ओडिशा के भद्रक जिले में 8 करोड़ रुपए से अधिक के बड़े वित्तीय घोटाले का खुलासा हुआ है. इस मामले में चांदबली सब-ट्रेजरी कार्यालय से जुड़े केस में ओडिशा विजिलेंस ने छह लोगों को गिरफ्तार किया है. मुख्य आरोपी की पहचान संतोष कुमार पांडा के रूप में हुई है. वह पहले चांदबली सब-ट्रेजरी में वरिष्ठ सहायक के पद पर कार्यरत था.
पांडा के साथ उसके पांच सहयोगियों को भी विजिलेंस टीम ने गिरफ्तार किया है. आधिकारिक सूत्रों के अनुसार इन छह आरोपियों ने वर्ष 2018 से 2023 के बीच करीब 8.04 करोड़ रुपए की सरकारी राशि का गबन किया. शुरुआती जांच में पता चला कि यह घोटाला 102 फर्जी बिलों के जरिए किया गया. इनके माध्यम से रकम 44 अलग-अलग बैंक खातों में ट्रांसफर की गई.
दिलचस्प बात यह है कि कई वर्षों तक ट्रेजरी सिस्टम की आधिकारिक वित्तीय प्रक्रियाओं में हेरफेर कर इन फर्जी लेनदेन को अंजाम दिया गया. फंड वितरण रिकॉर्ड में संदिग्ध अनियमितताओं की जांच के बाद इस बड़े गबन का खुलासा हुआ. गिरफ्तारी के बाद सभी छह आरोपियों को आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए बालासोर स्थित विशेष विजिलेंस अदालत में पेश किया गया. अधिकारियों ने बताया कि जांच जारी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस घोटाले में और कौन-कौन लोग शामिल हैं. विभाग फर्जी लेनदेन से जुड़े पूरे मनी ट्रेल का पता लगाने की कोशिश कर रहा है.
भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी के अधिकारियों ने घोटाले के तरीके की जानकारी देते हुए बताया कि संतोष पांडा पहले किसी वास्तविक पेंशनभोगी की पेंशन, ग्रेच्युटी या कम्यूटेशन ऑफ वैल्यू ऑफ पेंशन (CVP) बिल को प्रोसेस कर भुगतान कर देता था. इसके बाद वह पकड़े जाने से बचने के लिए 5 से 6 महीने तक इंतजार करता था. फिर वह अपनी आधिकारिक लॉगिन आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल कर एकीकृत वित्तीय प्रणाली यानी IFMS पोर्टल के ‘ग्रेच्युटी पेमेंट मेन्यू’ तक पहुंचता था. यहां वह असली पेंशनभोगी का मूल पेंशन पेमेंट ऑर्डर (PPO) नंबर और आईडी दोबारा दर्ज करता था. लेकिन पेंशनभोगी के खाते में पैसा भेजने के बजाय एक थर्ड-पार्टी गवर्नमेंट पेंशन ऑर्डर आईडी बनाकर रकम अपने सहयोगियों के खातों में ट्रांसफर कर देता था.
इस तरीके का इस्तेमाल कर पांडा और उसके सहयोगियों ने 25 जुलाई 2018 से 4 मई 2023 के बीच करीब 8 करोड़ रुपए का गबन किया. कुल 102 फर्जी बिलों के जरिए निकाली गई राशि को 37 निजी व्यक्तियों के 44 अलग-अलग बैंक खातों में भेजा गया जो पांडा के सहयोगी थे. आरोप है कि सब-ट्रेजरी अधिकारी (स्वीकृति प्राधिकारी) ने भी अलग लॉगिन के जरिए इन बिलों को मंजूरी दे दी. उन्होंने यह जांचने की कोशिश नहीं की कि बिल का भुगतान पहले ही हो चुका है या लाभार्थी की जानकारी मूल रिकॉर्ड से मेल खाती है या नहीं.
सरकार की ओर से जारी आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस संबंध में ओडिशा विजिलेंस ने संतोष पांडा और उसके पांच सहयोगियों सिबा शंकर सामल, देव शंकर सामल, प्रफुल्ल कुमार राउत, संदीप कुमार मित्रा और अभय कुमार पांडा के खिलाफ विजिलेंस सेल में केस दर्ज किया है.
झारखंड में 50 करोड़ पार कर गया आंकड़ा
इससे पहले झारखंड में भी इसी तरह के मामले का खुलासा हो चुका है. पिछले महीने राज्य वित्त विभाग के नियमित ऑडिट और विश्लेषण के दौरान इन वित्तीय अनियमितताओं पर ध्यान गया. पहला मामला बोकारो एसपी कार्यालय से सामने आया, जहां शुरुआती घोटाला करीब 3.15 करोड़ रुपए का बताया गया था. जांच बढ़ने के साथ अन्य जिलों से भी इसी तरह के मामले सामने आने लगे.
जारी जांच के कारण सीआईडी और वित्त विभाग के प्रधान महालेखाकार के अधिकारियों ने ज्यादा जानकारी साझा करने से इनकार किया है. हालांकि अभी कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है लेकिन घोटाले की राशि करीब 50 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है. बोकारो मामले के बाद हेमंत सोरेन और वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने राज्य के 24 जिलों में जांच शुरू कराई है.
बोकारो में दर्ज एफआईआर के मुताबिक एसपी कार्यालय के एक अकाउंटेंट ने मई 2024 से मार्च 2026 के बीच एक पूर्व पुलिस अधिकारी के नाम पर अवैध निकासी की. यह पुलिस अधिकारी 2016 में ही रिटायर हो चुके थे. यह रकम पहले आरोपी की पत्नी के बैंक खाते में और फिर आरोपी के खाते में ट्रांसफर की गई. बोकारो के उपायुक्त अजय नाथ झा ने बताया था, “इस मामले में रकम करीब 10 करोड़ रुपए तक पहुंच चुकी है और भविष्य में यह और बढ़ सकती है.”
इसके बाद हजारीबाग पुलिस विभाग की ट्रेजरी में भी इसी तरह का पैटर्न सामने आया, जहां करीब 30 करोड़ रुपए के गबन का आरोप है. रांची में हुई जांच में इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल हेल्थ एंड प्रोडक्शन में ट्रेजरी भुगतान से जुड़ा एक और कथित घोटाला सामने आया है. जांच में पाया गया कि एक अकाउंटेंट ने करीब 1.52 करोड़ रुपए और दूसरे कर्मचारी ने लगभग 1.41 करोड़ रुपए निकाले हैं. यानी यहां कुल करीब 3 करोड़ रुपए का गबन किया गया.
पश्चिम सिंहभूम जिले में एसपी कार्यालय से जुड़ा करीब 26.21 लाख रुपए का संदिग्ध लेनदेन सामने आया है. रामगढ़ में जांच में पता चला कि पशुपालन विभाग के एक पूर्व कर्मचारी ने करीब 35 लाख रुपए का अवैध गबन किया. हालांकि कई अन्य जिलों में अभी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है लेकिन जांच चल रही है. उदाहरण के तौर पर देवघर जिले में करीब 3 करोड़ रुपए की कथित अवैध निकासी की जांच की जा रही है. सूत्रों के मुताबिक, संदिग्ध अनियमितताएं 14 जिला ट्रेजरी तक फैली हो सकती हैं.
पूरे मामले में अब तक झारखंड में करीब 15 गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. अधिकारियों ने फिलहाल पांच जिलों में करीब 50 करोड़ रुपए की गड़बड़ी का पता चलने की बात कही है. हालांकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों और नेताओं का कहना है कि यह रकम आगे चलकर 100 से 150 करोड़ रुपए या उससे अधिक हो सकती है.
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर निकासी उच्च स्तर के संरक्षण के बिना संभव नहीं थी. उन्होंने इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) और CBI जैसी केंद्रीय एजेंसियों से कराने की मांग की है. वहीं सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पलटवार करते हुए कहा कि ये अनियमितताएं पिछली रघुवर दास के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के दौरान सिस्टम में छोड़ी गई खामियों का परिणाम हैं.

