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संभल में अफसरों के कामकाज पर बार-बार विवाद खड़ा क्यों होता है?

नमाज़ पर पाबंदी, विवादित बयान और हाई कोर्ट की फटकार के बाद संभल में प्रशासनिक फैसलों के तौर-तरीकों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं

Sambhal CO issued a warning (Photo- ITG)
मस्जिद में नमाजियों की संख्या सीमित करने को लेकर प्रशासन के आदेश से संभल में ताजा विवाद शुरू हुआ है (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 मार्च , 2026

उत्तर प्रदेश का संभल जिला एक बार फिर प्रशासनिक फैसलों और पुलिस अधिकारियों के बयानों की वजह से सुर्खियों में है. बीते कुछ महीनों में यहां ऐसे कई घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली ही इस जिले को बार-बार विवादों के केंद्र में ला रही है. 

रमज़ान के दौरान मस्जिद में नमाज़ियों की संख्या सीमित करने के आदेश से शुरू हुआ विवाद अब अदालत, राजनीति और सामाजिक बहस तक फैल चुका है. इस पूरे प्रकरण ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के तरीके और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं.

हालिया विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब संभल के स्थानीय प्रशासन ने एक मस्जिद में नमाज़ पढ़ने वालों की संख्या को सीमित करने का आदेश जारी किया. प्रशासन की ओर से कहा गया कि कानून-व्यवस्था की स्थिति को देखते हुए मस्जिद परिसर में केवल 20 लोगों को ही नमाज़ पढ़ने की अनुमति दी जाएगी. यह फैसला उस समय लिया गया जब रमज़ान का महीना चल रहा था और स्वाभाविक रूप से मस्जिदों में नमाज़ियों की संख्या अधिक होती है. 

इस आदेश के खिलाफ मुनज़िर खान नाम के व्यक्ति ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. याचिका में कहा गया कि गाटा संख्या-291 पर स्थित जमीन पर एक मस्जिद है और रमज़ान के दौरान वहां नमाज़ पढ़ने से रोका जा रहा है. याचिकाकर्ता का कहना था कि मस्जिद परिसर में अधिक संख्या में लोग आसानी से नमाज़ पढ़ सकते हैं, लेकिन प्रशासन ने बिना उचित कारण के संख्या सीमित कर दी. इस मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने 14 मार्च को प्रशासन के रुख पर सख्त टिप्पणी की. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह हर समुदाय को उसके निर्धारित पूजा स्थल पर शांतिपूर्वक पूजा करने की अनुमति सुनिश्चित करे. 

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई धार्मिक गतिविधि निजी संपत्ति के भीतर हो रही है तो उसके लिए राज्य से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती. अदालत ने यह भी कहा कि राज्य का हस्तक्षेप केवल तब आवश्यक होता है जब धार्मिक कार्यक्रम सार्वजनिक भूमि पर आयोजित किए जा रहे हों या वे सार्वजनिक संपत्ति तक फैल रहे हों.

राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वकील ने अदालत में दलील दी कि कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को देखते हुए नमाज़ियों की संख्या सीमित करने का आदेश दिया गया था. लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया. कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की जिम्मेदारी है और प्रशासन इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकता. अदालत की सबसे तीखी टिप्पणी स्थानीय प्रशासन को लेकर थी. कोर्ट ने कहा कि अगर जिला प्रशासन या पुलिस अधिकारियों को लगता है कि वे कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं और इसी वजह से उन्हें मस्जिद के भीतर नमाज़ियों की संख्या सीमित करनी पड़ रही है, तो उन्हें या तो अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए या फिर संभल से अपना तबादला करवा लेना चाहिए.

अदालत की इस टिप्पणी ने पूरे मामले को और ज्यादा चर्चा में ला दिया. हालांकि राज्य सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि संबंधित जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद है. सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि राजस्व रिकॉर्ड में गाटा संख्या-291 मोहन सिंह और भूराज सिंह के नाम पर दर्ज है. अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई 16 मार्च के लिए तय की है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह पूरक हलफनामा दाखिल करके उस जगह की तस्वीरें और राजस्व रिकॉर्ड पेश करे, जहां नमाज़ अदा की जानी है.

इससे ठीक तीन दिन पहले, संभल में एक और विवाद उस समय खड़ा हो गया जब सर्कल ऑफिसर कुलदीप कुमार का एक बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. यह बयान एक शांति समिति की बैठक के दौरान दिया गया था. बैठक में उन्होंने लोगों से कहा कि अगर किसी को ईरान और इज़राइल के बीच चल रहे संघर्ष को लेकर इतनी चिंता है, तो वह भारत से ईरान जाने वाले विमान में बैठकर वहां जा सकता है और ईरान की तरफ से लड़ सकता है. वायरल वीडियो में उन्हें यह कहते हुए सुना जा सकता है कि कुछ लोगों को “खुजली” हो रही है कि ईरान और इज़राइल के बीच संघर्ष चल रहा है और वे उसमें अपनी दिलचस्पी दिखा रहे हैं. उन्होंने कहा कि अगर किसी को इतनी ही परेशानी है तो वह विमान में बैठकर ईरान जा सकता है, वहां जाकर लड़ सकता है और फिर वापस लौट सकता है.

हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत में किसी को भी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों के नाम पर कानून-व्यवस्था खराब करने की अनुमति नहीं दी जाएगी. उनके अनुसार अगर किसी ने जुमे या ईद की नमाज़ के दौरान किसी दूसरे देश के समर्थन या विरोध में नारेबाजी की, पोस्टर लगाए या माहौल बिगाड़ने की कोशिश की, तो पुलिस कड़ी कार्रवाई करेगी. सीओ कुलदीप कुमार ने लोगों से यह भी अपील की कि त्योहारों को आपसी मेल-मिलाप का अवसर माना जाना चाहिए और किसी भी तरह का तनाव पैदा करने से बचना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि कई लोग सोशल मीडिया पर रील बनाने या वायरल होने के लिए भड़काऊ बयान देते हैं, जिससे माहौल खराब होता है. लेकिन उनके बयान के कुछ हिस्सों ने विवाद को जन्म दे दिया. विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने इसे आपत्तिजनक बताया. इस बयान के सामने आने के बाद संभल के पुलिस अधीक्षक के. के. विश्नोई ने भी सर्कल ऑफिसर से स्पष्टीकरण मांग लिया.
 
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी तेज रही. AIMIM के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने इस बयान की तीखी आलोचना की. उनका कहना था कि किसी पुलिस अधिकारी को यह अधिकार नहीं है कि वह नागरिकों को यह बताए कि वे किस मुद्दे पर बोल सकते हैं और किस पर नहीं. ओवैसी ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहां नागरिकों को संविधान के तहत बोलने की स्वतंत्रता प्राप्त है. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19 का हवाला देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर नागरिक का अधिकार है. उन्होंने यह भी कहा कि विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछना या राय रखना किसी भी नागरिक का अधिकार है. ओवैसी ने यह भी सवाल उठाया कि अगर लोग अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं तो इससे कानून-व्यवस्था का संकट कैसे पैदा हो सकता है. अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा कि देश संविधान से चलेगा, किसी अधिकारी की व्यक्तिगत राय से नहीं. उन्होंने आरोप लगाया कि संभल में पुलिस का रवैया पक्षपातपूर्ण दिखाई दे रहा है.

संभल में प्रशासनिक फैसलों और पुलिस अधिकारियों के बयानों से पैदा हुए विवाद कोई नई बात नहीं हैं. पिछले कुछ समय से यह जिला लगातार ऐसे घटनाक्रमों के कारण सुर्खियों में बना हुआ है, जिनमें प्रशासनिक संवेदनशीलता और स्थानीय सामाजिक संतुलन को लेकर सवाल उठते रहे हैं. मुरादाबाद के वरिष्ठ एडवोकेट अतहर खान कहते हैं, “संभल प्रशासन को राज्य सरकार ने कुछ ढील दे रखी है जिसकी वजह से यहां अधिकारी मनबढ़ हो गए हैं. प्रशासन अक्सर कानून-व्यवस्था के नाम पर ऐसे फैसले ले लेता है, जो बाद में विवाद का कारण बन जाते हैं. मस्जिद में नमाज़ियों की संख्या सीमित करने का आदेश भी इसी श्रेणी का फैसला है.” 

कानून-व्यवस्था बनाए रखना निश्चित रूप से प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन अदालत की टिप्पणी ने यह संकेत दिया है कि इस जिम्मेदारी को निभाने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अगर प्रशासन संभावित विवाद की आशंका के आधार पर धार्मिक गतिविधियों पर पाबंदी लगाता है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह समाधान है या समस्या को टालने की कोशिश. अतहर खान के मुताबिक संभल के मामले में अदालत का रुख स्पष्ट है कि राज्य का कर्तव्य है कि वह हर समुदाय को उसके धार्मिक अधिकारों का पालन करने की स्वतंत्रता दे. 

अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि कानून-व्यवस्था की आशंका का मतलब यह नहीं है कि प्रशासन नागरिक अधिकारों को सीमित कर दे. हालांकि संभल को समाहित करने वाले मुरादाबाद मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, “संवेदनशील इलाकों में छोटी-सी घटना भी बड़े तनाव का कारण बन सकती है, इसलिए कई बार एहतियाती कदम उठाने पड़ते हैं. नमाजियों की संख्या सीमित करने का निर्णय किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं बल्कि संभावित तनाव को रोकने के लिए उठाया गया था.” 

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