उत्तर प्रदेश में हालिया लोकसभा चुनाव के नतीजे सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं. साल 2014 और 2019 के आम चुनावों में एकतरफा जीत हासिल करने वाली बीजेपी को 2024 के चुनाव में मुंह की खानी पड़ी. 2019 के आम चुनावों में अपने सहयोगियों के साथ मिलकर 64 सीटें फतह करने वाली बीजेपी इस बार 36 सीटों पर ही सिमट गई. इनमें भी तीन सीटें भगवा दल के सहयोगियों ने जीतीं.
दरअसल, समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के घटक वाले इंडिया गठबंधन ने यूपी में 43 सीटें जीतकर बीजेपी के लिए आगे की राह कठिन कर दी है. लोकसभा चुनाव के बाद जिस तरह सपा और कांग्रेस ने प्रदेश में दलित और पिछड़े समुदाय के बीच समर्थन को मजबूत करने के लिए आक्रामक रवैया अपनाया है, उससे बीजेपी को विपक्षी दलों के गढ़े इस "नैरेटिव" का मुकाबला करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है.
यही वजह है कि हालिया आम चुनावों में यूपी में बीजेपी की हार, और 10 विधानसभा सीटों पर आगामी उपचुनावों के मद्देनजर पार्टी की तैयारियों का जायजा लेने के लिए बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष ने 6 और 7 जुलाई को लखनऊ में डेरा डाला. संतोष का लखनऊ दौरा ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण यूपी में बीजेपी की "अपेक्षाओं से काफी कमतर" प्रदर्शन के पीछे के कारणों को पेश करते हुए एक विस्तृत रिपोर्ट का मसौदा तैयार करने में जुटी है.
पहले दिन संतोष ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों डिप्टी सीएम (केशव मौर्य और ब्रजेश पाठक), यूपी भाजपा के अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और राज्य महासचिव (संगठन) धर्मपाल सिंह के साथ एक उच्च स्तरीय बैठक की. यह बैठक मुख्य रूप से यूपी भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारियों, अनिवार्य रूप से सभी राज्य महासचिवों और क्षेत्रीय अध्यक्षों से जमीनी स्तर की प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए बुलाई गई थी.
बैठक में संतोष ने मौजूदा और पूर्व सांसदों और विधायकों के बीच कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का जिक्र किया और इसे तत्काल दूर करने के लिए काम करने को कहा. बीजेपी कार्यकर्ताओं को लेकर राष्ट्रीय महासचिव की यह चिंता इस लिए भी थी, क्योंकि उन्हें पार्टी पदाधिकारियों पर "भितरघात" के आरोपों का जमीनी फीडबैक मिला था. इसका असर लोकसभा चुनाव के नतीजों पर दिखा.
यूपी में बीजेपी के 49 में से 27 मौजूदा सांसद अपनी सीटें हार गए हैं, जिससे पार्टी के संगठनात्मक नेतृत्व की चिंता बढ़ गई है. संतोष ने बैठक में पार्टी की नीतियों को प्रभावी रूप से लोगों तक पहुंचाने पर जोर दिया. उन्होंने ऐसे पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को "चिह्नित" करने को भी कहा, जिन्होंने पिछले दो लोकसभा चुनावों में सक्रिय और सकारात्मक भूमिका निभाई थी, लेकिन हालिया लोकसभा चुनाव में पर्याप्त जिम्मेदारी न दिए जाने से उदासीन थे. ऐसे कार्यकर्ताओं और नेताओं से संवाद करके उन्हें दोबारा जिम्मेदारियों के केंद्र में लाने के निर्देश भी संतोष ने दिए.
बैठक में संतोष इस बात से भी खिन्न दिखे कि कभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जोरदार मौजूदगी दिखाने वाली बीजेपी इस बार बिल्कुल शांत थी. यूपी में चुनाव के दौरान "संविधान बदल देने", "आरक्षण खत्म करने" जैसे विपक्षी "नैरेटिव" का मुकाबला करने के लिए सोशल मीडिया और जन केंद्रित कार्यक्रमों के जरिए कोई प्रयास नहीं किया गया, जिससे पार्टी के खिलाफ नैरेटिव मजबूत होता गया.
इसका नतीजा यह हुआ कि दलित और ओबीसी मतदाताओं का एक बड़ा तबका बीजेपी से छिटक कर "इंडिया गठबंधन" की तरफ चला गया. संविधान और आरक्षण पर केंद्रित विपक्ष के आक्रामक प्रचार अभियान ने भगवा पार्टी को हिंदी पट्टी में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया. इससे बने माहौल और कुछ जमीनी दिक्कतों के कारण बीजेपी हिंदुत्व के केंद्र अयोध्या में चुनाव हार गई, जो भगवा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की परेशानी की वजह बना हुआ है.
यूपी में बीजेपी से दलित वोटों का छिटकना पार्टी नेतृत्व को परेशान कर रहा है. पिछले दो चुनावों में राज्य की 17 आरक्षित सीटों पर शानदार प्रदर्शन करने वाली बीजेपी इस बार केवल आठ सीटें ही जीत सकी. 2019 के आम चुनावों में पार्टी ने इनमें से 14 सीटें जीती थीं, जबकि उसके सहयोगी अपना दल ने एक, और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने दो सीटें जीतीं. लेकिन इस बार इनमें से सात सीटें सपा के पास चली गईं, जबकि कांग्रेस और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व वाली आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) ने एक-एक सीट हासिल की.
दलितों के बीच पकड़ दोबारा मजबूत करने के लिए संतोष ने पार्टी के वरिष्ठ दलित नेताओं, जिनमें मंत्री बेबी रानी मौर्य, गुलाब देवी, असीम अरुण और दिनेश खटीक शामिल हैं, के अलावा पार्टी पदाधिकारियों को अपने-अपने उप समुदायों तक पहुंचने और विपक्ष द्वारा फैलाई जा रही "गलतफहमियों" को दूर करने के लिए सुधार करने का निर्देश दिया.
इस हवाले से उत्तर प्रदेश में बीजेपी के एससी-एसटी मोर्चा के प्रमुख राम चंद्र कनौजिया ने बताया, "दलित मतदाता संविधान आदि के बारे में विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे दुष्प्रचार के कारण लापरवाह हो गए थे. हम दलित समुदाय को केंद्र और राज्य स्तर पर उनके कल्याण के लिए उठाए गए कदमों के बारे में भी बताएंगे और विपक्ष के झूठ का पर्दाफाश भी करेंगे."
संतोष ने ओबीसी नेताओं को भी इसी तर्ज पर अपने समुदाय के बीच जाकर उनसे विपक्षी दलों द्वारा फैलाई जा रही धारणाओं के प्रति जागरूक करने का निर्देश दिया है. उन्होंने जमीनी स्तर पर और सोशल मीडिया सहित अन्य सभी प्लेटफॉर्म पर विपक्ष के नैरेटिव का मुकाबला करने पर विशेष जोर दिया. साथ ही, विपक्षी नैरेटिव का मुकाबला करने के लिए बीजेपी के संतोष ने लखनऊ में पार्टी के राज्य मुख्यालय में प्रवक्ताओं, मीडिया पैनलिस्ट और पार्टी के लिए काम करने वाले सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स के साथ भी बैठकें कीं.
संतोष ने विभिन्न मुद्दों पर कांग्रेस के दावों को गलत साबित करने के लिए अन्य राज्यों में पार्टी कैडर द्वारा अपनाए जा रहे कुछ उदाहरण भी पेश किए. संतोष ने उन मीडिया पैनलिस्टों से भी फीडबैक मांगा, जो टेलीविजन बहसों में भाग लेते हैं और खामियों को दूर करने के लिए पार्टी का चेहरा बनते हैं. बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने बताया, "बैठक में मीडिया और सोशल मीडिया टीमों की दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या पर चर्चा की गई. हम सभी को विशिष्ट कार्य दिए गए हैं और विपक्ष के फर्जी दावों, विशेष रूप से भारतीय संविधान में बदलाव के बारे में आक्रामक तरीके से मुकाबला करने के लिए कहा गया है."
लखनऊ प्रवास के दौरान संतोष ने आगामी दिनों में 10 विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव में हर हाल में जिताऊ उम्मीदवार को ही उतारने की मंशा प्रकट की. इन 10 सीटों में एक करहल भी शामिल है, जो सपा प्रमुख अखिलेश यादव के कन्नौज से लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद खाली हुई है. अन्य सभी नौ सीटें जहां उपचुनाव होने हैं, उनमें मिल्कीपुर (अयोध्या), कठेहरी (आंबेडकर नगर), कुंदरकी (मुरादाबाद), खैर (अलीगढ़), मंझवान (मिर्जापुर), फूलपुर (प्रयागराज), मीरापुर (बिजनौर), गाजियाबाद सदर (गाजियाबाद) और सीसामऊ (कानपुर) शामिल हैं.
इन दस सीटों में से पांच पर सपा के विधायक थे, जबकि तीन पर बीजेपी के विधायक थे; जबकि एक-एक सीट निषाद पार्टी और रालोद (राष्ट्रीय लोक दल) के पास थी, जो अब बीजेपी की सहयोगी है. संतोष यूपी में मिले फीडबैक से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अवगत कराएंगे. इसके बाद प्रदेश संगठन में भी बदलाव की रूपरेखा तय होगी.

