते हुए भी सुरेश खन्ना ने परंपरा कायम रखी. “काबिले तारीफ है अंदाज एक-एक काम का...” पढ़ते हुए उन्होंने सरकार की उपलब्धियों का बखान किया. मुख्यमंत्री के संकल्प को शब्द देते हुए कहा, “यही जुनून, यही ख्वाब मेरा है, दिया जला के रोशनी कर दूं जहां अंधेरा है.” अंत में उन्होंने सदन में मौजूद लोगों को नसीहत देते हुए कहा, “पोंछ सकते हो तो दुखियों के पोंछ लो आंसू, न जिएं आप फकत अपनी ही खुशी के लिए.”
सुरेश खन्ना उत्तर प्रदेश की राजनीति का जाना-पहचाना चेहरा हैं. शाहजहांपुर से लगातार 9 बार विधायक खन्ना को संगठन और शासन, दोनों का लंबा अनुभव है. वे BJP के वरिष्ठ नेताओं में गिने जाते हैं. यूपी में संसदीय कार्य मंत्री और वित्त मंत्री के तौर पर उनकी खासियत यह रही कि उन्होंने वित्त जैसे गंभीर और जटिल विषय को भी संवाद की भाषा में ढालने की कोशिश की.
सुरेश खन्ना की शायरी और कविताओं के प्रति रुचि नई नहीं है. सदन में उनके भाषणों में अक्सर साहित्यिक उद्धरण सुनाई देते रहे हैं. रामचरितमानस, संस्कृत श्लोक, हिंदी कविता और उर्दू शायरी का मिश्रण उनके भाषणों की खास पहचान बन चुका है. वे अक्सर प्रसंगानुकूल पंक्तियां चुनते हैं, जिससे विषय और भाव का तालमेल बना रहे. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह शैली कई स्तरों पर काम करती है. पहला, इससे भाषण रोचक बनता है और लंबे सत्र में सदन का ध्यान बना रहता है. दूसरा, यह सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों के जरिए एक वैचारिक संदेश भी देती है. तीसरा, विपक्ष पर कटाक्ष भी अपेक्षाकृत हल्के लेकिन असरदार तरीके से हो जाता है.
सदन में सत्ता पक्ष की मेज थपथपाहट और कभी-कभी विपक्ष की भी “वाह-वाह” इस बात का संकेत रही कि यह शैली ध्यान खींचने में सफल रही. हालांकि आलोचकों का एक वर्ग यह भी कहता है कि बजट जैसे गंभीर विषय में कविता की अधिकता मुद्दों की गहराई से ध्यान भटका सकती है. लेकिन समर्थकों के लिए यह प्रशासन और अभिव्यक्ति का संतुलन है.

