राजस्थान में गाय अब केवल सियासत और वोट का ही जरिया नहीं, बल्कि रोजगार का भी माध्यम बन गई है. पारंपरिक गोचारण की व्यवस्था की तर्ज पर राजस्थान में 'गांव ग्वाला' योजना शुरू की गई है, जिसमें गाय चराने के लिए सरकारी स्तर पर ग्वालों की भर्ती की जा रही है.
कोटा जिले की रामगंजमंडी विधानसभा के 20 गांवों से गांव ग्वाला योजना का यह पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ है. इसके तहत हर 70 गायों पर एक ग्वाले की भर्ती की जा रही है. हर गांव में गायों को सामूहिक रूप से गोचर भूमि तक ले जाने और शाम को सुरक्षित घरों तक लौटाने की व्यवस्था यही गांव ग्वाले संभालेंगे.
अगर किसी गांव में गायों की संख्या 70 से ज्यादा है, तो वहां दो गांव ग्वाले नियुक्त किए जाएंगे. यह गांव ग्वाला गायों को चारागाह में ले जाने के साथ ही चारागाह भूमि की रखवाली भी करेगा. अगर कहीं चारागाह या गोचर भूमि पर अतिक्रमण हो रहा है, तो वह प्रशासन को सूचित करेगा. हर गांव ग्वाले को प्रतिमाह 10 हजार रुपए की सैलरी दी जाएगी. इस योजना का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसके लिए सरकार को किसी तरह का अतिरिक्त वित्तीय भार नहीं उठाना पड़ेगा. पूरी योजना साधु-संतों और भामाशाहों के सहयोग से संचालित की जा रही है.
किसी योजना (जैसे 'गांव ग्वाला' योजना) में जब सरकार के पास बजट नहीं होता, तो इलाके के अमीर व्यापारी, उद्योगपति या सक्षम लोग आगे आकर आर्थिक मदद करते हैं. इन्हीं दानदाताओं को सम्मानपूर्वक 'भामाशाह' कहा जाता है.
हालांकि विपक्ष इस योजना के आर्थिक पक्ष को लेकर सवाल उठा रहा है. पूर्व मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास का कहना है, "बिना बजट प्रावधान किए योजना कैसे संचालित होगी? यह कोई योजना नहीं, बल्कि BJP का सियासी स्टंट है." विपक्ष के आरोपों पर योजना की शुरुआत करने वाले पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर कहते हैं, "कांग्रेस को हर जगह पैसा नजर आता है. पुराने समय में ग्वालों के परिवार के जीवन-यापन का पूरा खर्च सामूहिक रूप से पूरा गांव मिलकर उठाता था. अब तो भामाशाह और साधु-संत खुद मदद के लिए आगे आ रहे हैं."
इस योजना में गांव ग्वालों के साथ ही 'ग्वाला कोऑर्डिनेटर' भी भर्ती किए जा रहे हैं. हर 50 गांव ग्वालों पर एक कोऑर्डिनेटर होगा, जिसे हर माह 20 हजार रुपए की सैलरी और पांच हजार रुपए का पेट्रोल भत्ता दिया जाएगा. यह कोऑर्डिनेटर 50 गांवों के गौ ग्वालों के कार्यों की निगरानी करेगा. जल्द ही इस योजना को चरणबद्ध तरीके से प्रदेश के अन्य गांवों में भी लागू करने की तैयारी है.
योजना के फायदे बताते हुए पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर कहते हैं, "गौ ग्वाला योजना से सिर्फ गायों का ही संरक्षण नहीं होगा, बल्कि चारागाह भूमि अतिक्रमण से बचेगी. गायें खुली नहीं घूमेंगी जिससे किसानों की फसलों को नुकसान नहीं होगा. बेसहारा गोवंश नहीं रहेगा, तो सड़क दुर्घटनाओं में भी कमी आएगी."
2025 में हुई 20वीं पशु जनगणना के अनुसार राजस्थान में गौवंशीय पशुओं की संख्या 2.76 करोड़ है. इनमें अकेले गायों की संख्या करीब 1.39 करोड़ है. वहीं 2012 में हुई 19वीं जनगणना में राजस्थान में गायों की संख्या 1.33 करोड़ थी. पिछले 12 साल में राजस्थान में गायों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. गायों की आबादी के मामले में राजस्थान; पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र के बाद देश में छठे नंबर पर है.
राजस्थान में 3000 से ज्यादा पंजीकृत गौशालाओं के बावजूद हजारों की संख्या में गोवंश सड़कों पर बेसहारा घूमने को मजबूर है. अगर गांव ग्वाला योजना ठीक से लागू होती है, तो बेसहारा गोवंश के संरक्षण की दिशा में यह बड़ा कदम होगा. योजना से जुड़े प्रताप सिंह तोमर कहते हैं - "हर साल हजारों की तादाद में बेसहारा गोवंश सड़क दुर्घटनाओं में अकाल मौत के मुंह में समा जाता है. अब गांव ग्वाले बेसहारा गोवंश का सहारा बनेंगे और राजस्थान गौ संरक्षण की बानगी पेश करेगा. यह योजना सिर्फ रोजगार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राचीन गोचर परंपरा को भी जीवित करेगी."
बहरहाल, राजस्थान की यह गांव ग्वाला योजना केवल गायों को चराने की व्यवस्था भर नहीं है, बल्कि यह राजस्थान की सामाजिक संरचना, सामुदायिक सहयोग और सियासी प्राथमिकताओं की एक साथ परीक्षा भी है. अगर राजस्थान का दान आधारित यह मॉडल पारदर्शी और टिकाऊ ढंग से चला, तो यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था और गौ संरक्षण- दोनों के लिए मिसाल बन सकती है.

