झुंझुनूं जिले के सुलताना गांव में डेयरी चलाने वाले जितेंद्र ने चार माह पहले अपना डेयरी कारोबार बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना में 10 लाख रुपए के लोन के लिए आवेदन किया था. मगर अब तक सरकारी दफ्तरों और बैंकों के चक्कर के अलावा उन्हें ज्यादा कुछ हासिल नहीं हुआ है. जितेंद्र अकेले नहीं हैं. पूरे प्रदेश में उनके जैसे करीब एक लाख नौजवान हैं, जिन्हें इस योजना में आवेदन करने के बाद भी सिर्फ तारीखें ही मिल रही हैं.
राजस्थान में बेरोजगार युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने और उन्हें उद्यमी बनाने के बड़े दावों के साथ शुरू की गई मुख्यमंत्री युवा स्वरोजगार योजना शुरुआती दौर में ही सुस्त रफ्तार का शिकार हो गई है. प्रदेशभर से एक लाख युवाओं ने 10 लाख रुपए तक के ब्याजमुक्त ऋण के लिए आवेदन किए, मगर अब तक पूरे राजस्थान में केवल 99 युवाओं के खातों में ही लोन राशि पहुंची है.
वित्त मंत्री दीया कुमारी ने अपने बजट भाषण में दावा किया था कि इस साल इस योजना के तहत 30 हजार युवाओं को स्वरोजगार के लिए लोन मिलेगा. मगर हजारों आवेदन लचर बैंकिंग प्रक्रिया, गारंटर के अभाव और दस्तावेजी जांच में अटके पड़े हैं.
ऐसे में सरकार के बड़े वादों और जमीन पर दिख रही हकीकत के बीच बड़ा अंतर सामने आ रहा है. हालात यह हैं कि प्रदेश के 15 जिलों में इस योजना के तहत एक भी युवा को लोन नहीं मिला है. सूबे के 9 जिले ऐसे हैं, जहां योजना के तहत 40 हजार से ज्यादा युवाओं ने आवेदन किए, मगर फायदा सिर्फ एक-एक युवा को मिला. इन जिलों में अलवर, डूंगरपुर, चूरू, खैरथल-तिजारा, कोटपूतली बहरोड़, बीकानेर, झालावाड़, बांसवाड़ा और करौली का नाम शामिल है. दौसा, राजसमंद, जैसलमेर, बाड़मेर और प्रतापगढ़ जिलों में दो-दो लोगों को इस योजना का लाभ मिला. वहीं जयपुर शहर और जयपुर ग्रामीण जिलों में तीन-तीन नौजवानों को लोन मिला. पाली और भीलवाड़ा में सबसे ज्यादा 6 युवा इस योजना से लाभांवित हुए. वहीं भरतपुर और सांचोर में 4-4 नौजवानों को लोन राशि मिली.
12 जनवरी 2026 को इस योजना को लॉन्च करते हुए सरकार ने इसे ‘गेम चेंजर’ तक कहा था. मगर अब यह योजना सरकारी नियमों, फाइलों और बैंकों की सुस्त रफ्तार में इस तरह उलझ गई है कि इसे धरातल पर लाने के लिए सरकार को भी कोई राह नजर नहीं आ रही है. दावा यह भी किया गया था कि फोटोग्राफी, ब्यूटी पार्लर, सिलाई मशीन, डेयरी जैसे कारोबार के लिए भी युवाओं को 10 मिनट में 10 लाख रुपए तक का लोन मिलेगा. मगर 10 मिनट तो दूर, 100 दिन बाद भी आवेदन करने वाले अधिकांश युवाओं का लोन पाने का सपना पूरा नहीं हो पाया है.
योजना में शैक्षणिक योग्यता के आधार पर तीन अलग-अलग श्रेणियां निर्धारित की गई हैं. 8वीं पास युवाओं को सेवा और व्यापार के लिए 3.5 लाख रुपए और विनिर्माण के लिए 7.5 लाख रुपए का प्रावधान है. स्नातक और आईटीआई करने वाले युवाओं को व्यापार के लिए 5 लाख रुपए और विनिर्माण के लिए 10 लाख रुपए तक का लोन दिए जाने का प्रावधान किया गया है. आवेदन करने वाले हर युवा को सरकार के SSO पोर्टल पर अपनी आईडी बनाकर इस योजना के लिए आवेदन करना होता है. सरकार ने इस वित्त वर्ष में इस योजना के लिए 4427 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है.
अब तक जिन 1 लाख युवाओं ने इस योजना के तहत आवेदन किया, वाणिज्य विभाग ने उनमें से 45 हजार आवेदन मंजूर कर बैंकों को भेजे. मगर बैंकों ने गारंटर, अधूरे दस्तावेज और पात्रता पूरी नहीं करने जैसे कारण बताकर इन आवेदनों को फाइलों में ही दफन कर दिया. इस योजना को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि सरकार ने योजना लॉन्च करने से पहले बैंकिंग सिस्टम के साथ तालमेल क्यों नहीं किया?
इस योजना की सुस्त रफ्तार के चलते प्रदेश की भजनलाल सरकार अब विपक्ष के निशाने पर है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने योजना की धीमी रफ्तार पर सवाल उठाते हुए कहा है, "मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के नाम पर प्रदेश के नौजवानों के साथ धोखा किया जा रहा है. सरकार को विज्ञापनों से बाहर निकलकर बैंकों की जवाबदेही और जमीनी हालात सुधारने चाहिए."
उधर, सरकार अब जिला स्तर पर समीक्षा बैठकों और शिविरों के जरिए प्रक्रिया तेज करने की बात कह रही है. जयपुर जिला कलेक्टर संदेश नायक का कहना है, "हमने योजना की समीक्षा कर बैंक अधिकारियों को लंबित आवेदनों का जल्द निस्तारण करने के निर्देश दिए हैं. जिला अधिकारी अब जगह-जगह शिविर लगाकर योजना का व्यापक प्रचार-प्रसार करेंगे."
विपक्ष और सरकार के तर्क अपनी जगह हैं, मगर बड़ा सवाल यह है कि क्या यह योजना सचमुच युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का माध्यम बनेगी या फिर सरकारी घोषणाओं और बैंकिंग फाइलों के बीच दम तोड़ देगी?

