अगले साल होने जा रहे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मायावती ने जिस तरह संगठनात्मक पहियों को फिर से घुमाना शुरू किया है, उससे लग रहा है कि बहुजन समाज पार्टी (BSP) प्रदेश में वापसी के लिए जोर-शोर से तैयारी कर रही है. बीते कुछ चुनावों में सीमित होती पकड़, घटता वोट शेयर और कैडर में आई सुस्ती के बाद BSP अब ‘मिशन 2027’ के नाम पर एक नए खाके के साथ मैदान में उतरने की कोशिश कर रही है. इस रणनीति का केंद्र बिंदु संगठन को ऊपर से नीचे तक पुनर्गठित करना, पुराने नेताओं को नए सिरे से जिम्मेदारी देना और सामाजिक समीकरणों को फिर से साधना है.
सबसे बड़ा और प्रतीकात्मक कदम पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ का प्रमोशन माना जा रहा है. कभी अनुशासनहीनता के आरोप में बाहर किए गए सिद्धार्थ की वापसी और फिर उन्हें दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़ और केरल जैसे चार राज्यों का प्रभारी बनाना यह दिखाता है कि नेतृत्व अब भरोसे के पुराने दायरे को फिर से सक्रिय कर रहा है. आकाश आनंद के ससुर सिद्धार्थ को राष्ट्रीय समन्वय ढांचे के केंद्र में लाना संगठनात्मक संतुलन का संकेत है. यह संदेश भी है कि जिन नेताओं ने आत्ममंथन के बाद वापसी की है, उन्हें नई भूमिका देकर जवाबदेही के साथ जोड़ा जाएगा.
इसके उलट, वरिष्ठ नेता रामजी गौतम की भूमिका में कटौती भी कम अहम नहीं है. पहले राष्ट्रीय स्तर पर नंबर एक माने जाने वाले गौतम से दिल्ली, मध्य प्रदेश, झारखंड और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्यों की जिम्मेदारी वापस लेकर उन्हें महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु सौंपा गया है. यह बदलाव सिर्फ क्षेत्रीय अदला-बदली नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन का नया तौर है. वहीं राजाराम को मध्य प्रदेश, बिहार और झारखंड का अतिरिक्त प्रभार देकर नेतृत्व ने संकेत दिया है कि नए चेहरों को भी विस्तार का मौका मिलेगा. पूर्व सांसद गिरीश चंद्र को उत्तराखंड और सुमरत सिंह को राजस्थान का जिम्मा सौंपना राष्ट्रीय उपस्थिति बनाए रखने की कवायद का हिस्सा है.
उत्तर प्रदेश के भीतर बदलाव और भी व्यापक है. 18 मंडलीय प्रभारियों की जिम्मेदारियों में फेरबदल कर संगठन को नए सिरे से सजाया गया है. BSP के प्रमुख मुस्लिम चेहरे नौशाद अली को कानपुर, लखनऊ, आगरा और मेरठ जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील और रणनीतिक मंडलों की कमान देना एक स्पष्ट सामाजिक संदेश है. दलित आधार के साथ मुस्लिम मतदाताओं तक पहुंच मजबूत करने की यह कोशिश बताती है कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक समीकरण को नए संदर्भ में फिर से गढ़ना चाहती है. पश्चिमी यूपी से लेकर मध्य यूपी तक फैले ये चार मंडल चुनावी दृष्टि से निर्णायक माने जाते हैं.
ये सभी फेरबदल अचानक नहीं आए. फरवरी की शुरुआत में ही बूथ और सेक्टर स्तर पर पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी. संशोधित मतदाता सूची के आधार पर नई कमेटियां बनाने, दोहरे जिला प्रभारी व्यवस्था को खत्म करने और 50 फीसदी युवाओं को संगठन में शामिल करने का फैसला संगठनात्मक ऊर्जा बढ़ाने की दिशा में कदम है. राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्विद्यालय में प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय बताते हैं, “BSP लंबे समय तक एक काडर-आधारित अनुशासित ढांचे के लिए जानी जाती रही है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जमीनी सक्रियता में कमी की शिकायतें सामने आती रहीं. अब नेतृत्व उसी पुरानी ताकत को आधुनिक चुनावी जरूरतों के मुताबिक ढालना चाहता है.”
7 फरवरी को लखनऊ स्थित प्रदेश कार्यालय में हुई विशेष बैठक में मायावती ने जिस तरह चुनावी दौरों का संकेत दिया, वह भी रणनीति का अहम हिस्सा है. राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद, राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्र, प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल और विधायक उमाशंकर सिंह को प्रदेशभर में सक्रिय अभियान की जिम्मेदारी देना बताता है कि पार्टी अब सिर्फ प्रेस बयान तक सीमित नहीं रहना चाहती.
आकाश आनंद को सभी जिलों में जाकर कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद का जिम्मा दिया गया है. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि यह कदम दो स्तर पर महत्वपूर्ण है. पहला, युवा नेतृत्व को मैदान में उतारकर नई पीढ़ी से जुड़ाव बढ़ाना. दूसरा, संगठन के भीतर यह संदेश देना कि शीर्ष नेतृत्व अब दूरी बनाकर नहीं, बल्कि सीधे संवाद के जरिए काम करेगा.
जातीय समीकरण साधने की रणनीति भी समानांतर चल रही है. पिछले वर्ष अक्टूबर की रैली में ब्राह्मण, ओबीसी और क्षत्रिय समाज को फिर से साथ लाने का जो ऐलान किया गया था, अब उसे जमीनी रूप देने की तैयारी है. ब्राह्मण बहुल जिलों में सतीश चंद्र मिश्र, पिछड़ा और अति पिछड़ा क्षेत्रों में विश्वनाथ पाल और क्षत्रिय बाहुल्य जिलों में उमाशंकर सिंह को जिम्मेदारी देकर पार्टी यह संकेत दे रही है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व सिर्फ भाषण तक सीमित नहीं रहेगा. मायावती ने हालिया बैठक में ब्राह्मण समाज की उपेक्षा और असुरक्षा का मुद्दा उठाकर यह भी दिखाया कि वह बीजेपी के सामाजिक आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं.
मुस्लिम समाज की ओर बढ़ते कदम भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं. भले ही औपचारिक रूप से अलग जिम्मेदारी तय न की गई हो, लेकिन हाल के महीनों में बाराबंकी, आजमगढ़ और पश्चिमी यूपी में कई मुस्लिम नेताओं का पार्टी में शामिल होना चर्चा में रहा है. यह संकेत देता है कि BSP उन मतदाताओं को आकर्षित करना चाहती है जो सपा और कांग्रेस के बीच बंटे रहे हैं. नौशाद अली की बढ़ी भूमिका इसी व्यापक योजना का विस्तार है.
संगठनात्मक अनुशासन को लेकर भी नेतृत्व सख्त रुख दिखा चुका है. फरवरी 2025 में अशोक सिद्धार्थ और उनके करीबी नितिन सिंह को बाहर करना और मार्च में आकाश आनंद को जिम्मेदारियों से हटाकर फिर सार्वजनिक माफी के बाद अप्रैल में फिर शामिल करना यह दिखाता है कि मायावती निर्णय लेने में हिचकिचाती नहीं हैं. एक वरिष्ठ BSP नेता बताते हैं, “सितंबर 2025 में सिद्धार्थ की वापसी और अब उनका प्रमोशन यह बताता है कि नेतृत्व गलती की गुंजाइश देता है, लेकिन अंतिम नियंत्रण अपने हाथ में रखता है. यह शैली BSP की पारंपरिक कार्यशैली से मेल खाती है, जहां अनुशासन सर्वोपरि माना जाता है.”
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह पूरा अभियान दोहरी रणनीति पर आधारित है. एक ओर संगठनात्मक निष्ठा को पुरस्कृत करना और दूसरी ओर नई ऊर्जा भरना. 50 प्रतिशत युवाओं को शामिल करने का लक्ष्य बताता है कि पार्टी आने वाले चुनाव को सिर्फ परंपरागत वोट बैंक के भरोसे नहीं लड़ना चाहती. सोशल मीडिया, बूथ प्रबंधन और स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता बढ़ाने की योजना उसी दिशा में है. हालांकि चुनौतियां कम नहीं हैं. प्रदेश की राजनीति में बीजेपी और सपा का मजबूत ढांचा है. कांग्रेस भी सीमित दायरे में सक्रिय है. ऐसे में BSP के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कोर दलित मतदाताओं को पूरी तरह जोड़े रखना और साथ ही नए सामाजिक समूहों में विश्वास पैदा करना है. पिछले चुनावों में वोट प्रतिशत भले पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, लेकिन सीटों में तब्दील न हो पाने की समस्या ने संगठन का मनोबल गिराया. अब नेतृत्व उसी मनोबल को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है.

