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एमपी के शिवपुरी में बाघिन का हमला! एक्सपर्ट इसे दुर्लभ मामला क्यों बता रहे?

बाघिन के कथित हमले में 50 साल के एक ग्रामीण की मौत हो गई. दो दिन के बाद वन विभाग ने इसे ट्रेंकुलाइज किया और फिलहाल इसे एक बाड़े में रखा गया है

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघ की मौत. (Photo: Representational)
प्रतीकात्मक फोटो
अपडेटेड 29 अप्रैल , 2026

मध्य प्रदेश में बाघ के साथ संदिग्ध मुठभेड़ में एक व्यक्ति की मौत की खबर है, लेकिन यह एक ऐसे इलाके में हुआ है जो अब तक मानव-पशु संघर्ष के लिए नहीं जाना जाता था. शिवपुरी जिले के नरवर के पास 24 अप्रैल को हुए हमले में एक 50 वर्षीय व्यक्ति की मौत हो गई. यह क्षेत्र माधव नेशनल पार्क के करीब है, जिसे हाल ही में टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया है.

ऐरावन गांव के रहने वाले एक आदिवासी सरवन, जलाशय के किनारे नहा रहे थे, तभी कथित तौर पर बाघिन उन्हें खींच ले गई. ग्रामीणों को उनका आंशिक रूप से खाया हुआ शव मिला. ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने घटनास्थल से लगभग 200 मीटर दूर एक बाघिन को देखा था, जिसे माधव नेशनल पार्क प्रबंधन ने 'MT 6' नाम दिया है. पिछले कुछ हफ्तों से इस इलाके में इस जानवर की मौजूदगी की खबरें मिल रही थीं.

25 अप्रैल को विरोध कर रहे ग्रामीणों ने शिवपुरी-नरवर रोड पर चक्काजाम कर दिया और बाघिन को पकड़ने की मांग की. दो दिन बाद, वन विभाग ने जानवर को ट्रेंकुलाइज किया और उसे नेशनल पार्क के एक बाड़े में रख दिया.

वन विभाग ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है कि यह बाघ का ही हमला था. मध्य प्रदेश के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक, एल. कृष्णमूर्ति ने कहा है, "हम यह पता लगाने के लिए फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं कि क्या ग्रामीण को बाघ ने मारा था; और यदि ऐसा है, तो विशेष रूप से किस बाघ ने."

ग्वालियर रियासत के दिनों में शिवपुरी के आसपास के जंगल जानवरों के शिकार के लिए मशहूर थे. भारत में शिकार किए गए कुछ सबसे बड़े बाघ इन्हीं जंगलों के थे. हालांकि, तराई, बस्तर और सुंदरबन जैसे देश के अन्य क्षेत्रों के उलट, शिवपुरी के जंगलों में आदमखोर बाघों की खबरें नहीं मिली थीं.

ग्वालियर के इतिहास शोधकर्ता नीलेश कारकरे कहते हैं, "ग्वालियर रियासत के दिनों के वन्यजीवों के लिखित रिकॉर्ड मौजूद हैं, लेकिन मानव-पशु संघर्ष का कोई बड़ा उल्लेख नहीं है. शायद एक ब्रिटिश अधिकारी का जिक्र मिलता है जो उस बाघ का शिकार करने आया था जिसने एक आदमी को मारा था." इसी तरह के विचार लेफ्टिनेंट जनरल दुष्यंत चौहान (रिटायर्ड) के भी हैं, जिन्होंने अपना बचपन शिवपुरी में बिताया है.

तो फिर अब क्या बदल गया? माधव नेशनल पार्क ने अपने सभी बाघ खो दिए थे, लेकिन हाल ही में इसे टाइगर रिजर्व का दर्जा मिला. देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) ने आवास का अध्ययन किया और पार्क में पांच बाघों की वहन क्षमता तय की. रिजर्व में पहले तीन बाघ लाए गए, उसके बाद बांधवगढ़ नेशनल पार्क से बाघिन MT 6 सहित दो और बाघ लाए गए. इन स्थानांतरित बाघों से दो शावकों का जन्म भी हुआ है.

माधव नेशनल पार्क 350 वर्ग किमी में फैला है, जिसके आसपास कई गांव स्थित हैं. मध्य प्रदेश के प्रधान मुख्य वन संरक्षक शुभ्रंजन सेन ने कहा, "हालांकि कोर एरिया में गांव नहीं हैं, लेकिन करीब 50-60 गांव पार्क की सीमा के पास स्थित हैं."

रिजर्व से होकर दो हाईवे गुजरते हैं. करीब 3,00,000 की आबादी वाला शिवपुरी शहर नेशनल पार्क से मात्र 6 किमी दूर है. विशेषज्ञों का कहना है कि परिधि में इतनी बड़ी मानवीय आबादी होने के कारण जानवरों के साथ संघर्ष को संभालना आसान नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि ये जंगल ऐतिहासिक रूप से बाघों के आवास रहे हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए बारीकी से निगरानी आवश्यक है कि बाघ और इंसान अक्सर एक-दूसरे के रास्ते में न आएं.

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