राजस्थान में शिक्षा अब सिर्फ किताबों का विषय नहीं रही, बल्कि सियासत का अखाड़ा बन चुकी है. राजस्थान सरकार के कक्षा 9वीं से 12वीं तक की इतिहास विषय से संबंधित चार किताबों को पाठ्यक्रम से हटाए जाने के फैसले ने इतिहास, विचारधारा और शिक्षा को लेकर नई बहस खड़ी कर दी है.
माध्यमिक शिक्षा निदेशालय की ओर से 16 अप्रैल को एक आदेश जारी कर चार किताबों को 'विलोपित' श्रेणी में डाल दिया गया और उन्हें पढ़ने-पढ़ाने पर रोक लगा दी गई. हटाई गई किताबों में कक्षा 9 की ‘राजस्थान का स्वतंत्रता आंदोलन एवं शौर्य परंपरा’, कक्षा 10 की ‘राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति’, कक्षा 11 की ‘आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत (भाग-1)’ और कक्षा 12 की ‘आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत (भाग-2)’ शामिल हैं.
ये सभी किताबें राजस्थान के इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के बाद के भारत के विकास से जुड़ी हुई थीं. ऐसे में इन पर रोक लगते ही तीखी राजनीतिक प्रतिक्रिया देखने को मिली और मामला शिक्षा से निकलकर सीधे सियासत के केंद्र में आ गया. राज्य सरकार जहां इस फैसले को सुधार की दिशा में उठाया गया कदम मान रही है, वहीं विपक्ष ने इसे इतिहास और सोच पर सीधा हमला बताया है.
राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर कहते हैं, “राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर इन किताबों में कुछ कांग्रेसी नेताओं का गुणगान था. भीमराव आंबेडकर जैसे राष्ट्रीय महापुरुष को एक लाइन में दलित बताकर संबोधित किया गया. इनमें बहुत सारी विवादित सामग्री थी. वैसे भी ये पुस्तकें परीक्षा का हिस्सा नहीं थीं और न ही इनके नंबर परीक्षा परिणाम में जोड़े जाते थे. हम चाहते हैं कि बच्चे ज्ञान के लिए किसी पार्टी का इतिहास नहीं, बल्कि अच्छी किताबें पढ़ें. हम इनकी सामग्री को दुरुस्त कर दोबारा लेखन करेंगे.”
वहीं विपक्ष इस फैसले को पूरी तरह अलग नजरिए से देख रहा है. कांग्रेस ने किताबें हटाए जाने को सुधार नहीं, बल्कि BJP और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा करार दिया है. कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा है, “BJP सरकार का यह फैसला पाठ्यक्रम में बदलाव नहीं, बल्कि इतिहास और सोच पर सीधा हमला है. BJP यह बताए कि इन किताबों से उन्हें क्या दिक्कत थी. अगर कुछ गलत था तो उसमें सुधार करते, मगर पूरी किताब हटाना यह दर्शाता है कि BJP का मकसद सुधार नहीं, इतिहास को मिटाना है. आजादी के आंदोलन में कांग्रेस नेताओं का योगदान पूरा विश्व जानता है, मगर BJP को इससे दिक्कत है क्योंकि RSS विचारधारा का कोई भी नेता ऐसा नहीं था जिसने देश की आजादी के लिए अपना खून बहाया हो.”
कक्षा 11 और 12 में पढ़ाई जा रही 'आजादी के बाद का स्वर्णिम भारत' किताब को लेकर BJP पिछले काफी अरसे से मुखर थी. शिक्षा मंत्री मदन दिलावर इसकी सामग्री पर कई बार सवाल उठा चुके हैं. अब किताब हटाए जाने के फैसले के बाद कांग्रेस व BJP आमने-सामने हैं.
किताबें हटाने को लेकर BJP के तर्क :
इन किताबों में नेहरू-गांधी परिवार का ही महिमामंडन है, जबकि सरदार वल्लभ भाई पटेल, भीमराव अंबेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, वीर सावरकर और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राष्ट्रीय महापुरुषों के योगदान को नजरअंदाज किया गया है या इन्हें बहुत कम जगह दी गई है.
BJP की दलीलें :
- इनमें कांग्रेस पार्टी के इतिहास का एकतरफा चित्रण है, जबकि BJP या अन्य विचारधारा की अनदेखी हुई है.
- आपातकाल का जिक्र नहीं किया गया है.
- धारा 370 के खात्मे की अनदेखी हुई है, जो आधुनिक भारत की ऐतिहासिक घटना है.
- अकेले राजीव गांधी पर 11 पृष्ठ से ज्यादा सामग्री है.
- आंबेडकर को संविधान निर्माता के बजाय केवल एक दलित नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
- स्वतंत्रता संग्राम को कम जगह दी गई है. किताब के 84 पन्नों में से 48 पन्नों में आजादी से पहले की बातें हैं.
- 1857 की क्रांति को केवल चार वाक्यों में समेट दिया गया.
कांग्रेस के सवाल :
- क्या इन किताबों को इसलिए हटाया गया है क्योंकि इनमें स्वतंत्रता संग्राम में लहू बहाने व देश को आज़ादी दिलाने वाले कांग्रेस के महान नेताओं के अमिट योगदान का जिक्र था?
- क्या स्वर्णिम भारत किताब को इसलिए हटाया गया है कि इसमें राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की राष्ट्र-निर्माण की विचारधारा, सशक्त भारत की नींव, लोकतांत्रिक प्रणाली, शिक्षा, विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में आईआईटी, आईआईएम, एम्स, डीआरडीओ, यूजीसी और योजना आयोग जैसे प्रमुख संस्थानों की स्थापना का इतिहास है?
- क्या ये किताबें इसलिए हटाई गई हैं कि इनमें संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर से मिले संविधान का जिक्र है, जो नागरिकों को न्याय, समानता और आरक्षण का अधिकार देता है?
- क्या किताबें हटाने का मकसद यह है कि BJP-RSS को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का दमदार नेतृत्व चुभता है? इंदिरा गांधी ने 1971 युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े कर बांग्लादेश का निर्माण किया या फिर उनके नेतृत्व में पहला परमाणु परीक्षण, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, हरित व श्वेत क्रांति जैसे ऐतिहासिक कदम BJP को अखर रहे हैं?
- पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के द्वारा भारत को 21वीं सदी के लिए तैयार करने का दूरदर्शी विजन देना, 18 वर्ष में मतदान का अधिकार, शासन के विकेंद्रीकरण, पंचायती राज, कंप्यूटर व तकनीकी क्रांति की नींव रखना क्या BJP को नागवार गुजर रहा है?
- क्या ये किताबें इसलिए हटाई गई हैं कि इनमें पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा 'सूचना का अधिकार', 'मनरेगा', 'आधार कार्ड', 'शिक्षा का अधिकार' और 'भोजन का अधिकार' जैसे अनेक ऐतिहासिक कदम उठाने का जिक्र था?
किताबें हटाए जाने को लेकर BJP व कांग्रेस के चाहे जो तर्क हों, मगर राजस्थान में पाठ्यपुस्तकों को लेकर विवाद एक हकीकत बन चुका है. पिछले कुछ वर्षों में हर सरकार ने अपनी सहूलियत और विचारधारा के हिसाब से किताबों में बदलाव किए हैं.
पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत सरकार के दौरान जिन किताबों को शामिल किया गया था, अब वर्तमान सरकार ने उन्हें हटाने का फैसला किया है; वहीं वसुंधरा राजे सरकार के वक्त तैयार हुई किताबों में अशोक गहलोत सरकार ने बदलाव किए थे.
किताबें बदलने की इस परिपाटी का सबसे बड़ा असर छात्रों और शिक्षा व्यवस्था पर पड़ता दिख रहा है. शिक्षाविद् विजय गोयल कहते हैं, “बार-बार पाठ्यक्रम बदलने से छात्रों में भ्रम की स्थिति बन रही है और उनकी पढ़ाई की निरंतरता प्रभावित होती है. इतिहास जैसे विषय में जब सामग्री लगातार बदलती रहती है, तो छात्रों के सामने एक स्थिर और स्पष्ट समझ विकसित करना मुश्किल हो जाता है. हर साल किताबों की छपाई पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं, जो उनके बदलने पर बेकार हो जाते हैं.”

