
नया साल अमूमन हर इंसान-संगठनों के लिए नई उम्मीदों-संकल्पों का वक्त होता है. इसलिए इंडिया टुडे ने RJD से 2026 की शुरुआत में उसकी भविष्य की तैयारी के बारे में सवाल किया तो पार्टी के वरिष्ठ नेता और प्रवक्ता चितरंजन गगन का कहना था, “हम हतोत्साहित नहीं हैं. नतीजे भले हमारे खिलाफ आए, लेकिन हमारे वोट में कमी नहीं आई है. जितने वोट 2020 में मिले थे, लगभग उतने ही वोट इस बार भी मिले हैं. अगर पारदर्शी चुनाव होते तो इस बार हमारी ही सरकार बनती. जहां तक सीटों का सवाल है, हम पहले भी ऐसी स्थिति का सामना कर चुके हैं. 2010 में तो हमें सिर्फ 22 सीटें मिली थीं, मगर उससे उबर कर हम बिहार की नंबर एक पार्टी बने. हमारे नेता पर हमला होना, उन्हें केस-मुकदमों में फंसाना भी कोई नई बात नहीं है. हम हर परिस्थिति झेलने के आदी हैं और उससे उबरते भी रहे हैं, इस बार भी उबरेंगे.”
गगन इस जवाब के साथ एक तरह से इतिहास और अपनी पार्टी की विरासत के जरिये यह साबित करने की कोशिश कर रहे होते हैं कि RJD ऐसी मुश्किल परिस्थितियों से उबरना जानती है. मगर क्या इस बार भी सचमुच ऐसा हो पाएगा? यह कहना मुश्किल है, क्योंकि भले ही इस बार पार्टी को 2010 के मुकाबले तीन सीटें अधिक मिली हों, मगर जिस तरह नतीजों के डेढ़ महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी पार्टी के लीडर तेजस्वी यादव मौन हैं, वे लंबे अरसे से बिहार से बाहर हैं और राज्य में हो रही किसी भी घटना पर प्रतिक्रिया नहीं दे रहे. वह संकेत दे रहा है कि इन नतीजों ने RJD के नेतृत्व को गंभीर संकट में डाल दिया है.
संकट यह है कि इन नतीजों के बाद परिवार और गठबंधन, दोनों तरफ से तेजस्वी यादव के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं. तेजस्वी की बड़ी बहन रोहिणी आचार्य हार के दिन से ही तेजस्वी और उनके करीबी संजय यादव और रमीज पर सवाल खड़े कर रही हैं. महागठबंधन के सहयोगियों में से एक कांग्रेस के बड़े नेता शकील अहमद खान कह रहे हैं कि RJD के साथ होने का कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ, अब पार्टी को राज्य में अकेले चलना चाहिए.
पार्टी कार्यकर्ता तो सीधे तेजस्वी के नेतृत्व पर सवाल खड़े नहीं कर रहे मगर वे उनके विश्वस्त और सबसे करीबी संजय यादव को इस हार का विलेन करार दे रहे हैं और कह रहे हैं कि संजय यादव पार्टी के कार्यकर्ता और तेजस्वी के बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं. इस बीच इन हालात का फायदा उठाते हुए सत्ता पक्ष भी लगातार RJD और लालू परिवार पर हमलावर है. उन्हें सरकारी आवास खाली करने का नोटिस मिल गया है. उनके बंगलों को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
हालांकि RJD में हार के कारणों को लेकर समीक्षा बैठक हुई है. तेजस्वी की गैरहाजिरी की वजह से इसकी रिपोर्ट को सामने तो नहीं आने दिया गया है. मगर पार्टी के लोग बताते हैं कि इस रिपोर्ट में हार की मुख्य वजह चुनाव आयोग के कामकाज में निष्पक्षता का अभाव और सरकार द्वारा जीविका दीदियों को दस हजार रुपये की सहायता देकर वोट को अपने पक्ष में करने की कोशिश बताया गया है.
मगर साथ ही साथ लोगों ने बड़े पैमाने पर पार्टी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं. ज्यादातर लोगों का कहना है कि तेजस्वी के करीबी राज्यसभा सांसद संजय यादव और उनकी टीम ने जिस तरह से काम किया वह हार की प्रमुख वजह बनी. कहा जा रहा है कि संजय यादव पार्टी कार्यकर्ता और तेजस्वी यादव के बीच दीवार बन गए थे. वे लोगों के साथ तेजस्वी को सहजता से मिलने नहीं देते थे, जिससे तेजस्वी को जमीनी स्थितियों का पता नहीं चल पा रहा था. इसके साथ उनकी उन एजेंसियों पर भी सवाल उठे जिन्हें चुनाव प्रबंधन का जिम्मा था. कहा गया कि वे उम्मीदवारों तक से सीधे संपर्क में नहीं थीं.

यह भी कहा गया कि एक तरफ पार्टी A to Z यानी सभी जातियों की पार्टी बनना चाहती है, अलग-अलग जातियों को जोड़ने में जुटी है. मगर पार्टी में एक तबके ने आंबेडकरवादी और पेरियारवादी विचारधारा को बढ़ावा दिया, जिससे सवर्ण वोटर पार्टी के साथ आने में कतराने लगे. उन प्रवक्ताओं पर भी सवाल खड़े किए गए जो टीवी चैनलों पर काफी आक्रामक थे. यह भी कहा गया कि पार्टी के कोर समर्थक अतिआत्मविश्वास में थे, उनकी अतिसक्रियता ने भी सवर्णों और अति पिछड़ी जातियों को ऐन वक्त पर पार्टी से दूर कर दिया. इसके अलावा एक वजह यह भी बताई गई कि पार्टी महिला वोटरों को जोड़ नहीं पाई.
RJD अब क्या करेगी?
चूंकि तेजस्वी यादव अभी बिहार से बाहर हैं इसलिए पार्टी का कोई बड़ा नेता इस सवाल पर सीधे अपनी टिप्पणी करने से बच रहा है. पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मंगनीलाल मंडल जिन्हें हटाए जाने की खबरें अचानक मीडिया में चलने लगी हैं, कहते हैं, “हमारा पहला लक्ष्य तो जन समर्थन और जनाधार को बढ़ाना है. इसके लिए हम सदस्यता अभियान चलाएंगे. संगठन को मजबूत करेंगे. दो-तीन दिन में तेजस्वी जी भी पटना आ जाएंगे उसके बाद आगे के कार्यक्रमों पर विस्तार से चर्चा होगी.”
हालांकि पार्टी के अलग-अलग धड़ों के नेता जो अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं, उसके मुताबिक पार्टी इन बिंदुओं पर काम करने की योजना बना रही है.
1. संगठन की मजबूती- बताया जा रहा है कि पार्टी जल्द जिला और प्रखंड स्तर पर नई कमेटियों का गठन करेगी.
2. पार्टी के आधार वोट में अन्य जातियों को जोड़ने का प्रयास- इस कोशिश में RJD लंबे अरसे से है, एक बार फिर से वह इसके लिए कोशिश करेगी.
3. संजय यादव का रसूख कम किया जा सकता है. पार्टी चाहेगी कि वे तेजस्वी के साथ सार्वजनिक रूप से कम से कम नजर आएं. उनके अधिकारों में भी कटौती की जा सकती है. कुछ नये चेहरे सामने आ सकते हैं.
4. तेजस्वी यादव कार्यकर्ताओं और आमलोगों के साथ खुलकर मिलेंगे. इसके लिए वे अपने पिता लालू यादव की कार्यशैली को अपना सकते हैं.
5. आंबेडकरवादी-पेरियारवादी विचारों के सार्वजनिक उल्लेख से परहेज. हालांकि पार्टी इन विचारों के आधार पर जमीनी स्तर पर लोगों को जोड़ने का काम करेगी.
6. तेजस्वी यात्रा बिहार यात्रा पर निकल सकते हैं ताकि वे लोगों से घुलमिल सकें. हालांकि पार्टी के सीनियर नेता फिलहाल किसी यात्रा की योजना से इनकार कर रहे हैं.
7. पार्टी चाहेगी कि महागठबंधन बना रहे. इसके लिए गठबंधन के साथियों से बातचीत कर उनकी नाराजगी को कम करने का प्रयास किया जा सकता है.
हालांकि यह सब बताते हुए पार्टी के नेता यह भी कहते हैं कि आखिरी फैसला तेजस्वी ही लेंगे. ये सब पार्टी के सीनियर नेताओं के सुझाव हैं. अब वे इसे कितना मानते हैं, यह देखने वाली बात होगी.
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “हार के बाद जिस तरह तेजस्वी गैरहाजिर हैं और इस बीच हुई घटनाओं पर भी मौन रहे उससे तो यही लगता है कि वे खुद डिप्रेस्ड या कहें कि साफ-साफ शब्दों में बात करने की हालत में नहीं हैं. यह किसी भी पार्टी के लिए अच्छा नहीं है कि उसका नेता खुद मौन हो जाए. यह समय आगे आकर पार्टी को हौसला देने और एकजुट रखने का था. अब अगर वे पार्टी को बचाना चाहते हैं तो उन्हें जल्द से जल्द अपने कार्यकर्ताओं के बीच आकर सक्रिय होना चाहिए.”
पुष्पेंद्र के मुताबिक महागठबंधन के दलों में RJD को लेकर नाराजगी भी स्वाभाविक है. महागठबंधन में ऐन चुनाव से पहले बिखराव की वजह RJD और तेजस्वी की कार्यशैली रही. उन्हें आकर इसे ठीक करना होगा. अगर नहीं करते हैं तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ RJD का होगा. क्योंकि दूसरी पार्टियों में यह सवाल उठने लगे हैं कि अगर साथ रहने से कोई फायदा नहीं है तो अकेले क्यों न चुनाव लड़ें. कांग्रेस ही नहीं वाम दलों में भी ऐसे सवाल उठ रहे हैं.

