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राजस्थान के चुनावी रण में गहलोत सरकार की चिरंजीवी योजना बेअसर क्यों रही?

अशोक गहलोत सरकार की चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना को राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के लिए तुरुप का इक्का माना जा रहा था

अशोक गहलोत की तस्वीर (फोटो: ANI)
अपडेटेड 3 दिसंबर , 2023

राजस्थान विधानसभा के लिए नतीजे सामने आ गए हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 199 में से 115 सीटें जीत कर बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है. वहीं कांग्रेस ने 68 सीटों पर जीत दर्ज की है और एक सीट पर बढ़त बनाए हुए है. यूं तो 1993 के बाद से ही यह ट्रेंड रहा है कि हर पांच साल के बाद यहां सरकार बदल जाती है.

लेकिन इस बार प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह ट्रेंड बदलने की भरसक कोशिश की थी. चुनावी साल में उन्होंने कई लोक लुभावन घोषणाएं और वादे किए. लेकिन उनकी स्वास्थ्य क्षेत्र से संबंधित 'चिरंजीवी योजना' ने सबसे ज्यादा चर्चा में रही और उसे तुरुप का इक्का माना जा रहा था. 

इस योजना का खूब जोर-शोर से प्रचार भी हुआ. आइए इस योजना का पोस्टमार्टम करते हुए देखते हैं कि इसका चुनाव में क्या असर रहा. 

क्या थी चिरंजीवी योजना? 

राजस्थान सरकार ने चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना साल 2021 में लागू की थी. उद्देश्य था- स्वास्थ्य सेवा को सभी के लिए सुलभ और किफायती बनाना. इस योजना के लिए पात्रों के चयन का आधार भी बहुत ठोस बनाया गया. जिस किसी की आय 8 लाख रुपये से कम है उसे इसका फायदा मिलना था.  शुरुआत में इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार को हर साल 5 लाख रुपये तक का कैशलेस /निःशुल्क इलाज उपलब्ध कराया जाता था. उसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने वित्त वर्ष 2022-23 में इसे बढ़ाकर 10 लाख रुपए कर दिया था. इसके बाद अब 2023-24 के लिए इसे बढ़ाकर 25 लाख रुपए करने की घोषणा की गई. कारवां यहीं नहीं रुका, गहलोत सरकार ने घोषणा की कि यदि वे सत्ता में वापसी करते हैं तो इसकी लिमिट 50 लाख रुपए तक कर दी जाएगी. 

इस बीमा योजना में गंभीर बीमरियों के इलाज की व्यवस्था थी. कोविड 19 से लेकर ब्लैक फंगस, हार्ट सर्जरी, ऑर्गन ट्रांसप्लांट, न्यूरो सर्जरी, पैरालाइसिस और कैंसर जैसी बीमारियां इसमें शामिल की गई थीं. इस योजना के लिए सरकार ने 425 करोड़ रुपए का प्रावधान किया था. इसमें 25 मोबाइल फूड टेस्टिंग एम्बुलेंस और 10 चिरंजीवी जननी एक्सप्रेस एम्बुलेंस की भी शुरुआत की गई .

चुनाव में क्या रहा असर?

गहलोत सरकार को इस योजना से बहुत उम्मीदें थीं. ओल्ड पेंशन स्कीम, सस्ता गैस सिलिंडर, महिलाओं को मोबाइल फोन और साल में 10000 रुपए जैसे अन्य लोक-लुभावन वादे भी थे. इस सबके बीच चिरंजीवी योजना का जिस तरह प्रचार किया जा रहा था, उससे लग रहा था कि यह गहलोत सरकार की सबसे बड़ी स्कीम है. लेकिन चुनावी नतीजों को देखें तो ऐसा लगता है कि जनता ने उनकी तमाम योजनाओं को वैसा समर्थन नहीं दिया जिससे उनकी सत्ता में वापसी हो पाती. कई जगह तो गहलोत के मंत्री मतगणना में पीछे चल रहे हैं. सरकार के मुताबिक, मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना से अब तक 1 करोड़ 35 लाख परिवार जुड़ चुके थे. यही नहीं, इस योजना के तहत अब तक 15 लाख लोगों का कैशलेस इलाज भी हो चुका है. ऐसे में इस योजना का असर धरातल पर दिखना चाहिए था, लेकिन गहलोत सरकार इसका फायदा उठाने में असफल दिखी. 

बीजेपी पड़ी भारी

पेपर लीक मामला, भ्रष्टाचार, महिलाओं के प्रति अपराध, कन्हैयालाल मामले को बीजेपी ने चुनाव प्रचार के दौरान जोर-शोर से उठाया. इसके अलावा खुद कांग्रेस के अंदर गुटबाजी, बागियों को नहीं संभाल पाना भी कुछ ऐसे कारण रहे, जिनसे गहलोत सरकार को काफी जूझना पड़ा. सचिन पायलट और गहलोत के बीच शुरुआती मतभेद भले ही ऐन चुनाव के पहले रास्ते पर आते दिखे लेकिन इससे पहले जनता का मूड पटरी से उतर चुका था. जनता ने ठान लिया था कि राजस्थान का वह रिवाज कायम रखना है जो 1993 से चला आ रहा है.   

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