
राजस्थान में 960 करोड़ रुपए के जल जीवन मिशन (जेजेएम) घोटाले के बड़े आरोपी व पूर्व आईएएस अधिकारी सुबोध अग्रवाल को राजस्थान पुलिस के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने आखिरकार 52 दिन बाद ढूंढ़ निकाला है. इस दौरान अग्रवाल भेष बदलकर कई जगह छिपे, मगर एसीबी ने उन्हें 9 अप्रैल को दिल्ली से गिरफ्तार कर लिया.
अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने नियमों को दरकिनार किया और फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जेजेएम में करोड़ों रुपए के टेंडर मंजूर किए. अग्रवाल उस वक्त जलदाय विभाग के शीर्ष पद पर बैठे थे, जब जेजेएम के नाम पर टेंडरों की बाढ़ आई हुई थी.
इस पूरे घोटाले की परत 27 जून 2023 को उस वक्त उघड़ी जब 'पब्लिक अगेंस्ट करप्शन' की ओर से एसीबी और अशोक नगर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई गई. शिकायतकर्ता एडवोकेट टीएन शर्मा ने पहली बार सुबोध अग्रवाल का नाम सीधे तौर पर इस खेल से जोड़ा. शिकायत में साफ कहा गया कि श्री गणपति और श्याम ट्यूबवैल कंपनियों ने केंद्र के सार्वजनिक उपक्रम इरकॉन के फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र लगाकर जेजेएम के ठेके हासिल किए. हैरानी की बात यह है कि इरकॉन ने खुद अग्रवाल को पत्र लिखकर इन सर्टिफिकेट्स को फर्जी बताया था, मगर इसके बावजूद न सिर्फ नए टेंडर जारी हुए बल्कि करोड़ों का भुगतान भी बदस्तूर जारी रहा.

यहां से कहानी और ज्यादा संदिग्ध हो जाती है. 24 फरवरी 2024 को हाईकोर्ट को एसीबी से पूछना पड़ा कि आखिर इस शिकायत पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? आखिरकार 30 अक्टूबर 2024 को पहली एफआईआर दर्ज हुई. पूर्व जलदाय मंत्री महेश जोशी समेत 22 लोगों के नाम इस एफआईआर में शामिल किए गए. 24 अप्रैल 2025 को इस मामले में महेश जोशी की गिरफ्तारी हुई. जांच की दिशा तब बदली जब 9 फरवरी 2026 को इंजीनियर विशाल सक्सेना को गिरफ्तार किया गया. सक्सेना ने पूछताछ में माना कि उच्च अधिकारियों के दबाव में उन्होंने फर्जी दस्तावेजों को सही ठहराने वाली रिपोर्ट तैयार की थी. यह बयान सीधे-सीधे इस ओर इशारा करता है कि घोटाले की जड़ें सिर्फ निचले स्तर तक सीमित नहीं थीं.
दिलचस्प यह भी है कि एसीबी ने जब सुबोध अग्रवाल को जांच के लिए बुलाया, वे उससे डेढ़ माह पहले ही वे सेवानिवृत्त हो चुके थे. अग्रवाल 31 दिसंबर 2025 को रिटायर हुए और एसीबी ने उन्हें फरवरी 2026 में पूछताछ के लिए बुलाया. हालांकि, बुलावे पर एक बार तो अग्रवाल एसीबी के सामने पेश हुए, मगर जैसे ही उन्हें गिरफ्तारी की आहट मिली, 17 फरवरी 2026 को अपना फोन बंद कर ‘गायब’ हो गए.
उनके विदेश भागने की आशंका के चलते लुकआउट नोटिस तक जारी करना पड़ा. गिरफ्तारी से बचने के लिए अग्रवाल ने हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया और खुद को इस घोटाले का सूत्रधार मानने से इनकार किया. उनका तर्क है कि 95 प्रतिशत वर्क ऑर्डर उनके पूर्ववर्ती अधिकारी के समय स्वीकृत हुए थे.
इस घोटाले की परतें जितनी खुल रही हैं, तस्वीर उतनी ही भयावह होती जा रही है. देश के हर घर तक साफ पानी पहुंचाने के मकसद से जेजेएम की शुरुआत 15 अगस्त 2019 को हुई थी. योजना की गाइडलाइन के अनुसार डक्टाइल आयरन (डीआई) पाइपलाइन डाली जानी थी, मगर राजस्थान में इसकी जगह सस्ती एचडीपीई पाइपलाइन डाल दी गई. कई जगह पुरानी पाइपलाइनों को नया बताकर पैसा उठा लिया गया. ऐसे और भी गड़बड़झाले हुए. जैसे एक ठेकेदार पदमचंद जैन हरियाणा से चोरी के पाइप लेकर आया और उन्हें नए पाइप बताकर बिछा दिया. फर्जी दस्तावेजों से काम हासिल करने वाली श्री श्याम और गणपति ट्यूबवेल फर्म को बिना काम के 55 करोड़ रुपए के फर्जी पेमेंट किए गए थे.
सरकारी खजाने से पैसा निकालने के लिए कागजों पर ही पूरा खेल रच दिया गया. इस घोटाले की जद 960 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जा रही है. अब तक इस घोटाले में पूर्व मंत्री महेश जोशी समेत जलदाय विभाग के 11 अधिकारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, जबकि तीन आरोपी अब भी फरार हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने भी गणपति व श्याम ट्यूबवेल कंपनी के ठेकेदारों पदमचंद जैन, महेश मित्तल, पीयूष जैन और संजय बड़ाया को गिरफ्तार किया था. जांच का दायरा दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है और जलदाय विभाग के 139 इंजीनियर भी इसके घेरे में हैं.
घोटाला बड़ा, काम कम
इतना बड़ा घोटाला और इतने नाम सामने आने के बाद भी राजस्थान में जल जीवन मिशन की रफ्तार बहुत धीमी है. जल जीवन मिशन पोर्टल के अनुसार, राजस्थान में एक करोड़ 7 लाख घरों में से करीब 96 लाख घरों में 'जल से नल' पहुंचने का सपना अभी भी अधूरा है. राजस्थान के 42 हजार 327 गांवों में से 30 हजार गांव ऐसे हैं जहां अभी तक नल से पानी नहीं पहुंच पाया है. सूबे में 6 हजार गांव तो ऐसे हैं जिनमें अभी तक जल जीवन मिशन का काम भी शुरू नहीं हुआ है.
हर घर कनेक्शन जारी करने के मामले में राजस्थान देश में दूसरा सबसे पिछड़ा राज्य है. जलदाय विभाग ने सरकारी रिकॉर्ड में जिन गांवों में 100 प्रतिशत नल कनेक्शन देने का दावा किया, वहां आधी आबादी तक भी पानी नहीं पहुंच रहा है. बांसवाड़ा जिले के बोझापाड़ा गांव की कहानी तो बहुत ही दिलचस्प है. इस गांव में करीब दो साल पहले हर घर में नल कनेक्शन हो गए थे, लेकिन पानी नहीं आया. ठेकेदार और अफसरों ने घरों में पानी की आपूर्ति दिखाने के लिए नल के ऊपर लोटे से पानी डालकर उसकी तस्वीरें खींचीं और कागजों में खानापूर्ति कर दी.
नागौर जिले के झुझंडा गांव के हर घर से दो साल पहले 2700 रुपए ले लिए गए, मगर पानी अब तक नहीं पहुंच पाया है. पूर्व सरपंच शिवदान कहते हैं कि बिना तकनीकी जांच किए 15 किलोमीटर दूर से पाइप लाइन डाली गई, जिसे किसानों ने जगह-जगह तोड़कर खेतों में सिंचाई शुरू कर दी, जिसके कारण गांव तक पानी की बूंद भी नहीं पहुंच पाई. बाड़मेर और चित्तौड़गढ़ जल जीवन मिशन के तहत सबसे पिछड़े जिले हैं. बाड़मेर में अब तक मात्र 59 हजार और चित्तौड़गढ़ में 85 हजार 312 घरों में ही नल कनेक्शन हुए हैं.
2019 में जब यह योजना शुरू हुई, तब राजस्थान में 11 फीसदी घरों में नल कनेक्शन थे. पिछले छह साल में राजस्थान में 58 फीसदी घरों में कनेक्शन हुए हैं, जबकि उत्तर प्रदेश में 85 और बिहार में 96 फीसदी घरों में कनेक्शन दिए जा चुके हैं. हरियाणा, गुजरात और तेलंगाना सहित 11 राज्य ऐसे हैं जहां 100 फीसदी काम हो चुका है.
राजस्थान अब केरल, झारखंड और पश्चिम बंगाल के बाद देश का चौथा सबसे कम काम करने वाला राज्य बन गया है. जल जीवन मिशन में केंद्र और राज्य की हिस्सेदारी 45-45 फीसदी है, जबकि 10 फीसदी राशि जन सहयोग से जुटाई जाती है.

