
19 मई 2026 को बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने अपनी सबसे महत्वाकांक्षी योजना 'सहयोग शिविर' की शुरुआत की. इस मौके पर उन्होंने बताया कि इस शिविर का असली मकसद ग्रामीणों की परेशानियों का समाधान एक महीने के भीतर गांव में ही उपलब्ध कराना है.
इसके लिए राज्य की अलग-अलग पंचायतों में हर महीने के पहले और तीसरे मंगलवार को ऐसे शिविर आयोजित किए जाएंगे. हालांकि इस योजना के लागू होने से पहले से बिहार में 'लोक सेवा का अधिकार कानून' यानी RTPS लागू है.
RTPS में भी आम लोगों को हर सरकारी सेवा तय समय में उपलब्ध कराने का प्रावधान है. ऐसे में मुख्यमंत्री को नए सिरे से ऐसी योजना लागू करने की जरूरत क्यों पड़ी? बताया यह भी जा रहा है कि यह योजना छत्तीसगढ़ सरकार की 'सुशासन तिहार' योजना से प्रभावित है. वहां इस योजना के कैसे नतीजे सामने आ रहे हैं? इन दोनों सवालों के साथ इस योजना के दूसरे पहलुओं को भी समझने की कोशिश करेंगे.

19 मई को राज्य की 874 पंचायतों में एक साथ इस योजना की शुरुआत हुई. इस मौके पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सारण जिले की डुमरी बुजुर्ग पंचायत में लगे शिविर में पहुंचे थे. उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी पटना की चिरौरा पंचायत में मौजूद थे. सरकार के सभी मंत्रियों से कहा गया था कि वे जिन जिलों के प्रभारी मंत्री हैं, वहां के तीन अलग-अलग प्रखंडों की एक-एक पंचायत में जारी सहयोग शिविर में शामिल हों.
मुख्यमंत्री के आने की वजह से सारण जिले के डुमरी बुजुर्ग गांव में स्थानीय प्रशासन ने बेहतरीन व्यवस्था की थी. आयोजन स्थल पर शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व एवं भूमि सुधार, खाद्य आपूर्ति जैसे विभिन्न विभागों के स्टॉल जरूर लगे थे और वहां कर्मचारी भी बैठे थे. मगर वहां लोग शिकायत करने नहीं जा रहे थे. उन्हें बांस-बल्ले से घेर दिया गया था और सुरक्षाकर्मी किसी को वहां जाने नहीं दे रहे थे. बताया गया कि ऑनलाइन माध्यम से इस पंचायत की कुल 54 शिकायतें जिला प्रशासन को मिली थीं और प्रशासन ने उन सभी का समाधान कर दिया है.

ऐसे में मुख्यमंत्री के लिए बने मंच से ही उनका संबोधन हुआ. कुछ लाभार्थियों को प्रमाणपत्र सौंपे गए और आधा-पौन घंटे में यह शिविर समाप्त हो गया. मंच पर जमीन का पट्टा, राशन कार्ड, जन्म प्रमाणपत्र और पेंशन की सुविधा पाने वालों को मुख्यमंत्री ने अपने हाथों से कागजात सौंपे. उन्होंने अपनी इस बात को दोहराया कि उनका कार्यालय इस अभियान की निगरानी करेगा. ऑनलाइन पोर्टल और फोन नंबर से शिकायतें दर्ज कराई जा सकती हैं. उनका कार्यालय शिविर के 10 दिन, 20 दिन और 25 दिन बाद विभागों को रिमाइंडर भेजेगा. जिस शिकायत का समाधान 30 दिनों के भीतर नहीं हो पाएगा, उससे संबंधित अफसर 31वें दिन खुद सस्पेंड हो जाएंगे.
सभा स्थल पर मौजूद पड़ोस के गांव राजापुर से आए दर्जनों ग्रामीणों ने सभा के दौरान और उसके बाद हंगामा कर दिया. वे एक आवेदन लेकर आए थे. उनका कहना था कि उनके गांव में कथित रूप से चल रहे अवैध पोल्ट्री फार्म की वजह से काफी बदबू फैलती है और इसके कारण चार से पांच लोगों की मौत हो चुकी है. वे मुख्यमंत्री से मिलकर इस बारे में शिकायत करना चाहते थे मगर उन्हें मिलने नहीं दिया गया.

यह तो 19 मई को शुरू हुए सहयोग शिविर की कहानी है. मगर इसके साथ सवाल यह भी है कि आखिर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बिहार में सहयोग शिविर की शुरुआत करने की जरूरत क्यों पड़ी, खासकर तब जब बिहार में पहले से लोक सेवा का अधिकार कानून लागू है. 2011 में लागू हुए इस कानून के तहत हर सरकारी सेवा समयबद्ध तरीके से मिलने का प्रावधान है. इस कानून में सेवा उपलब्ध न कराने पर अधिकारियों पर आर्थिक दंड का भी प्रावधान है हालांकि इसमें अपील के चरणों से गुजरना पड़ता है.
दोनों योजनाओं में कुछ बुनियादी फर्क हैं. जैसे लोक सेवा का अधिकार सरकारी सेवा पाने का कानून है, जबकि सहयोग शिविर सेवा न मिलने पर शिकायत करने का माध्यम है. मगर यह बात भी सच है कि सहयोग शिविर लगाया ही इसलिए जा रहा है क्योंकि लोक सेवा का अधिकार कानून ठीक से लागू नहीं हो पाया. समयबद्ध सेवा और अधिकारियों को दंड के प्रावधान के बावजूद यह कानून लोगों को बहुत राहत नहीं दे पा रहा है. इसीलिए सम्राट चौधरी ने सहयोग शिविर में अधिकारियों के खिलाफ स्वतः निलंबन का प्रावधान रखा है.
यह सम्राट चौधरी का ड्रीम प्रोजेक्ट है. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने कहा था कि लोगों को सबसे अधिक परेशानी स्थानीय स्तर पर काम न होने से होती है. इसके समाधान के लिए वे अपने कार्यालय से अभियान चलाना चाहते हैं.
हालांकि कई जानकार बताते हैं कि यह सहयोग शिविर अभियान छत्तीसगढ़ के 'सुशासन तिहार' से प्रेरित है. वहां अभी 1 मई से 10 जून तक यह अभियान चल रहा है. 'दैनिक छत्तीसगढ़' अखबार के संपादक सुनील कुमार बताते हैं, " डॉ. रमन सिंह जब मुख्यमंत्री थे तभी ऐसा एक अभियान शुरू हुआ था. गर्मियों में ऐसे शिविर लगते थे और मुख्यमंत्री बिना बताए किसी भी शिविर में चले जाते थे. बाद में जो भी मुख्यमंत्री आए उन्होंने किसी न किसी तरीके से इस प्रथा को जारी रखा. कांग्रेस के भूपेश बघेल भी ऐसा करते रहे. बिहार के सहयोग शिविर और छत्तीसगढ़ के सुशासन तिहार में सिर्फ इतना फर्क है कि हमारे यहां अधिकारियों के निलंबन की व्यवस्था नहीं है."
सुनील यह भी बताता हैं कि छत्तीसगढ़ में इस अभियान को करीब 20 साल हो चुके हैं लेकिन हालात में कुछ खास सुधार नहीं दिखता. उनके मुताबिक कहते हैं, "गांव के लोग सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए हमेशा परेशान रहते हैं. इन शिविरों से सरकार की थोड़ी पब्लिसिटी जरूर हो जाती है और कुछ दिनों के लिए माहौल बन जाता है, बाकी कुछ बदलता नहीं. मेरा तो स्पष्ट मानना है कि चूंकि सरकार लोगों को न्याय और योजनाओं का लाभ दिलाने में पूरी तरह विफल है इसलिए यह सब किया जाता है. आपके यहां इसका क्या असर होता है, यह देखने वाली बात होगी."
कुछ जानकार इस तरफ भी इशारा करते हैं कि पिछली सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे विजय कुमार सिन्हा ने भी 'भूमि सुधार जनकल्याण संवाद' चलाया था, जो काफी सफल रहा था. इसकी वजह से विजय कुमार सिन्हा काफी लोकप्रिय हो गए थे. ऐसे में यह एक आजमाया हुआ अभियान है.
विजय कुमार सिन्हा और सम्राट चौधरी की पिछली सरकारों में प्रतिद्वंद्विता की खबरें भी आती रही हैं. जानकारों को लगता है कि सम्राट अपने प्रतिद्वंद्वी रहे विजय कुमार सिन्हा के पिछले अभियान से सीखकर अपने लिए भी एक लोकप्रिय अभियान चलाने की कोशिश कर रहे हैं.

