उच्च शिक्षा से जुड़ा केंद्र सरकार का एक फैसला इन दिनों उत्तर प्रदेश की राजनीति में भारी हलचल मचाए हुए है. दरअसल विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी को “उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने वाले विनियम, 2026” को नोटिफाई किया है.
इसने न सिर्फ छात्र संगठनों बल्कि प्रशासनिक तंत्र और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है. मामला अब सिर्फ शिक्षा नीति का नहीं रह गया है, बल्कि यह ब्राह्मण बनाम ठाकुर, सवर्ण बनाम अन्य वर्ग और प्रशासनिक अनुशासन बनाम वैचारिक विरोध की जटिल राजनीति में बदलता दिख रहा है.
इस पूरे विवाद का सबसे तीखा और प्रतीकात्मक चेहरा बने हैं बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट रहे PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री. 2019 बैच के इस अधिकारी ने 26 जनवरी को UGC के नए नियमों और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ कथित दुर्व्यवहार के विरोध में सार्वजनिक रूप से इस्तीफे की घोषणा कर दी. लेकिन इस्तीफा देने के कुछ ही घंटों के भीतर उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें अनुशासनहीनता और सर्विस नियमों के उल्लंघन के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
सरकार की ओर से जारी सस्पेंशन ऑर्डर में कहा गया कि अग्निहोत्री ने उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारी (अनुशासन और अपील) नियम, 1999 का उल्लंघन किया है. आरोप यह है कि उन्होंने इस्तीफा स्वीकार होने से पहले ही उसे सार्वजनिक किया और सरकार के खिलाफ आरोप लगाए. यही नहीं, सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंच पर उनकी गतिविधियों को भी सरकारी आचरण नियमों के विपरीत माना गया.
अग्निहोत्री ने सस्पेंशन पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया देने से इनकार किया, लेकिन यह जरूर कहा कि उन्होंने एक दिन पहले ही इस्तीफा दे दिया था. उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके खिलाफ साजिश रची गई और 26 जनवरी की रात जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में उन्हें लेकर अपमानजनक टिप्पणी की गई. 27 जनवरी की सुबह उन्होंने बरेली में एक संक्षिप्त विरोध प्रदर्शन भी किया. सोशल मीडिया पर उनकी एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमें वे अपने सरकारी आवास के बाहर एक पोस्टर पकड़े नजर आए. पोस्टर पर लिखा था — “#UGC रोलबैक, काला कानून वापस लो” और “शंकराचार्य और सनातन का यह अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान.” पोस्टर के नीचे “BJP का बहिष्कार” और “ब्राह्मण सांसद विधायक का बहिष्कार” जैसे नारे भी थे.
अग्निहोत्री का आरोप था कि नए UGC नियम सामान्य वर्ग के छात्रों को परेशान करेंगे और प्रदेश में “ब्राह्मण विरोधी अभियान” चलाया जा रहा है. उनके इस कदम ने प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी. एक तरफ सरकार ने इसे अनुशासनहीनता करार दिया, वहीं दूसरी ओर यह सवाल उठने लगे कि क्या एक अधिकारी को नीतिगत फैसलों पर सार्वजनिक असहमति जताने का अधिकार है. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. अग्निहोत्री के इस्तीफे और सस्पेंशन के बाद प्रशासनिक तंत्र के भीतर से एक और इस्तीफा सामने आया, जिसने इस पूरे विवाद को नया मोड़ दे दिया. अयोध्या संभाग के राज्यकर विभाग में तैनात डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. खास बात यह रही कि प्रशांत कुमार सिंह ने यह इस्तीफा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में और शंकराचार्य द्वारा मुख्यमंत्री पर की गई टिप्पणी के विरोध में दिया.
प्रशांत कुमार सिंह का एक भावुक वीडियो भी सामने आया, जिसमें वे फोन पर अपनी पत्नी से बात करते हुए रोते नजर आए. वीडियो में वे कहते हैं कि उन्होंने इस्तीफा इसलिए दिया क्योंकि उनसे यह अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ. उनका कहना था कि “जिसका नमक खाते हैं, उसका सिला अदा करना चाहिए.” उन्होंने बताया कि वे पिछले दो दिनों से सो नहीं पाए थे और मानसिक तनाव में थे. अपने इस्तीफे में उन्होंने साफ लिखा कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रदेश के मुखिया हैं और उनका अपमान किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता. इस तरह एक ही मुद्दे पर दो अधिकारियों के इस्तीफे, लेकिन बिल्कुल उलट कारणों से, सरकार और सिस्टम के भीतर गहरे वैचारिक विभाजन की ओर इशारा करते हैं.
इसी बीच राजनीतिक स्तर पर भी असंतोष खुलकर सामने आने लगा. लखनऊ में BJP के 11 पदाधिकारियों ने UGC नियमों के विरोध में सामूहिक इस्तीफा दे दिया. बख्शी तालाब विधानसभा क्षेत्र के कुम्हारवां मंडल महामंत्री आलोक तिवारी ने अपने इस्तीफे में लिखा कि इस कानून से सवर्ण समाज के बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. उनके साथ मंडल महामंत्री, मंडल मंत्री, उपाध्यक्ष, बूथ अध्यक्ष और युवा मोर्चा के पदाधिकारी भी शामिल थे. पार्टी के भीतर से उठी इस आवाज ने BJP नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है. यह वही पार्टी है जो खुद को सामाजिक संतुलन और सुशासन का प्रतीक बताती रही है, लेकिन अब उसी के कार्यकर्ता और पदाधिकारी केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ खुलकर सामने आ रहे हैं.
विरोध की आग सिर्फ लखनऊ तक सीमित नहीं रही. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राजपूत बहुल इलाकों में भी नए UGC नियमों के खिलाफ गुस्सा उबल रहा है. मेरठ की ठाकुर चौबीसी में राजपूत समाज के नेताओं ने इन नियमों को “काला कानून” करार दिया है. राजपूत समाज के मेरठ अध्यक्ष अनूप राघव ने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने नियम वापस नहीं लिए तो पश्चिम यूपी के 650 ठाकुर गांव सड़कों पर उतर आएंगे. राजपूत नेताओं का आरोप है कि ये नियम सामान्य जाति के छात्रों को अपराधी की तरह ट्रीट करने की व्यवस्था बनाते हैं. उनका कहना है कि विश्वविद्यालयों में अगर किसी छात्र के खिलाफ फर्जी शिकायत दर्ज हो गई तो उसे बिना ठोस जांच के कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा. इस बयानबाजी में “महा पंचायत”, “चुनाव में सबक सिखाने” और “सरकार को उखाड़ फेंकने” जैसे शब्द भी सामने आए हैं.
हालांकि इस पूरे परिदृश्य में ब्राह्मण बनाम ठाकुर की अंतर्धारा भी साफ दिख रही है. बरेली के PCS अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री, जो खुद ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, ने “ब्राह्मण विरोधी अभियान” का आरोप लगाया. वहीं ठाकुर बहुल इलाकों में सरकार के खिलाफ स्वर और तीखे हो रहे हैं. सवर्ण बनाम अन्य वर्ग की यह बहस अब शिक्षा नीति से निकलकर जातीय राजनीति के मैदान में पहुंच चुकी है.
सरकार की स्थिति इस पूरे मामले में असहज है. एक तरफ वह UGC के नियमों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और सामाजिक न्याय की जरूरतों से जोड़कर देखती है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर और बाहर बढ़ते असंतोष को भी नजरअंदाज नहीं कर सकती.
सरकारी सूत्रों का कहना है कि UGC के नियमों का मकसद किसी वर्ग को निशाना बनाना नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव की शिकायतों के लिए एक मजबूत और समयबद्ध तंत्र तैयार करना है. सरकार यह भी तर्क देती है कि ये नियम सुप्रीम कोर्ट में रोहित वेमुला और पायल तडवी की माताओं द्वारा दायर याचिका के बाद आए हैं. कोर्ट ने साफ कहा था कि समानता के नियम सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं होने चाहिए, बल्कि उन्हें लागू करने के लिए ठोस व्यवस्था होनी चाहिए.
क्या है UGC के नए नियमों में
UGC के इन नए नियमों का उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना और समानता व समावेशन को बढ़ावा देना है. इन नियमों के तहत हर उच्च शिक्षा संस्थान में तीन प्रमुख ढांचे अनिवार्य किए गए हैं, समान अवसर केंद्र (EOC), इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वॉड. समान अवसर केंद्र का काम वंचित समूहों से जुड़ी नीतियों के कार्यान्वयन की निगरानी करना, जिला प्रशासन और पुलिस से समन्वय करना और जरूरत पड़ने पर कानूनी सहायता उपलब्ध कराना है. इसमें पांच फैकल्टी सदस्य होंगे और इनके लिए किसी विशेष श्रेणी का आरक्षण नहीं है.
इक्विटी कमेटी दस सदस्यों की होगी, जिसकी अध्यक्षता संस्थान का प्रमुख करेगा. इसमें OBC, SC, ST, दिव्यांग और महिला वर्ग से कम से कम एक-एक सदस्य होना अनिवार्य है. किसी शिकायत के आने पर इस कमेटी को 24 घंटे के भीतर बैठक करनी होगी और 15 दिनों में रिपोर्ट सौंपनी होगी. इक्विटी स्क्वॉड का काम कैंपस में निगरानी रखना और भेदभाव की घटनाओं को रोकना है. इसके तहत 24 घंटे की हेल्पलाइन और इक्विटी एंबेसडर की व्यवस्था भी की गई है. इन नियमों की एक बड़ी खासियत यह है कि अगर कोई संस्थान इनका पालन नहीं करता तो UGC उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकता है. इसमें फंड रोकना, नए कोर्स की अनुमति न देना और यहां तक कि मान्यता पर असर डालना भी शामिल है.
विवाद की एक बड़ी वजह यह है कि ड्राफ्ट में शामिल “झूठी शिकायतों” पर कार्रवाई का प्रावधान अंतिम नियमों से हटा दिया गया है. विरोध करने वालों का कहना है कि इससे फर्जी शिकायतों का खतरा बढ़ जाएगा और सामान्य वर्ग के छात्रों को निशाना बनाया जा सकता है.

