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राजस्थान की सियासत में आधी आबादी हाशिये पर लेकिन नौकरशाही में दी मजबूत दस्तक!

200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में 13वीं और 14वीं विधानसभा को छोड़ दें, तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व कभी भी 12 प्रतिशत के आंकड़े को पार नहीं कर सका

Rajasthan Panchayat Election
Rajasthan Panchayat Election
अपडेटेड 17 अप्रैल , 2026

लोकसभा में महिला आरक्षण पर विधेयक पेश होने के साथ ही यह बहस और भी प्रासंगिक हो गई है कि देश और प्रदेश की सियासत में अब तक आधी आबादी को कितना प्रतिनिधित्व मिला है. राजस्थान के आंकड़े इस सवाल को और तीखा बना देते हैं. राज्य की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी लंबे समय से सीमित रही है.

200 सदस्यीय राजस्थान विधानसभा में 13वीं और 14वीं विधानसभा को छोड़ दें, तो महिलाओं का प्रतिनिधित्व कभी भी 12 प्रतिशत के आंकड़े को पार नहीं कर सका. तेरहवीं विधानसभा में सर्वाधिक 29 महिलाएं विधायक चुनी गई थीं, जो अब तक का रिकॉर्ड है. वर्तमान विधानसभा में यह संख्या घटकर 21 रह गई है, जो कुल प्रतिनिधित्व का महज 10 प्रतिशत है. संसद में भी राजस्थान की महिला सांसदों की स्थिति उत्साहजनक नहीं है.

राजस्थान के कुल 35 सांसदों (25 लोकसभा और 10 राज्यसभा) में महिलाओं की संख्या सिर्फ तीन है. राज्य मंत्रिमंडल में भी सिर्फ दो महिलाएं हैं. 25 सदस्यीय भजनलाल सरकार में दीया कुमारी उप मुख्यमंत्री और डॉ. मंजू बाघमार राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में शामिल हैं. 

विधायिका और राजनीति में महिलाओं की यह सीमित भागीदारी एक तस्वीर पेश करती है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान की नौकरशाही एक अलग ही कहानी कहती नजर आती है. प्रशासनिक तंत्र में महिलाओं को न सिर्फ अवसर मिला है, बल्कि उन्होंने नेतृत्व के स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति भी दर्ज कराई है. वर्तमान में राज्य के 8 जिलों की कमान महिला आईएएस अधिकारियों के हाथ में है, जबकि 6 जिलों में पुलिस कप्तान के रूप में महिला आईपीएस अधिकारी तैनात हैं. इसके अलावा एक दर्जन से अधिक महिला अधिकारी विभिन्न विभागों की शीर्ष जिम्मेदारियां संभाल रही हैं.

आजादी के बाद से राजस्थान में महिला नेतृत्व के अवसर सीमित ही रहे हैं. राज्य को अब तक केवल एक महिला मुख्यमंत्री (वसुंधरा राजे) और एक महिला विधानसभा अध्यक्ष (सुमित्रा सिंह) मिली हैं. वहीं प्रशासनिक स्तर पर दो बार महिलाओं को प्रदेश की शीर्ष नौकरशाही की कमान सौंपी गई. 2009 में 1974 बैच की आईएएस अधिकारी कुशल सिंह राज्य की पहली महिला मुख्य सचिव बनीं. इसके बाद 1985 बैच की आईएएस उषा शर्मा को यह जिम्मेदारी मिली. दिलचस्प संयोग यह रहा कि जब-जब महिलाओं को प्रशासनिक मुखिया बनाया गया, उस समय प्रदेश में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री थे.

जिलों में महिला नेतृत्व की बात करें तो सीमावर्ती जैसलमेर की कलेक्टर अनुपमा जोरवाल पहले भी कई जिलों में अपनी सेवाएं दे चुकी हैं. बाड़मेर की कलेक्टर चिन्मयी गोपाल और प्रतापगढ़ की कलेक्टर शुभम चौधरी भी प्रशासनिक अनुभव और नेतृत्व क्षमता के लिए जानी जाती हैं. टोंक की कलेक्टर टीना डाबी, चित्तौड़गढ़ में डॉ. मंजू, अलवर में आर्तिका शुक्ला, दौसा में सौम्या झा और कोटपुतली-बहरोड़ में अपर्णा गुप्ता जैसे नाम इस सूची को और मजबूत बनाते हैं.

पुलिस महकमे में भी महिलाएं अहम जिम्मेदारियां निभा रही हैं. कोटा की एसपी तेजस्वी गौतम,पाली की मोनिका सेन, उदयपुर की अमृता दुहन, डीडवाना-कुचामन की रिचा तोमर, जोधपुर ग्रामीण की पीडी नित्या और सवाई माधोपुर की ज्येष्ठा मैत्रेयी कानून-व्यवस्था की कमान संभाल रही हैं.

विभागीय नेतृत्व में भी महिलाओं की मजबूत उपस्थिति दिखती है. अपर्णा अरोड़ा खान एवं पेट्रोलियम विभाग की अतिरिक्त मुख्य सचिव हैं, जबकि श्रेया गुहा प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान का नेतृत्व कर रही हैं. रोली सिंह केंद्र स्तर पर रासायनिक हथियार समझौता प्राधिकरण की मुखिया हैं और मुग्धा सिन्हा केंद्रीय पर्यटन विकास निगम की प्रबंध निदेशक हैं. नलिनी काठोतिया भरतपुर और कुमारी प्रज्ञा केवलरमानी उदयपुर की संभागीय आयुक्त हैं.

राजस्थान में स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, वित्त, पर्यटन और महिला एवं बाल विकास जैसे अहम विभागों में भी महिला अधिकारी शीर्ष पदों पर कार्यरत हैं. गायत्री राठौड़, आरूषि अजेय मलिक, डॉ. पूनम, आरती डोगरा, आनंदी, डॉ. टीना सोनी, अर्चना सिंह, सुची त्यागी, नेहा गिरी जैसी राजस्थान की महिला अफसरों के पास इन विभागों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है.

सियासी और प्रशासनिक मामलों के जानकार डॉ. गजेंद्र सिंह कहते हैं, "सियासत में महिलाओं को अवसर केंद्रीय नेतृत्व की कृपा से मिल पाता है, वहीं नौकरशाही में महिलाओं ने अपनी मेहनत से मुकाम हासिल किया है. यही वजह है कि जहां एक ओर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अब भी सीमित है, वहीं प्रशासनिक ढांचे में उन्होंने अपनी मेहनत, दक्षता और नेतृत्व क्षमता के दम पर मजबूत जगह बनाई है."

महिला आरक्षण बिल पर छिड़ी इस बहस के बीच यह देखना और भी दिलचस्प होगा कि क्या सियासत भी नौकरशाही की तरह महिलाओं को कभी बराबरी का मंच दे पाएगी?

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