उत्तर प्रदेश की सियासत में अक्सर छोटे दिखने वाले मुद्दे भी बड़े संकेत दे जाते हैं. राजधानी लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में 28 फरवरी को आयोजित अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के ‘प्रबुद्ध समागम 2026’ ने ऐसा ही एक संकेत दिया.
मंच पर भारतीय जनता पार्टी (BJP), कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता साथ बैठे थे, लेकिन सभागार के भीतर जो बेचैनी थी, उसका केंद्र एक ही था, UGC के नए इक्विटी नियम और कथित ‘सवर्ण असंतोष’.
सवाल यह है कि क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा BJP के लिए वास्तविक राजनीतिक चुनौती बन सकता है? समागम में सबसे असहज क्षण तब आया जब BJP के राज्यसभा सदस्य और पूर्व उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा से UGC नियमों पर बोलने की मांग की गई. उनके टालने पर नारेबाजी शुरू हो गई और उन्हें भाषण बीच में छोड़कर बैठना पड़ा.
मंच पर मौजूद पूर्व राज्यपाल कलराज मिश्र ने खुलकर कहा कि उन्होंने UGC प्रावधानों का विरोध किया है और इसे “अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला” बताया. उप मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने लोगों की भावनाएं समझने की बात कही, लेकिन वे भी सीधे मुद्दे पर नहीं बोले. कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे और यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने प्रयागराज की घटनाओं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के प्रसंग को उठाते हुए BJP पर हमला बोला. कुल मिलाकर, कार्यक्रम का नाम भले ‘प्रबुद्ध समागम’ था, लेकिन असली एजेंडा ब्राह्मण अस्मिता और UGC नियम बन गए.
दरअसल, UGC (हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स में इक्विटी को बढ़ावा देने) रेगुलेशन, 2026 का उद्देश्य संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव को रोकना बताया गया. लेकिन सवर्ण संगठनों का आरोप है कि इन प्रावधानों का इस्तेमाल उनके खिलाफ संस्थागत कार्रवाई के लिए हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इन नियमों पर फिलहाल रोक लगी है, पर राजनीतिक असर थमा नहीं है. BJP के भीतर ही कई सवर्ण नेताओं ने इसे लेकर असंतोष जताया है. कुछ जिलों में पदाधिकारियों ने इसे “काला कानून” बताते हुए इस्तीफे तक दे दिए.
यह असंतोष एक बड़े राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा. 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में BJP 33 सीटों पर सिमट गई, जबकि अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी को 37 सीटें मिलीं. BJP की 2014 की 71 सीटों और 2019 की 62 सीटों की तुलना में यह बड़ी गिरावट थी. विधानसभा में BJP अभी भी मजबूत है, 2017 में 312 और 2022 में 255 सीटें, लेकिन लोकसभा के आंकड़े बताते हैं कि सामाजिक समीकरणों में बदलाव शुरू हो चुका है.
BJP की रणनीति पिछले एक दशक में ‘हिंदू एकता’ के व्यापक नैरेटिव पर टिकी रही है, जिसमें गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को साथ जोड़ने की कोशिश की गई. लेकिन इसी ‘ओबीसी पुश’ को अब कुछ सवर्ण नेता असंतुलन के रूप में देख रहे हैं. पार्टी के एक ब्राह्मण नेता का कहना है कि पहले एससी-एसटी कानून को लेकर नाराजगी थी, अब ओबीसी से जुड़े प्रावधानों को लेकर असुरक्षा बढ़ी है. उनके मुताबिक, “ऊंची जातियों को लगता है कि सत्ता और नौकरियों में उनका हिस्सा घट रहा है.” यह धारणा कितनी व्यापक है, यह अलग सवाल है, लेकिन राजनीति में धारणा ही अक्सर निर्णायक होती है.
BJP नेतृत्व ने हाल में महाराजगंज से सांसद पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है, जो ओबीसी समुदाय से आते हैं. इसे एक ओर ओबीसी आधार मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा गया, तो दूसरी ओर कुछ सवर्ण नेताओं ने इसे संकेत माना कि पार्टी का फोकस बदल रहा है. ब्राह्मण विधायकों की एक बैठक पर नेतृत्व की नाराजगी और ठाकुर तथा ओबीसी विधायकों की बैठकों पर चुप्पी की चर्चा भी अंदरखाने असंतोष को हवा देती रही है.
यहीं पर ब्राह्मण-ठाकुर समीकरण का सवाल भी जुड़ता है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठाकुर समुदाय से आते हैं. पिछले लोकसभा चुनाव से पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में टिकट बंटवारे को लेकर ठाकुर असंतोष की खबरें आई थीं. 2024 के बाद पार्टी की आंतरिक समीक्षा में ब्राह्मणों की नाराजगी का जिक्र हुआ. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि ब्राह्मण और ठाकुर- दोनों प्रभावशाली सवर्ण समूह अपने-अपने कारणों से असहज हैं, तो यह BJP के लिए चेतावनी का संकेत हो सकता है.
हालांकि ब्राह्मण जनसंख्या के लिहाज से निर्णायक संख्या में नहीं हैं, लेकिन राजनीति, प्रशासन, शिक्षा और मीडिया में उनका प्रभाव माना जाता है. वे नैरेटिव गढ़ने की क्षमता रखते हैं. एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि “ब्राह्मण समुदाय के पास विकल्प सीमित हैं” क्योंकि कांग्रेस निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात करती है और समाजवादी पार्टी अभी तक खुलकर ब्राह्मणों को लुभाने की रणनीति नहीं लाई है. लेकिन वे यह भी जोड़ते हैं कि असंतोष का असर मतदान प्रतिशत पर दिख सकता है, मतदान के दिन ‘चुप्पी’ भी एक संदेश होती है.
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अपनी सामाजिक इंजीनियरिंग को नए सिरे से गढ़ने में जुटी है. अखिलेश यादव ने पीडीए- पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक- का नारा देकर मुस्लिम-यादव पार्टी की छवि से बाहर निकलने की कोशिश की है. 29 मार्च को दादरी में प्रस्तावित ‘समाजवादी समानता भाईचारा रैली’ को पश्चिमी, मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गुर्जर, कुर्मी, सैनी और कुशवाहा समुदायों तक पहुंचने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है. सपा BJP पर 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को कमजोर करने और पीडीए समुदायों की हजारों सीटें खाली रखने का आरोप लगा रही है. राजनीतिक विश्लेषक मनोज यादव कहते हैं, “अगर सपा UGC विवाद को वह ‘ओबीसी बनाम सवर्ण’ के चश्मे से पेश करने में सफल होती है, तो BJP के लिए संतुलन साधना कठिन हो सकता है.”
BJP के लिए चुनौती दोतरफा है. एक तरफ उसे अपने पारंपरिक सवर्ण आधार की आशंकाओं को शांत करना है, दूसरी तरफ ओबीसी और गैर-जाटव दलितों में अपनी पकड़ बनाए रखनी है. 2019 और 2024 के बीच गैर-यादव, गैर-कुर्मी ओबीसी तथा गैर-जाटव दलित वोट में गिरावट के संकेत मिले हैं. अगर सवर्ण असंतोष भी जुड़ गया, तो 2027 का रास्ता उतना आसान नहीं रहेगा जितना 2017 में था. फिर भी, यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि UGC का मुद्दा अकेले BJP की चुनावी किस्मत तय कर देगा.
उत्तर प्रदेश में चुनावी फैसले बहुस्तरीय होते हैं. स्थानीय उम्मीदवार, कानून-व्यवस्था, कल्याणकारी योजनाएं, केंद्रीय नेतृत्व की छवि, सब मिलकर असर डालते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभार्थी नेटवर्क अभी भी BJP की बड़ी ताकत है. पार्टी को भरोसा है कि विकास और हिंदुत्व का संयुक्त नैरेटिव जातीय असंतोष को सीमित कर देगा.
लेकिन लखनऊ के उस सभागार की नारेबाजी यह संकेत जरूर देती है कि नीचे कुछ उबाल है.
राजनीतिक तौर पर संगठित ब्राह्मण असंतोष भले सीमित दायरे में हो, पर उसका प्रतीकात्मक महत्व बड़ा है. यदि यह असंतोष सुलझा नहीं, तो विपक्ष इसे नैरेटिव की लड़ाई में इस्तेमाल करेगा, जैसे कांग्रेस के दौर में शाह बानो प्रकरण को लंबे समय तक राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया था.
2027 की चुनावी जमीन अभी से तैयार हो रही है. UGC का मुद्दा BJP के लिए ‘ट्रिगर पॉइंट’ बन सकता है या फिर समय के साथ ठंडा पड़ सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी नेतृत्व कितनी तेजी और स्पष्टता से संवाद स्थापित करता है. फिलहाल इतना तय है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में जातीय संतुलन की बिसात फिर से बिछ रही है, और हर चाल का असर दूर तक जाएगा.

