राजस्थान में यूथ कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव राहुल गांधी के आंतरिक लोकतंत्र मॉडल के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं. कांग्रेस में नामांकन संस्कृति को खत्म कर आम कार्यकर्ताओं की भूमिका बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू की गई चुनाव की यह पहल अब अपने लक्ष्य से भटकती नजर आ रही है. चुनावी मैदान में पैसे, संसाधन और पावर का खुला खेल दिखाई दे रहा है.
सोशल मीडिया कैंपेन से लेकर स्थानीय स्तर पर नेटवर्किंग तक, हर जगह वही उम्मीदवार आगे दिख रहा है जिसने ज्यादा पैसे, ताकत और संसाधनों का उपयोग किया है. हालात ये हैं कि हर जिले की सड़कें चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों के बैनर और पोस्टर से अटी पड़ी हैं. हजारों गाड़ियां उम्मीदवारों के पक्ष में चुनाव प्रचार में जुटी हैं.
यही वजह है कि ये चुनाव अब युवा कांग्रेस के अब तक के सबसे महंगे चुनावों में गिने जाने लगे हैं. इसी कारण सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले कार्यकर्ताओं के लिए मुकाबला करना लगातार मुश्किल हो गया है.
राजनीतिक विश्लेषक डॉ. गजेंद्र सिंह फोगाट कहते हैं, "यूथ कांग्रेस के ये चुनाव अब केवल संगठनात्मक प्रक्रिया नहीं रहे. राहुल गांधी ने इन चुनावों को जिस ग्रासरूट लीडरशिप की प्रयोगशाला के तौर पर प्रचारित किया था, अब उस पर संसाधन आधारित सियासत का प्रभाव साफ नजर आ रहा है. कांग्रेस के भीतर ये चुनाव स्थानीय सत्ता समीकरण तय करने का माध्यम बन चुके हैं. पैसे और संसाधनों के बढ़ते इस्तेमाल और गुटीय समर्थन का यही ट्रेंड जारी रहा, तो राहुल गांधी के आंतरिक लोकतंत्र का मॉडल केवल कागजों तक सीमित होकर रह जाएगा."
राजस्थान में 21 अप्रैल से शुरू हुई युवा कांग्रेस चुनाव की प्रक्रिया अब पैसे और पावर के साथ ही अशोक गहलोत और सचिन पायलट गुट के बीच अस्तित्व की लड़ाई भी बन चुकी है. दोनों गुट अपने उम्मीदवारों की जीत के लिए पूरी ताकत झोंक चुके हैं. दोनों गुटों के बीच चल रही इस रस्साकसी ने इन चुनावों को संगठनात्मक प्रक्रिया से कहीं आगे बढ़ाकर सियासी शक्ति प्रदर्शन में बदल दिया है.
हालांकि चुनाव में 20 उम्मीदवार अपना भाग्य आजमा रहे हैं, मगर सबसे ज्यादा नजरें प्रदेश अध्यक्ष पद पर टिकी हैं. यहां अभिषेक चौधरी और अनिल चोपड़ा के बीच सीधी भिड़ंत बताई जा रही है. असल लड़ाई इन दो नामों से कहीं बड़ी है. अभिषेक चौधरी को गहलोत खेमे का समर्थक बताया जा रहा है, वहीं अनिल चोपड़ा को पायलट गुट का चेहरा माना जा रहा है. यह मुकाबला युवा कांग्रेस का चुनाव कम और कांग्रेस के अंदर ताकत की नब्ज टटोलने का जरिया ज्यादा बन गया है.
इस चुनाव की एक और दिलचस्प बात यह है कि अनिल चोपड़ा और अभिषेक चौधरी 12 साल बाद फिर से आमने-सामने हैं. साल 2014 में राजस्थान विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में ये दोनों आमने-सामने थे, जहां अनिल चोपड़ा ने जीत दर्ज की थी. एक दशक बाद अब अभिषेक चौधरी अपना पुराना हिसाब चुकता करने की तैयारी में हैं, वहीं अनिल अपनी जीत के सिलसिले को बरकरार रखने के लिए पसीना बहा रहे हैं.
युवा कांग्रेस चुनाव के लिए पिछले 16 दिन में प्रदेश भर में जिस तरह से रिकॉर्ड मतदान हुआ है, उसने साफ कर दिया है कि यह मुकाबला अब केवल युवा नेतृत्व चुनने का नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व तय करने का मंच बन चुका है. अब तक 15 लाख से ज्यादा वोट डाले जा चुके हैं और 20 मई तक यह आंकड़ा 25-30 लाख के करीब पहुंचने का अनुमान है. इतनी बड़ी भागीदारी अपने आप में असाधारण है, लेकिन इसके पीछे चल रही अंदरूनी रणनीतियां और संसाधनों की ताकत चुनाव को और ज्यादा दिलचस्प और विवादित बना रही है.
युवा कांग्रेस के चुनाव में गुटबाजी, पैसे और पावर का प्रभाव इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि इन चुनावों को संसदीय सियासत में एंट्री के तौर पर जाना जाता है. इन चुनावों में जीत हासिल करने वाला नेता सीधे बड़े राजनीतिक मंच पर पहुंचने की दौड़ में शामिल हो जाता है. विधायक, सांसद या मंत्री बनने की राह अक्सर यहीं से निकलती है. यही कारण है कि हर गुट अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है. मौजूदा विधानसभा में विधायक अभिमन्यु पूनिया, मुकेश भाकर, गणेश घोघरा और अशोक चांदना जैसे चेहरे युवा कांग्रेस के जरिए ही संसदीय राजनीति तक पहुंचे हैं.
देखना यह है कि क्या ये चुनाव सच में नए और जमीनी नेताओं को ऊपर लाने का माध्यम बनेंगे या फिर वही लोग आगे निकलेंगे जिनके पास ज्यादा पैसा, नेटवर्क और सियासी संरक्षण है? अगर पैसा और पावर ही इस चुनाव में हार-जीत तय करेगा, तो ये चुनाव पुरानी पावर पॉलिटिक्स का नया और महंगा संस्करण भर रह जाएंगे.

