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चार गुटों में बंटी राजस्थान कांग्रेस के झगड़े अब सड़कों पर आए

राजस्थान में इस साल पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं और उससे पहले अंदरूनी कलह कांग्रेस की संभावनाओं को मद्धम करती दिख रही है

राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी का असर संगठनात्मक फैसलों पर भी दिख रहा है (फाइल फोटो)
अपडेटेड 2 अप्रैल , 2026

राजस्थान में कांग्रेस की अंदरूनी कलह एक बार फिर खुलकर सामने आ गई है. बीकानेर से उठे एक कथित वीडियो विवाद ने न केवल कांग्रेस की स्थानीय इकाई को हिला दिया है, बल्कि इसकी गूंज अब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुकी है. 

पूर्व मंत्री गोविंद राम मेघवाल के एक कथित ऑडियो-वीडियो ने सियासी तापमान अचानक बढ़ा दिया है. इसमें उन पर बीकानेर संभाग के दिग्गज नेता स्वर्गीय रामेश्वर डूडी सहित कई नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा इस्तेमाल करने का आरोप है.

यह विवाद महज एक बयान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सड़कों पर उतर आया है. डूडी समर्थकों ने एक अप्रैल को गांधी पार्क से कलेक्ट्रेट तक रैली निकालकर मेघवाल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की. 19 मिनट के इस कथित ऑडियो-वीडियो में केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, स्वर्गीय रामेश्वर डूडी और कांग्रेस नेता मदन गोपाल सहित कई नामों पर आपत्तिजनक टिप्पणियां किए जाने का दावा किया जा रहा है. इससे पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सतह पर आ गया है. जिला महासचिव अमित जोशी का इस्तीफा देना इस बात का संकेत है कि मामला अब व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संगठनात्मक संकट का रूप ले चुका है.

आरोपों के बीच गोविंद राम मेघवाल ने खुद को सियासी साजिश का शिकार बताते हुए पलटवार किया है. मेघवाल का कहना है कि आगामी पंचायतीराज और निकाय चुनावों से पहले उनकी छवि खराब करने के लिए यह सुनियोजित षड्यंत्र रचा गया है. उनके अनुसार, केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल के बेटे रविशेखर मेघवाल और कांग्रेस जिलाध्यक्ष मदन गोपाल की मिलीभगत से यह कथित फर्जी वीडियो तैयार कर वायरल किया गया है.

हालांकि, मदन गोपाल ने इस सफाई को खारिज करते हुए कहा है कि वीडियो असली हो या एडिटेड, दोनों ही स्थितियों में ऐसी भाषा अस्वीकार्य है और यह पार्टी की गरिमा के खिलाफ है. वहीं, BJP नेता रविशेखर मेघवाल ने पूरे विवाद को कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई करार देते हुए अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताया है.

बीकानेर का यह घटनाक्रम कोई अपवाद नहीं है, बल्कि राजस्थान कांग्रेस में गहराती गुटबाजी की एक और कड़ी है. इससे पहले चित्तौड़गढ़ में भी पूर्व मंत्री उदयलाल आंजना और पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह जाड़ावत के बीच टकराव खुलकर सामने आ चुका है. जिलाध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर शुरू हुआ विवाद अब इस हद तक पहुंच गया है कि दोनों गुट एक-दूसरे के कार्यक्रमों का बहिष्कार कर रहे हैं. इसी तरह झुंझुनूं, सीकर, अजमेर, डूंगरपुर और जयपुर में भी संगठनात्मक खींचतान के मामले सामने आ चुके हैं.

गुटबाजी का असर संगठनात्मक फैसलों पर भी साफ दिख रहा है. लंबे समय तक जिलाध्यक्षों की नियुक्ति अटकी रहना और अब युवक कांग्रेस अध्यक्ष पद को लेकर खींचतान इस संकट की गंभीरता को दिखाती है. पार्टी के भीतर सचिन पायलट, अशोक गहलोत, टीकाराम जूली और गोविंद सिंह डोटासरा के बीच चल रही रस्साकशी किसी से छिपी नहीं है. हाल ही में पार्टी के छात्र संगठन NSUI के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर विनोद जाखड़ की नियुक्ति को पायलट खेमे की मजबूती के तौर पर देखा जा रहा है, जिससे बाकी गुटों की सक्रियता और बढ़ गई है.

दरअसल, राजस्थान कांग्रेस इस वक्त चार प्रमुख शक्ति केंद्रों में बंटी नजर आती है- अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली. इन नेताओं के बीच समन्वय का अभाव कई मौकों पर खुलकर सामने आया है. इसी का नतीजा है कि ये सभी नेता लंबे समय से एक साझा मंच पर एकजुट नजर नहीं आए हैं. 

राजस्थान में अगले महीनों में पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव होने हैं और इस लिहाज से ये झगड़े पार्टी के लिए बुरे संकेत हैं. राजनीतिक मामलों के जानकार गजेंद्र सिंह के अनुसार, “कांग्रेस में गुटबाजी नई नहीं है लेकिन पहले यह दो धड़ों तक सीमित रहती थी. अब चार स्पष्ट खेमों के बंटवारे ने स्थिति को अधिक जटिल बना दिया है. यदि यही हालात रहे तो निकाय और पंचायतीराज चुनाव ही नहीं, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की वापसी की संभावनाएं कमजोर पड़ सकती हैं.”

कुल मिलाकर बीकानेर का यह विवाद केवल एक वीडियो का मामला नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक संकट का प्रतीक है जिससे राजस्थान कांग्रेस लंबे अरसे से जूझ रही है. व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और गुटीय वर्चस्व की लड़ाई कांग्रेस की संगठनात्मक एकता पर भारी पड़ती नजर आ रही है.

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