
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के 19 मार्च को अयोध्या आगमन ने नवरात्र के पहले दिन को एक खास आध्यात्मिक और राष्ट्रीय महत्व दे दिया. राम मंदिर के दूसरे तल पर दुनिया के इकलौते कहे जाने ‘श्री राम यंत्र’ की स्थापना के साथ एक ऐसी परंपरा को सार्वजनिक रूप से स्थापित किया गया, जो अब तक सीमित धार्मिक व विद्वत दायरों में ही चर्चा का विषय रही थी.
वैदिक मंत्रों के बीच संपन्न इस अनुष्ठान में न केवल आध्यात्मिकता की गूंज थी, बल्कि इसके पीछे छिपा सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट रूप से महसूस किया गया. करीब 150 किलोग्राम वजनी और 3×3 फीट आकार का यह श्री राम यंत्र पंचधातु से निर्मित है, जिस पर 24 कैरेट सोने की परत चढ़ाई गई है. देखने में यह किसी सामान्य धार्मिक प्रतीक जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत जटिल ज्यामितीय आकृतियों का संयोजन है.
इसमें एक-दूसरे से जुड़े त्रिभुज, संकेंद्रित वृत्त और पारंपरिक शिल्प शास्त्र के अनुसार निर्मित पैटर्न शामिल हैं. इन आकृतियों को केवल कला नहीं, बल्कि ‘ऊर्जा के वाहक’ के रूप में देखा जाता है. हिंदू परंपरा में ‘यंत्र’ को एक ऐसे आध्यात्मिक खाके के रूप में माना जाता है, जो ब्रह्मांडीय शक्तियों को केंद्रित करता है. जिस तरह ‘श्री यंत्र’ को देवी लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, उसी प्रकार ‘श्री राम यंत्र’ को भगवान राम की मर्यादा, विजय और संरक्षण का प्रतीक माना जा रहा है.
अयोध्या में राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े एक वरिष्ठ सदस्य के मुताबिक श्री राम यंत्र में एक संस्कृत प्रार्थना अंकित है, जो प्रतीकात्मक रूप से भगवान राम को मंदिर में सदैव विराजमान रहने के लिए आमंत्रित करती है, ठीक उसी तरह, जैसे माना जाता है कि वे बैकुंठ में पूरी गरिमा और शांति के साथ निवास करते हैं, और अपने सभी भक्तों पर करुणा व आशीर्वाद बरसाते हैं. यह प्रार्थना भगवान हनुमान का भी आह्वान करती है, ताकि वे एक रक्षक शक्ति के रूप में इस पवित्र स्थान को नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखें.

इस यंत्र की सबसे दिलचस्प कहानी इसके निर्माण और यात्रा से जुड़ी है, जो उत्तर और दक्षिण भारत के सांस्कृतिक सेतु को भी रेखांकित करती है. इस यंत्र को कांची कामकोटि पीठम के पीठाधिपति, जगद्गुरु श्री शंकर विजयेंद्र सरस्वती के मार्गदर्शन में कांचीपुरम में प्रतिष्ठित (consecrated) किया गया था. वहां विस्तृत वैदिक अनुष्ठान और शुद्धिकरण समारोह आयोजित किए गए थे. नवंबर और दिसंबर 2024 की शुरुआत के बीच, राम यंत्र को कांचीपुरम से एक औपचारिक 'रथ यात्रा' के माध्यम से अयोध्या लाया गया और 12 दिसंबर 2024 को इसे औपचारिक रूप से 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' के सचिव, चंपत राय को सौंप दिया गया.
इस पूरी यात्रा ने इसे केवल एक धार्मिक वस्तु नहीं रहने दिया, बल्कि एक सांस्कृतिक यात्रा का प्रतीक बना दिया, जो देश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ती है. राम यंत्र को कांचीपुरम स्थित एक मंदिर में रखे प्राचीन 'श्री राम यंत्र' के प्रतिरूप के आधार पर तैयार किया गया है. यह सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपरा की निरंतरता को दर्शाता है.
अयोध्या लाए जाने के बाद, इसे शुरू में मंदिर की पहली मंज़िल पर रखा गया था, जहां दूसरी मंज़िल का निर्माण कार्य चलने के दौरान रोज़ाना की पूजा-अर्चना और प्रार्थनाएं की जाती थीं. ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद गिरि महाराज ने बताया कि निर्माण कार्य पूरा होने के बाद अब राम यंत्र को दूसरी मंज़िल पर स्थित गर्भगृह (पवित्रतम स्थान) में स्थापित कर दिया गया है. इसके साथ ही एक लंबे समय से प्रतीक्षित प्रक्रिया पूरी हो गई है. अब मंदिर के दूसरे तल पर आने वाले श्रद्धालु इस यंत्र के सामने ध्यान और जप कर सकेंगे, जिससे इसे एक जीवंत आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने की कोशिश दिखती है.
अयोध्या में ‘श्री राम यंत्र’ की स्थापना को सिर्फ धार्मिक घटना मानना अधूरा होगा, क्योंकि इसका सीधा असर दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु की राजनीति पर भी पड़ सकता है. वह भी तब जब श्री राम यंत्र की अयोध्या में प्रतिस्थापना ऐसे वक्त हुई है जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव की घोषणा हो चुकी है. और भारतीय जनता पार्टी (BJP) वहां पैठ बनाने की कोशिश में जुटी है. ऐसे में घटनाक्रम राजनीतिक विमर्श में भी जगह बना रहा है. तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ विचारधारा के इर्द-गिर्द रही है, लेकिन हाल के वर्षों में बदलाव के संकेत दिखे हैं.
एक अध्ययन के मुताबिक, 2024 के चुनावों में BJP का वोट शेयर 18.31 फीसदी तक पहुंचा, जबकि द्रविड़ दलों का संयुक्त वोट प्रतिशत घटकर 47.39 फीसदी रह गया. राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ में अवध गर्ल्स कालेज की प्राचार्य बीना राय का मानना है कि राम मंदिर और उससे जुड़े प्रतीकों के जरिए “सॉफ्ट हिंदुत्व” की रणनीति पर काम किया जा रहा है, ताकि सांस्कृतिक जुड़ाव के माध्यम से तमिल मतदाताओं तक पहुंच बनाई जा सके.
इसी रणनीति का एक बड़ा हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में हर साल आयोजित होने वाला ‘काशी-तमिल संगमम’ भी है. 2022 से शुरू हुए इस कार्यक्रम में हर साल करीब 2500 प्रतिनिधि शामिल होते हैं और इसका उद्देश्य तमिलनाडु और काशी के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करना है. हाल के संस्करणों में सैकड़ों छात्र और प्रतिनिधि अयोध्या तक भी पहुंचे, जिससे राम मंदिर से जुड़ाव और बढ़ा. बीना राय बताती हैं कि राम यंत्र जैसे प्रतीक, काशी-तमिल संगमम और धार्मिक-सांस्कृतिक यात्राएं मिलकर एक “सांस्कृतिक नैरेटिव” तैयार कर रही हैं. राय के अनुसार, “यह सीधा चुनावी मुद्दा नहीं है, लेकिन यह पहचान और भावनात्मक जुड़ाव को प्रभावित करता है, जो लंबे समय में वोटिंग पैटर्न बदल सकता है.”
हालांकि, दूसरी तरफ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) और अन्य द्रविड़ दल इसे “सांस्कृतिक राजनीति” करार देते हैं और सामाजिक न्याय के मुद्दों को ज्यादा अहम बताते हैं. कुल मिलाकर, अयोध्या में राम यंत्र की स्थापना और तमिलनाडु से उसका जुड़ाव चुनावी नतीजों को तुरंत प्रभावित न करे, लेकिन यह राज्य की राजनीति में धीरे-धीरे नए विमर्श की जमीन जरूर तैयार कर रहा है.
सामाजिक स्तर पर देखें तो इस यंत्र की स्थापना ने एक व्यापक सांस्कृतिक संवाद को जन्म दिया है. उत्तर भारत के अयोध्या और दक्षिण भारत के कांचीपुरम के बीच यह कड़ी एक प्रतीकात्मक संदेश देती है कि धार्मिक परंपराएं क्षेत्रीय सीमाओं से परे हैं. एक ओर जहां अयोध्या रामभक्ति का केंद्र है, वहीं कांचीपुरम वैदिक ज्ञान और शिल्प परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. ऐसे में इस यंत्र का निर्माण दक्षिण में और स्थापना उत्तर में होना ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की अवधारणा को भी मजबूत करता है.
विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे आयोजनों के जरिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को और मजबूती मिलती है. पिछले कुछ वर्षों में BJP इस अवधारणा की सबसे बड़ी पैरोकार बनकर उभरी है. हालांकि तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्य से जुड़े इस यंत्र के माध्यम से यह संकेत देने की कोशिश भी देखी जा रही है कि राम मंदिर केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश की आस्था का केंद्र है. पर राजनीति कई बार छिपे हुए संकेतों पर भी टिकी होती है.

