राजस्थान में 'स्वास्थ्य का अधिकार' (राइट टू हेल्थ) कानून अब सियासत का नया रणक्षेत्र बन गया है. एक ओर यह कानून हर नागरिक को इलाज का कानूनी हक देने का दावा करता है, वहीं दूसरी ओर वर्तमान सरकार अब इसे "अनावश्यक" मान रही है. ढाई साल तक नियम नहीं बना पाने के बाद भजनलाल सरकार का यह कहना कि राज्य को अब अलग से स्वास्थ्य अधिकार कानून की जरूरत नहीं है, कई सवाल खड़े करता है.
प्रदेश के चिकित्सा व स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर ने विधानसभा में स्वास्थ्य विभाग की चर्चा के दौरान स्पष्ट रूप से कहा, "राजस्थान को अब स्वास्थ्य के अधिकार कानून की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यहां मुख्यमंत्री आरोग्य आयुष्मान योजना (MAA) और निरोगी राजस्थान जैसी योजनाएं पहले से चल रही हैं."
स्वास्थ्य मंत्री का यह बयान आते ही विपक्ष और स्वास्थ्य क्षेत्र के सामाजिक संगठन सरकार के खिलाफ लामबंद हो गए हैं. इस कानून को बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाले 'जन स्वास्थ्य अभियान' का मानना है कि स्वास्थ्य के अधिकार कानून को MAA और आरोग्य राजस्थान जैसी निशुल्क सेवाओं के समकक्ष नहीं रखा जा सकता. यह कानून सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए हर व्यक्ति को स्वास्थ्य का विधिक अधिकार देता है, जबकि योजनाएं इस तरह की कोई कानूनी गारंटी नहीं देतीं.
राजस्थान की पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने 21 मार्च 2023 को विधानसभा में 'राजस्थान स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम, 2023' पारित किया था. जन स्वास्थ्य अभियान ने 2020 में ही इसका मसौदा तैयार कर लिया था, मगर कोरोना महामारी और निजी अस्पतालों के भारी विरोध के चलते इसे पारित होने में तीन साल लग गए. 21 सितंबर 2022 को जब इसे पहली बार विधानसभा में पेश किया गया, तब निजी अस्पताल इसके खिलाफ आंदोलन पर उतर आए थे. दरअसल, इस कानून में दुर्घटना व अन्य आपातकालीन स्थितियों में बिना किसी अग्रिम भुगतान (Advance Payment) के निजी अस्पतालों में इलाज का प्रावधान है, जिसे लेकर निजी संचालकों को सबसे ज्यादा आपत्ति है.
जन स्वास्थ्य अभियान के प्रतिनिधि डॉ. नरेंद्र गुप्ता का कहना है, "प्राइवेट अस्पतालों के दबाव में सरकार इस कानून को गैर-जरूरी बता रही है. MAA और आरोग्य राजस्थान जैसी योजनाएं सरकार का नीतिगत निर्णय हैं, जिन्हें किसी भी समय बदला, सीमित या समाप्त किया जा सकता है. इसके विपरीत, कानून नागरिकों को इलाज के लिए कानूनी दावा करने का अधिकार देता है."
यह कानून प्रदेश के हर नागरिक को निशुल्क आपातकालीन देखभाल का हक देता है, जिसके तहत किसी भी सार्वजनिक या चिन्हित निजी स्वास्थ्य संस्थान में इमरजेंसी की स्थिति में बिना अग्रिम भुगतान के मुफ्त उपचार लिया जा सकता है. मरीज की स्थिति स्थिर होने तक अस्पताल इलाज से इनकार नहीं कर सकता. अधिनियम में सरकारी और निजी अस्पतालों में निशुल्क ओपीडी (OPD) और आईपीडी (IPD) सेवाओं का प्रावधान है, जिसमें परामर्श, दवाइयां, जांच और सर्जरी शामिल हैं. इसके तहत गंभीर मामलों में निशुल्क एंबुलेंस और रेफरल की सुविधा भी दी गई है. यदि कोई अस्पताल नियमों का उल्लंघन करता है, तो सजा और जुर्माने की व्यवस्था है.
साथ ही, अगर कोई रोगी भुगतान करने में असमर्थ है, तो निजी अस्पताल के खर्च की भरपाई राज्य सरकार द्वारा किए जाने का प्रावधान है. इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य और जिला स्तर पर स्वास्थ्य प्राधिकरणों का गठन होना था, मगर सरकार अब तक यह व्यवस्था नहीं कर पाई है. नियमों के अभाव में निजी अस्पताल अब भी मरीजों को इलाज से मना करने, मनमाना रेफर करने और आर्थिक शोषण करने जैसे कदम उठा रहे हैं.
नियम नहीं बनाने पर हाईकोट सख्त
हाल ही में 6 जनवरी को राजस्थान हाई कोर्ट ने राइट टू हेल्थ एक्ट के नियम नहीं बनाए जाने पर भजनलाल सरकार को नोटिस जारी किया है. हाई कोर्ट की जयपुर खंडपीठ के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति संगीता शर्मा की बेंच ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. याचिकाकर्ता डॉ. नरेंद्र कुमार गुप्ता ने कानून लागू होने में हो रही देरी को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था.
खंडपीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद राज्य सरकार से जवाब तलब किया है. अधिनियम का मूल उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना है, लेकिन नियमों के स्पष्ट न होने से जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही है.
राजस्थान में अब यह बहस तेज हो गई है कि आखिर नागरिकों के स्वास्थ्य अधिकार से सरकार को क्या दिक्कत है? योजनाएं अक्सर सरकारों के बदलने के साथ बदल जाती हैं, लेकिन कानून जनता को स्थायी सुरक्षा प्रदान करता है. अगर सरकार खुद अपने ही कानून को गैर-जरूरी बताने लगे, तो यह केवल नीतिगत मतभेद नहीं बल्कि जनता के बुनियादी अधिकारों में कटौती से जुड़ा मामला बन जाता है.

