उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह महीने का समय ही बचा है लेकिन बड़ी जद्दोजहद के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने संगठन के स्तर पर अपनी सबसे बड़ी चुनावी तैयारी शुरू कर दी है. पिछले वर्ष 14 दिसंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह क्षेत्र गोरखपुर से सटे महाराजगंज के सांसद और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी को प्रदेश BJP का अध्यक्ष बनाया गया था.
लगभग छह महीने की कवायद, लखनऊ और दिल्ली के बीच कई दौर की बैठकों तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल के बीच लगातार मंथन के बाद 25 जून को नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी गई. यह केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं है. BJP ने इसके जरिए 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अपनी राजनीतिक रणनीति का पहला स्पष्ट संकेत दिया है.
नई टीम में युवाओं को आगे लाने, गैर-यादव ओबीसी पर विशेष फोकस, क्षेत्रीय संतुलन साधने और भविष्य के नेतृत्व को तैयार करने की कोशिश दिखाई देती है. लेकिन इसी टीम के भीतर कई ऐसे फैसले भी हैं जिन्होंने पार्टी के अंदर ही सवाल खड़े कर दिए हैं.
युवा चेहरों के जरिए पीढ़ी परिवर्तन का संदेश
नई कार्यकारिणी में 32 नए चेहरों को शामिल किया गया है. बड़ी संख्या में पदाधिकारी 40 से 45 वर्ष की आयु वर्ग के हैं. प्रदेश संगठन में लंबे समय से सक्रिय रहे नीरज सिंह को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बेटे होने के बावजूद संगठन में उनकी सक्रियता और चुनावी प्रबंधन में भूमिका को इस जिम्मेदारी का आधार बताया जा रहा है. इसी तरह समाजवादी पार्टी से निकाली गईं पूजा पाल को भी प्रदेश उपाध्यक्ष बनाकर BJP ने दलित राजनीति को नया संदेश देने की कोशिश की है. प्रयागराज की राजनीति में राजू पाल हत्याकांड के बाद बनी उनकी पहचान आज भी प्रभावशाली मानी जाती है. BJP मानती है कि पूर्वांचल के दलित वोटरों के बीच उनका राजनीतिक संदेश असर डाल सकता है.
सबसे महत्वपूर्ण फैसला अभिजात मिश्रा को प्रदेश महामंत्री बनाना माना जा रहा है. संगठन में सचिव से सीधे महामंत्री बनना केवल पदोन्नति नहीं बल्कि भविष्य के नेतृत्व में निवेश माना जा रहा है. BJP में प्रदेश महामंत्री संगठन संचालन, चुनावी रणनीति और राजनीतिक समन्वय का सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता है.
ओबीसी समीकरण पर सबसे बड़ा दांव
यदि पूरी कार्यकारिणी का सामाजिक विश्लेषण किया जाए तो BJP ने सबसे अधिक महत्व अन्य पिछड़ा वर्ग को दिया है. कुल प्रमुख पदाधिकारियों में लगभग 30 ओबीसी नेताओं को जगह मिली है जबकि सामान्य वर्ग के 27, अनुसूचित जाति के छह और अनुसूचित जनजाति का एक प्रतिनिधि शामिल है. विशेष बात यह है कि BJP ने यादवों के बजाय गैर-यादव ओबीसी समुदायों पर ज्यादा भरोसा जताया है.
लोध, शाक्य, कुर्मी, सैनी, निषाद, मौर्य, कश्यप और अन्य पिछड़ी जातियों के नेताओं को प्रमुख जिम्मेदारियां देकर BJP ने समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) अभियान का राजनीतिक जवाब देने की कोशिश की है. राजनीतिक विश्लेषक प्रो. ए.के. वर्मा के मुताबिक BJP जानती है कि 2022 की जीत का सबसे बड़ा आधार गैर-यादव ओबीसी थे. यदि यह सामाजिक गठबंधन बरकरार रहता है तो विपक्ष के लिए BJP को चुनौती देना आसान नहीं होगा. इसलिए नई कार्यकारिणी में यही वर्ग सबसे ज्यादा दिखाई देता है.
सवर्णों को भी साधने की कोशिश
ओबीसी पर फोकस के बावजूद BJP ने ब्राह्मण और क्षत्रिय नेतृत्व को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया. ब्राह्मणों के दर्जन भर चेहरे समायोजित किए गए हैं. इनमें ब्रज बहादुर, अभिजात मिश्रा, अर्चना मिश्रा शामिल हैं. सात क्षत्रिय पदाधिकारियों को भी जगह दी गई है. इसके अलावा पांच भूमिहार, दो वैश्य और एक कायस्थ को भी शामिल किया गया है.
हालांकि कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र में अगड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व कम होने से स्थानीय स्तर पर असंतोष की चर्चा शुरू हो गई है. पूर्व प्रदेश उपाध्यक्ष मानवेंद्र सिंह, सलिल विश्नोई और कमलावती सिंह जैसे नेताओं को बाहर किए जाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. यूपी BJP के एक वैश्य नेता अपनी बिरादरी का प्रदेश कार्यकारिणी में कम प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतित हैं. पार्टी के एक वैश्य नेता बताते हैं, “पिछले काफी समय से वैश्य समाज पर काफी आर्थिक चोट पहुंची है. इसके बावजूद यह समाज लगातार BJP के साथ खड़ा रहा है. यूपी BJP की कार्यकारिणी में वैश्य नेताओं को प्रमुखता न मिलने से अगले विधानसभा चुनाव में इनका समर्थन पाने के लिए कुछ ज्यादा ही जोर लगाना पड़ेगा.
पश्चिमी उत्तर प्रदेश को मिला मिला-जुला संदेश
2027 के चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश निर्णायक क्षेत्र माना जा रहा है. किसान आंदोलन, जाट राजनीति, राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन और समाजवादी पार्टी की सक्रियता को देखते हुए BJP के सामने यहां सबसे बड़ी चुनौती है. इसके बावजूद प्रदेश महामंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से किसी नेता को जगह नहीं मिली. इससे क्षेत्र के नेताओं में नाराजगी की चर्चा है.
हालांकि BJP ने दूसरी ओर जाट और गुर्जर दोनों समुदायों को साधने की कोशिश की है. सुरेश राणा की संगठन में वापसी, मोहित बेनीवाल को दोबारा जिम्मेदारी, देवेंद्र सिंह को किसान मोर्चे का प्रदेश अध्यक्ष तथा नवाब सिंह नागर को पश्चिम क्षेत्र का अध्यक्ष बनाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां एक नया विरोधाभास भी पैदा हुआ है. BJP जहां राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन में है वहीं जाट नेतृत्व को लगातार मजबूत भी कर रही है. भविष्य में स्थानीय स्तर पर दोनों दलों के नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है.
BJP ने दावा किया है कि नई कार्यकारिणी में पूरे प्रदेश का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि पूर्वांचल और अवध का दबदबा अब भी सबसे ज्यादा है. लगभग 38 प्रमुख पदाधिकारी इन्हीं क्षेत्रों से आते हैं, जबकि पश्चिम और ब्रज क्षेत्र का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम है. मेरठ जैसे महत्वपूर्ण राजनीतिक जिले से इस बार किसी नेता को प्रदेश कार्यकारिणी में जगह नहीं मिलना स्थानीय नेताओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. रविकांत का कहना है कि BJP का संगठन आज भी पूर्वांचल आधारित नेतृत्व के इर्द-गिर्द ज्यादा दिखाई देता है. यदि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन को और मजबूत नहीं किया गया तो चुनाव के दौरान इसका असर दिखाई दे सकता है जहां सपा लगातार सोशल इंजीनियरिंग के चलते अपनी पैठ मजबूत कर रही है.
मानकों पर उठे सबसे ज्यादा सवाल
नई टीम की घोषणा से पहले यह प्रचारित किया गया था कि सांसद, विधायक और विधान परिषद सदस्य बनने वाले नेताओं को संगठनात्मक जिम्मेदारियों से मुक्त किया जाएगा. कई पुराने नेताओं को वास्तव में हटाया भी गया. लेकिन चार विधान परिषद सदस्यों सत्यपाल सैनी, मोहित बेनीवाल, डॉ. धर्मेंद्र सिंह और विजय शिवहरे को फिर से संगठन में शामिल किए जाने से पार्टी के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं. वरिष्ठ BJP नेताओं का कहना है कि यदि संगठन ने मानक तय किए थे तो उनका पालन सभी पर समान रूप से होना चाहिए था. इससे कार्यकर्ताओं के बीच यह संदेश गया कि कुछ नेताओं के लिए अलग नियम लागू किए गए.
इससे पहले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी की मुख्य टीम में एक राज्यसभा सांसद को मिलाकर कुल 15 विधायक व एमएलसी को जगह दी गई थी. फेरबदल के बीच मथुरा के मांठ से विधायक राजेश चौधरी बड़ा नाम बनकर उभरे हैं. पार्टी में सीधे महामंत्री बनाए जाने को उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का करीबी होने के परिणाम के रूप में देखा जा रहा है. राजेश के विधानसभा चुनाव के दौरान नवीन मांठ विधानसभा क्षेत्र प्रभारी थे. वहीं बिहार चुनाव के दौरान राजेश ने नितिन नवीन के क्षेत्र में प्रभारी की भूमिका निभाई थी.
नई कार्यकारिणी में विजय बहादुर पाठक, पंकज सिंह, संतोष सिंह, कांता कर्दम, सुरेंद्र नागर, सलिल विश्नोई, मानवेंद्र सिंह, पद्मसेन चौधरी और कई पुराने चेहरों को बाहर कर दिया गया है. यह केवल पद परिवर्तन नहीं बल्कि संगठन में पीढ़ी परिवर्तन की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है. BJP नेतृत्व का मानना है कि लगातार एक ही चेहरों पर निर्भर रहने से संगठन की ऊर्जा कम होती है. इसलिए ऐसे नेताओं को आगे लाया गया है जिनके सामने अगले दस से पंद्रह वर्षों की राजनीतिक संभावनाएं मौजूद हैं.
क्या केवल संगठन चुनाव जिता सकता है?
BJP की सबसे बड़ी ताकत उसका बूथ स्तर का संगठन माना जाता है. 2014, 2017, 2019 और 2022 की जीत में संगठन की बड़ी भूमिका रही है. लेकिन 2027 का चुनाव पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है. समाजवादी पार्टी पीडीए अभियान को लगातार मजबूत कर रही है. कांग्रेस दलित और पिछड़े वर्ग में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही है. ऐसे में नए चेहरों से लैस संगठन के चुनाव से ठीक पहले मैदान में उतरने से इनके अनुभव और कार्यकुशलता की कड़ी परीक्षा होगी. प्रो. रविकांत कहते हैं “अगर संगठन में नए लोगों को बड़ी संख्या में शामिल करना था तो कार्यकारिणी की घोषणा काफी पहले ही कर देनी चाहिए थी ताकि संगठन जमीनी और चुनावी चुनौतियों का आकलन कर उससे सामंजस्य बिठा सके.”
नई टीम के सामने सबसे बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार, प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच बेहतर तालमेल बनाए रखना होगा. पिछले कुछ वर्षों में कई बार सरकार और संगठन के बीच समन्वय को लेकर राजनीतिक चर्चाएं होती रही हैं. यदि पंकज चौधरी इन तीनों स्तरों के बीच संतुलन स्थापित करने में सफल रहते हैं तो BJP 2027 में मजबूत स्थिति में दिखाई दे सकती है.

