लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती 42 वर्षीय मरीज के परिजनों को डॉक्टरों ने तुरंत ब्लड की जरूरत बताई. परिवार शहर के एक चैरिटेबल ब्लड बैंक पहुंचा, जहां बिना ज्यादा सवाल-जवाब के कुछ ही घंटों में खून उपलब्ध करा दिया गया.
बाद में इलाज के दौरान मरीज में संक्रमण के लक्षण दिखे, तो डॉक्टरों ने शक जताया कि चढ़ाया गया रक्त पूरी तरह जांचा हुआ नहीं था. बात प्रशासनिक जांच तक पहुंची तो शक सही साबित हुआ और इसके बाद ब्लड बैंक कार्रवाई की जद में आकर सील कर दिया गया.
यह कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों में ब्लड बैंकों के संचालन को लेकर गहराती अव्यवस्था की एक झलक है.
हाल ही में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) द्वारा चलाए गए विशेष अभियान ने इस पूरे तंत्र की पोल खोल दी. मार्च के अंतिम हफ्ते में लखनऊ और कानपुर में कुल 38 ब्लड सेंटरों की जांच की गई, जिनमें गंभीर अनियमितताएं सामने आने पर कई केंद्रों के संचालन पर तत्काल रोक लगा दी गई. लखनऊ के सात और कानपुर के कई ब्लड सेंटरों पर कार्रवाई इस बात का संकेत है कि समस्या सिस्टम के भीतर गहराई तक फैली हुई है.
जिलों में फैली गड़बड़ियों का पैटर्न
पिछले एक वर्ष में लखनऊ के अलावा कानपुर, मेरठ, वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर और आगरा जैसे बड़े जिलों में भी ब्लड बैंकों की जांच के दौरान एक जैसी खामियां सामने आई हैं. फरवरी 2025 में लखनऊ के हैदरगंज, दुबग्गा और श्रृंगार नगर स्थित केंद्रों पर छापेमारी में डोनर रिकॉर्ड, स्टोरेज और स्क्रीनिंग में गंभीर अनियमितताएं मिलीं. कानपुर में हालिया जांच के दौरान कई ब्लड बैंकों में स्टॉक रजिस्टर अधूरे मिले और यह तक स्पष्ट नहीं था कि खून कहां से आया और किसे दिया गया. मेरठ और वाराणसी में भी निरीक्षण के दौरान पाया गया कि कई केंद्रों के पास लाइसेंस तो है, लेकिन जरूरी उपकरण या प्रशिक्षित स्टाफ उपलब्ध नहीं है.
प्रयागराज और गोरखपुर में स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्टों के अनुसार, कई निजी ब्लड बैंक बिना नियमित निरीक्षण के वर्षों से संचालित हो रहे हैं. आगरा में कुछ मामलों में ब्लड स्टोरेज के मानकों का पालन नहीं किया गया, जिससे रक्त की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हुए. यह पैटर्न बताता है कि समस्या किसी एक जिले या शहर तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में फैले एक ढीले नियामक ढांचे का परिणाम है.
खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन के एक अधिकारी बताते हैं, “जांच में जो तस्वीर सामने आई, वह चौंकाने वाली है. कई ब्लड बैंकों में न तो डोनर का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध था, न ही यह स्पष्ट था कि खून कहां से आया और किस मरीज को दिया गया. नियमानुसार हर यूनिट रक्त का पूरा ब्यौरा दर्ज होना चाहिए, जिसमें डोनर की पहचान, उसकी स्वास्थ्य जांच और प्राप्तकर्ता का विवरण शामिल होता है. लेकिन कई केंद्रों में स्टॉक रजिस्टर और डोनर रिकॉर्ड अधूरे या गायब मिले.”
लखनऊ में करीब 60 ब्लड बैंक संचालित हो रहे हैं, जिनमें से 29 निजी या चैरिटेबल संस्थाओं द्वारा चलाए जा रहे हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से आधे से ज्यादा ब्लड बैंकों के पास अपना कोई अस्पताल तक नहीं है. इसके बावजूद ये बड़े पैमाने पर रक्त संग्रह और आपूर्ति कर रहे हैं. यह स्थिति नियमों के सीधे उल्लंघन की ओर इशारा करती है, क्योंकि ब्लड बैंक संचालन के लिए प्रशिक्षित स्टाफ, चिकित्सकीय निगरानी और आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता अनिवार्य है.
मानकों का खुला उल्लंघन
ब्लड बैंक संचालन के लिए स्पष्ट नियम हैं. हर यूनिट रक्त की एचआईवी, हेपेटाइटिस बी-सी और अन्य संक्रमणों की जांच अनिवार्य है. डोनर का पूरा विवरण, उसकी मेडिकल हिस्ट्री और प्राप्तकर्ता का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना जरूरी होता है. लेकिन जांच में पाया गया कि कई केंद्रों में डोनर का आधार या पहचान विवरण दर्ज नहीं था. रक्त की स्क्रीनिंग अधूरी या संदिग्ध थी, स्टोरेज के लिए आवश्यक तापमान नियंत्रण प्रणाली ठीक से काम नहीं कर रही थी और योग्य पैथोलॉजिस्ट व तकनीशियन अनुपस्थित थे.
किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के एक वरिष्ठ विशेषज्ञ बताते हैं, “रक्त चढ़ाने से पहले उसकी स्क्रीनिंग बेहद जरूरी होती है. अगर जांच में किसी तरह की चूक होती है, तो इससे हेपेटाइटिस बी, सी या अन्य गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. यह मरीज की जान तक ले सकता है.” सबसे चिंताजनक पहलू प्रोफेशनल डोनर का बढ़ता नेटवर्क है. कई जिलों में जांच के दौरान यह सामने आया कि निजी ब्लड बैंक पैसे देकर बार-बार रक्त देने वाले लोगों से खून ले रहे हैं.
स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, “एक प्रोफेशनल डोनर को 500 से 1000 रुपए तक दिए जाते हैं, जबकि उसी रक्त को प्रोसेसिंग और अन्य शुल्क के नाम पर मरीज से 1500 से 3000 रुपए या उससे अधिक वसूला जाता है.” यह सीधा आर्थिक शोषण है, जिसमें न तो डोनर की सेहत की परवाह की जाती है और न ही मरीज की सुरक्षा की.
ब्लड बैंकिंग का आर्थिक गणित
प्रदेश में ब्लड बैंकिंग अब एक बड़ा आर्थिक नेटवर्क बन चुका है. अगर मोटे तौर पर आंकड़ों से समझें तो एक यूनिट रक्त की प्रोसेसिंग लागत लगभग 300 से 500 रुपए होती है. मरीज से उसी यूनिट के लिए 1500 से 2500 रुपए तक वसूले जाते हैं. कंपोनेंट (प्लाज्मा, प्लेटलेट्स) अलग-अलग बेचने पर यह लागत 4000 से 5000 रुपए तक पहुंच जाती है.
लखनऊ जैसे शहर में यदि प्रतिदिन औसतन 1000 यूनिट रक्त की खपत मानी जाए, तो सिर्फ एक शहर में ही यह कारोबार रोजाना 15 से 25 लाख रुपए तक पहुंच सकता है. पूरे प्रदेश में यह आंकड़ा करोड़ों रुपए प्रतिदिन तक जाता है. यही वजह है कि कई निजी ब्लड बैंक नियमों की अनदेखी कर अधिक से अधिक संग्रह और सप्लाई पर जोर देते हैं. FSDA के सहायक आयुक्त बृजेश कुमार सिंह का कहना है, “निरीक्षण में जिन केंद्रों पर गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है. नोटिस जारी किए गए हैं और कई लाइसेंस निलंबित किए गए हैं. अगर सुधार नहीं होता, तो लाइसेंस रद्द करने और एफआईआर दर्ज करने जैसी कार्रवाई भी होगी.”
विभागों के बीच उलझी जांच
समस्या सिर्फ निगरानी की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि विभागों के बीच जिम्मेदारी का बंटवारा भी इस अव्यवस्था को बढ़ा रहा है. रक्तदान शिविर लगाने की अनुमति स्वास्थ्य विभाग देता है, जबकि गुणवत्ता की जांच ड्रग विभाग के जिम्मे है. लाइसेंस का जिम्मा एक अलग विभाग का है. ऐसे में समन्वय की कमी के कारण निगरानी कमजोर हो जाती है. जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. एके सिंघल के मुताबिक, “हमारा काम सिर्फ कैंप की अनुमति देना है, मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी दूसरे विभाग की है.”
इस ढीले-ढाले सिस्टम का सीधा फायदा निजी ब्लड बैंक उठा रहे हैं. वे कैंप लगाने की अनुमति लेकर मनमाने तरीके से डोनर जुटाते हैं और बिना पर्याप्त जांच के रक्त की आपूर्ति करते हैं. कई मामलों में यह भी सामने आया है कि ब्लड बैंक कैंप की सूचना तो देते हैं, लेकिन मौके पर कोई अधिकारी निरीक्षण के लिए नहीं पहुंचता. विशेषज्ञों के अनुसार, असुरक्षित रक्त चढ़ाने से मरीजों को हेपेटाइटिस बी, सी, एचआईवी और अन्य संक्रमणों का खतरा होता है. कई मामलों में यह संक्रमण तुरंत सामने नहीं आता, बल्कि महीनों बाद पता चलता है. लखनऊ के एक वरिष्ठ चिकित्सक बताते हैं, “कई बार मरीज की हालत बिगड़ने पर जांच में पता चलता है कि संक्रमण ब्लड ट्रांसफ्यूजन से हुआ है. यह बेहद गंभीर स्थिति है.”
लगातार दोहराई जा रही गलतियां
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक ब्लड बैंकिंग को पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इस तरह की गड़बड़ियों पर लगाम लगाना मुश्किल होगा. हर यूनिट रक्त की “ट्रेसबिलिटी” सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि रक्त कहां से आया और किसे दिया गया. पिछले साल भी इसी तरह की कार्रवाई में कई लोगों को जेल भेजा गया था और कुछ ब्लड बैंकों के लाइसेंस रद्द किए गए थे.
इसके बावजूद स्थिति में बहुत ज्यादा सुधार नहीं हुआ है. जब तक जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी और नियमित निगरानी नहीं होगी, तब तक ऐसे केंद्रों पर लगाम लगाना मुश्किल है. ब्लड बैंक में काम करने वाले तकनीशियन राजीव वर्मा बताते हैं, “आपातकालीन स्थितियों में परिजन बिना ज्यादा जांच-पड़ताल के उपलब्ध विकल्प पर भरोसा कर लेते हैं, जिसका फायदा अनियमितताएं करने वाले केंद्र उठाते हैं.”

