बाघों को लेकर हमारे आकर्षण को देखते हुए, देश में हर चार साल में एक बार इस ताकतवर जानवर का सर्वे होता है. बाघ प्रेमियों के बीच बेसब्री से इस सर्वे के परिणाम का इंतजार रहता है.
बाघों की तरह ही मध्य प्रदेश और तीन अन्य राज्यों में एक और सर्वे होने वाला है. दरअसल, शिकारी पक्षियों की संख्या पता करने के लिए ये सर्वे वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर यानी WWF इंडिया कर रहा है.
WWF इंडिया के मुताबिक, इस सर्वे से जुड़े अहम आंकड़े जुलाई में शेयर किए जाएंगे. बाघों की तरह ही पक्षी प्रेमी इस सर्वे रिजल्ट को लेकर भी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. उन्हें लगता है कि शिकारी पक्षियों से जुड़े ये आंकड़े बेहद दिलचस्प होंगे.
WWF इंडिया ने मध्य प्रदेश के बाद कर्नाटक, असम और राजस्थान में भी यह सर्वेक्षण करने का फैसला किया है. WWF इंडिया की टीमों ने सर्वे के लिए पूरे मध्य प्रदेश को 10x10 किलोमीटर के 12,000 ग्रिडों में विभाजित किया है. सर्वे में कुल ग्रिडों का लगभग 30 फीसद हिस्सा शामिल होगा, जिसमें राज्य के सभी संरक्षित क्षेत्र शामिल होंगे.
अलग-अलग टीमें जंगलों में और सड़क मार्ग से यात्रा करेंगी. इस यात्रा के दौरान आसपास दिखाई देने वाले किसी भी शिकारी पक्षी को रिकॉर्ड किया जाएगा. उसकी तस्वीरें ली जाएंगी. बाद में इस डेटा का एनालिसिस किया जाएगा. नमूनों की पहचान की जाएगी और फिर शिकारी पक्षियों की संख्या को लेकर एक अनुमान लगाया जाएगा.
सर्वे के परिणाम जुलाई तक आ जाएंगे. पिछले साल राजस्थान में किए गए इसी तरह के सर्वे में शिकारी पक्षियों की 45 प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई थी.
आखिर शिकारी पक्षी क्या होते हैं और उनकी संख्या को जानना क्यों अहम है? दरअसल ये ऐसे पक्षी होते हैं. जिनकी चोंच और पंजे शिकार करने और मांस खाने के लिए होते हैं. सरल शब्दों में कहें तो, वे शिकार करने में सक्षम होते हैं.
हालांकि, समुद्री पक्षी गल और चमकीले रंगों वाला एक छोटा पक्षी किंगफिशर भी शिकार करते हैं, लेकिन उन्हें शिकारी पक्षियों की श्रेणी में नहीं रखा जाता. गिद्ध भले ही शिकारी नहीं होते, फिर भी उन्हें शिकारी पक्षियों की श्रेणी में रखा जाता है. आम शिकारी पक्षियों में चील, बाज, उल्लू और फाल्कन शामिल हैं.
इंडिया टुडे ने पिछले सप्ताह मध्य प्रदेश के रातापानी टाइगर रिजर्व में सर्वेक्षण दल के साथ कुछ वक्त बिताया. दिन ढलने के साथ-साथ कई शिकारी पक्षी यहां नजर आए. कई पक्षी पेड़ों की चोटी पर धूप सेंकते हुए देखे गए. इन शिकारी पक्षियों में छोटे पैर वाला नाग चील, बोनेली चील, काला-पंख वाला चील, बड़ा चित्तीदार चील, कलगीदार सर्प चील, मिस्र का गिद्ध और जंगली उल्लू शामिल थे.
WWF इंडिया के रैप्टर प्रोजेक्ट ऑफिसर प्रतीक देसाई कहते हैं, “शिकारी पक्षी पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में योगदान देते हैं. यह सर्वे अन्य जानवरों या पक्षियों से जुड़े सर्वे का आधार बनेगा. अगर टीम को किसी जानवर का शव मिलता है, तो वे इसका नमूना जमा करते हैं और उसमें डाइक्लोफेनाक की जांच करवाते हैं. इससे हमें पता चलेगा कि डाइक्लोफेनाक पर प्रतिबंध सफल रहा है या नहीं.”
घरेलू पशुओं में डाइक्लोफेनाक के उपयोग से गिद्धों की आबादी में भारी गिरावट आई है क्योंकि डाइक्लोफेनाक युक्त शवों का सेवन करने वाले गिद्ध स्वस्थ अंडे नहीं दे पाते. अधिकांश शिकारी पक्षियों की आबादी रेगिस्तानों और घास के मैदानों में पाई जाती है. इनकी संख्या का सर्वे इन जगहों पर पर्यावरण के बारे में भी जानकारी प्रदान करेगा.
वर्तमान में शिकारी पक्षियों के बारे में बहुत कम बुनियादी डेटा उपलब्ध है. एकमात्र डेटा ई-बर्ड पर संग्रहित है, जो कॉर्नेल विश्वविद्यालय का एक वेबसाइट है. यहां शौकिया लोग किसी भी पक्षी को देखने के बाद जानकारी देते हैं. 1990 के दशक से ई-बर्ड के डेटा से पता चलता है कि भारत में लगभग 60 प्रजातियों के शिकारी पक्षी पाए जाते हैं.
शिकारी पक्षी भी प्रवासी होते हैं. मार्च 2025 में मध्य प्रदेश के सतना में टैग किए गए एक यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध को कजाकिस्तान की यात्रा करते हुए देखा गया. बाद में दोबारा से अक्टूबर में वह भारत लौट आया. देसाई का कहना है कि भारत में सबसे बड़ा शिकारी पक्षी सिनेरस गिद्ध है और सबसे छोटा कॉलर वाला फाल्कनेट है, जो पूर्वोत्तर में पाया जाता है.

