scorecardresearch

राजस्थान में शादी से ठीक पहले दो बहनों की आत्महत्या परिवारों में फैले किस संकट का इशारा है?

जोधपुर के एक गांव में दो बहनों की कथित आत्महत्या ने विवाह के मुद्दे पर माता-पिता की सहमति को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने की मांगों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं

जोधपुर में दो टीचर बहनों ने अपनी शादी से पहले खुदकुशी कर ली. (Photo: ITG)
जोधपुर में दो टीचर बहनों ने अपनी शादी से पहले खुदकुशी कर ली. (Photo: ITG)
अपडेटेड 2 मार्च , 2026

21 फरवरी को जोधपुर के मनाई गांव में दो बहनों की शादी समारोह का आयोजन था, लेकिन शादी से ठीक पहले खुशी और शोर-शराबे का माहौल अचानक सन्नाटे में बदल गया. दरअसल, प्राइवेट स्कूल की टीचर 25 साल की शोभा और 23 साल की विमला ने शादी से कुछ घंटे पहले कथित तौर पर जहर खा लिया.

कुछ देर बाद दोनों बहनें परिवार के सदस्यों को गंभीर हालत में बेसुध मिलीं. जब तक उन्हें अस्पताल पहुंचाया जाता, उनकी मौत हो चुकी थी. इस घटना ने राजस्थान के समाज और सरकार के सामने एक दर्दनाक सवाल खड़ा कर दिया है: क्या वयस्क बेटियों को अपने जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता भी नहीं है?

इस घटना के बाद पुलिस ने अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया है. साथ ही अंतड़ियों के सैंपल को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजे गए हैं. अधिकारी कहते हैं कि परिवार के दबाव समेत सभी आरोपों की जांच चल रही है. लेकिन इन सबके बावजूद रिश्तेदारों के बयान ने समाज में व्यापक हलचल मचा दी है.

मामा जसवंत सिंह के जरिए पुलिस को दिए बयानों के मुताबिक, बहनों की मूल रूप से जालोर के भीमनाल के रहने वाले लड़कों के साथ सगाई तय हुई थी. दोनों बहनों को ये रिश्ते पसंद थे. हालांकि, लड़की के पिताजी के चाचा के दबाव में ये सगाइयां कथित तौर पर रद्द कर दी गईं और नई सगाइयां पोंकरण के जेमला गांव में तय की गईं.

जसवंत ने आरोप लगाया है कि बहनें रिश्ते को लेकर अचानक हुए इस बदलाव से नाखुश थीं. हालांकि, मृतक के परिवार ने किसी भी तरह के दबाव से इनकार किया है और कहा है कि दोनों बहनों की मौतें अचानक बीमारी के कारण हुईं. ADCP (पश्चिम) रोशन मीणा समेत पुलिस अधिकारियों ने कहा है कि जांच के नतीजे फोरेंसिक रिपोर्ट और आगे के सबूतों पर निर्भर करेंगे.

इस घटना के बाद आसपास के लोगों का गुस्सा और ज्यादा बढ़ गया क्योंकि इस दुखद घटना के तुरंत बाद लड़के के परिवार वालों ने उनकी शादी कहीं और कर दी. इस घटना की आलोचना करते हुए कुछ लोगों ने कहा, "यह घटना वैवाहिक रिश्तों की बढ़ती 'व्यवसायिकता' या 'सौदेबाजी' का प्रतीक बन गई है."

शिक्षित बेटियां, लेकिन फैसला लेने की आजादी नहीं

ऊपरी तौर पर देखा जाए तो शोभा और विमला सरकार की उन सफल कहानियों का उदाहरण पेश करती थीं, जिन्हें अक्सर प्रचारित किया जाता है. दोनों पढ़ी-लिखी थीं, नौकरी करती थीं और परिवार में आर्थिक रूप से योगदान देती थीं. फिर भी उनकी मौत ने एक कड़वी हकीकत उजागर कर दी है कि शिक्षा हमेशा फैसले लेने की आजादी में नहीं बदलती- खासकर शादी जैसे मामलों में.

यह दुखद घटना अरेंज्ड मैरिज में बार-बार सामने आने वाली उस खामी को उजागर करती है, जो परिवार के सदस्यों, माता-पिता या बड़ों के जरिए शादी को लेकर एकतरफा फैसले लिए जाते हैं. अक्सर ये फैसले जिसके लिए लिया जाता है, उन युवा वयस्कों की इच्छाओं को नजरअंदाज कर दिया जाता है. समाजशास्त्री इसे आकांक्षा और नियंत्रण के बीच लगातार पैदा हो रहे तनाव के रूप में बताते हैं. एक ओर परिवार बेटियों को पढ़ाई और नौकरी करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, लेकिन शादी के फैसले पर उनकी राय नहीं लेते और अपने हिसाब से एकतरफा फैसले लेते हैं.  

राजस्थान में यह घटना एकलौती नहीं है. राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो (NCRB) के 2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य में महिलाओं की आत्महत्याओं में से लगभग 45 फीसद मामले पारिवारिक या वैवाहिक समस्याओं से जुड़ी हैं. यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है. NCRB के अलग आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि राजस्थान में दहेज हत्याओं और वैवाहिक कलह से जुड़ी आत्महत्याओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. अकेले 2024 में ही ऐसे 1,800 से अधिक मामले दर्ज किए गए. यह पैटर्न इस बात को जाहिर करता है कि मनई हत्याकांड जैसी घटनाएं इतनी गहरी छाप क्यों छोड़ती हैं?

'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसे सरकारी अभियानों से लड़कियों की शिक्षा के प्रति जागरूकता में काफी सुधार हुआ है. स्कूलों में नामांकन बढ़ा है और जोधपुर जैसे जिलों में युवा महिलाएं नौकरी पेशा करने घर से बाहर निकल रही हैं. फिर भी सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन लड़कियों पर असली दबाव अक्सर शिक्षा पूरी होने के बाद शुरू होता है. वैवाहिक तनाव के मामलों में परामर्श देने वाली जोधपुर की एक महिला अधिकार कार्यकर्ता कहती हैं, “आजकल परिवार शिक्षित बहुएं तो चाहते हैं, लेकिन फिर भी सामाजिक सीमाओं के भीतर ही. जब अपेक्षाएं व्यक्तिगत पसंद से टकराती हैं, तो तनाव तेजी से बढ़ ही जाता है.”

हेल्पलाइन के कर्मचारियों का कहना है कि सगाई से लेकर शादी तक की प्रक्रिया को लेकर कई लड़कियां चिंता जाहिर करती हैं. खासकर जब रिश्ते अचानक बदल दिए जाते हैं या जब उन्हें लगता है कि उनकी सहमति नहीं ली गई या उनकी सहमति को नदरअंदाज किया गया.  

वर्तमान परिस्थिति को और भी जटिल बनाने वाली बात यह है कि कुछ क्षेत्रों में शादी को लेकर समानांतर राजनीतिक और सामाजिक चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं. हाल के महीनों में गुजरात सहित कई राज्यों के कुछ राजनीतिक हस्तियों ने यह विचार रखा है कि वयस्क बच्चों के विवाह के लिए माता-पिता की सहमति आवश्यक होनी चाहिए. राजस्थान में भी कुछ विधायकों ने समय-समय पर इसी तरह के विचार व्यक्त किए हैं और इस मुद्दे को पारिवारिक प्रतिष्ठा और सामाजिक एकता से जोड़ा जा रहा है.

समर्थकों का तर्क है कि जब बच्चे समाज के रीति-रिवाजों से हटकर शादी करते हैं तो माता-पिता सार्वजनिक रूप से अपमानित महसूस करते हैं. लेकिन, भारतीय कानून में यह स्पष्ट है कि सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों को अपने जीवनसाथी को चुनने का अधिकार है. अदालतों ने बार-बार यह माना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने की स्वतंत्रता भी शामिल है.

ऐसे में माता-पिता की अनिवार्य स्वीकृति की सामाजिक मांग से यह सवाल खड़ा होता है कि क्या पारिवारिक संकट का समाधान सख्त नियंत्रण में निहित है या बेहतर सामाजिक सुधार में?

संवाद की कमी समस्या को गंभीर बना रही

जमीनी अनुभव से पता चलता है कि दबाव में किए गए विवाह लंबे वक्त में अक्सर कई तरह के जोखिमों से भरे होते हैं. इन पर सार्वजनिक नीतिगत बहसों में पर्याप्त चर्चा नहीं होती. फैमिली काउंसलर और पुलिस अधिकारी निजी तौर पर बार-बार सामने आने वाली घटनाओं के आधार पर इस बात को स्वीकार करते हैं कि जबरन किए गए विवाह अक्सर दीर्घकालिक संघर्ष में बदल जाते हैं. कुछ विवाहेतर संबंधों में उलझ जाते हैं और यह हिंसा या आत्महत्या के लिए उकसाने वाली घटनाओं में बदल जाते हैं.

फिर भी, इन परिणामों का व्यापक सामाजिक परिदृश्य पर शायद ही कभी कोई प्रभाव पड़ता है. ऐसा इसलिए क्योंकि सामाजिक व्यवस्था में व्यक्तिगत सहमति की तुलना में सामुदायिक स्वीकृति को प्राथमिकता दिया जाता है. जोधपुर मामले ने इस असहज बातचीत को फिर से सबके सामने ला दिया है.

जयपुर की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट सौम्या शर्मा कहती हैं, "पितृसत्ता के कारण पालन-पोषण में सख्त लैंगिक मानदंड के कारण शादी जैसे अत्यधिक भावनात्मक मुद्दे पर भी लड़कियों की राय नहीं ली जाती है. इससे वे असहायता की स्थिति में धकेल दी जाती हैं."

मनई और आसपास के इलाकों में इन मौतों से शोक और बेचैनी का माहौल है. बताया जा रहा है कि सामुदायिक नेताओं ने जागरूकता अभियान और शादी के दौरान दहेज लेने के खिलाफ चर्चा शुरू कर दी है. पुलिस ने वैवाहिक व्यवस्थाओं से जुड़े दोनों पक्षों के रिश्तेदारों से पूछताछ की है.

आने वाले दिनों में फोरेंसिक रिपोर्ट के नतीजे आने की उम्मीद है, जिससे मौत के सटीक कारण का पता लगाना संभव होगा. फिलहाल, दो बिल्कुल अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं: परिवार का अचानक बीमारी का दावा कर रहा है और रिश्तेदार बदले हुए रिश्तों को दोनों बहनों की मौत की मुख्य वजह बता रहे हैं.  

गांव में विलाप के बीच बहनों का अंतिम संस्कार किया गया. इस घटना से साफ हुआ कि आज राजस्थान के युवा तीव्र सामाजिक परिवर्तन और गहरी जड़ें जमा चुकी सामुदायिक परंपराओं के बीच उलझे हैं. शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है, आकांक्षाएं विस्तृत हो रही हैं, लेकिन कई परिवारों में वैवाहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया अभी भी पुरानी परंपराओं पर आधारित है.

विडंबना यह है कि ऐसी त्रासदियां सामने आने के बावजूद, समाज का एक वर्ग यह तर्क देता रहता है कि वयस्क विवाहों के लिए माता-पिता की सहमति कानूनी रूप से अनिवार्य होनी चाहिए. कई सोशल मीडिया उपयोगकर्ता खुले तौर पर मांग करते हैं कि बच्चों का विवाह केवल माता-पिता की स्वीकृति से ही होना चाहिए. इन बहसों में अक्सर जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर दिया जाता है कि जब सहमति नहीं होती या उसमें समझौता होता है.  

जांचकर्ता मनई मामले में कानूनी सच्चाई का पता लगाएंगे, लेकिन सामाजिक रूप से यह संदेश जोधपुर से कहीं आगे तक गूंज रहा है. राजस्थान के युवाओं के लिए यह घटना एक स्पष्ट सबक है कि विवाह तभी सबसे अच्छे ढंग से सफल होते हैं. जब वे स्वेच्छा से की गई सहमति पर आधारित हों - न कि मौन सहमति पर.
 

Advertisement
Advertisement