बरनाला की रैली में 28 फरवरी को राहुल गांधी ने किसी की परवाह नहीं की. मंच पर पंजाब कांग्रेस के दिग्गज बैठे हुए थे. उनके सामने ही कांग्रेस नेता ने अपने भाषण में चेतावनी देते हुए कहा, "एक टीम की तरह काम करें या फिर घर बैठने के लिए तैयार रहें." वे थोड़ा रुके और मैदान में विरोधी गुटों की तरफ से आ रही तालियों के बीच बोले, "पार्टी से बड़ा कोई नहीं है."
ये लाइनें मंच पर बैठे उन नेताओं के लिए एक सीधा मैसेज थीं, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद और गुटों के आका शामिल थे, जिन्होंने कांग्रेस की राज्य इकाई को एक 'वॉर ज़ोन' बना दिया है. राहुल ने हल्की मुस्कान के साथ आगे कहा, "अगर आप लोग खुद को नहीं सुधारेंगे, तो (मल्लिकार्जुन) खड़गे जी और मैं आपको सुधार देंगे." इस बात के साथ भी उनका लहजा एकदम सख्त था.
2022 के विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार (जिसके बाद भगवंत मान की आम आदमी पार्टी सत्ता में आई) के बाद से पंजाब कांग्रेस की लीडरशिप को सरेआम दी गई यह सबसे तीखी चेतावनी थी.
राहुल की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब पार्टी के अंदरूनी झगड़े अपने चरम पर पहुंच चुके हैं. भले ही मान सरकार के खिलाफ 'एंटी-इनकंबेंसी' बढ़ रही हो और BJP व शिरोमणि अकाली दल (SAD) खुद को समेटने में संघर्ष कर रहे हों, लेकिन कांग्रेस विरोधियों के बजाय अपने ही गुटों की वजह से लकवाग्रस्त नजर आ रही है. AAP सरकार दिशाहीन है. BJP अभी हाशिए पर है और अकाली दल का जनाधार खिसक रहा है. फिर भी कांग्रेस इस खालीपन का फायदा उठाने के बदले अपनी अंदरूनी जंग में ताकत गंवा रही है.
जब से पार्टी ने 2021 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाया और चरणजीत सिंह चन्नी को उस कुर्सी पर बिठाया, गुटबाजी खूब फली-फूली है. उस फैसले की कीमत पार्टी को अगले साल के चुनाव में सत्ता गंवाकर चुकानी पड़ी. कांग्रेस ने सुनील जाखड़, राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी और रवनीत बिट्टू जैसे दिग्गजों को अमरिंदर के साथ BJP के हाथों खो दिया. लेकिन इससे कोई सबक नहीं सीखा गया.
राहुल की चेतावनी से मुश्किल से दो हफ्ते पहले, 17 फरवरी को, विधानसभा में विपक्ष के नेता और सीनियर लीडर प्रताप सिंह बाजवा ने दूरियां मिटाने के लिए चंडीगढ़ में अपने घर पर एक डिनर रखा था. इस डिनर की गेस्ट लिस्ट पार्टी के अलग-अलग पावर सेंटर्स का मजमा थी: प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, चन्नी, राज्य प्रभारी भूपेश बघेल, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और विधायकों व पूर्व विधायकों का एक बड़ा धड़ा.
इस डिनर का मकसद अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एकजुटता दिखाना था, लेकिन अंदर के लोगों का कहना है कि इसका उल्टा ही हुआ. चेहरों पर मुस्कान जबरदस्ती की थी और बातचीत में तनाव था. लंबे समय से विरोधी माने जाने वाले बाजवा और वड़िंग ने एक-दूसरे से बहुत ही रस्मी बातचीत की. दलित नुमाइंदगी की वापसी पर नजर गड़ाए चन्नी सबसे अलग-थलग रहे. मीटिंग में मौजूद एक कांग्रेस नेता ने बताया, "यह सुलह से ज्यादा एक फोटो-ऑप था. हर कोई बस वहां दिखने आया था, किसी बात पर राजी होने नहीं."
यह नजारा पंजाब कांग्रेस की दुविधा को समेटता है. पार्टी को AAP के खिलाफ बन रहे माहौल को भुनाना है और एक मजबूत विकल्प देना है. लेकिन यह तय नहीं कर पा रही कि इस लड़ाई की कमान कौन संभालेगा. पार्टी के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, "हर कोई चेहरा बनना चाहता है, लेकिन जमीनी मेहनत करने को कम ही लोग राजी हैं." दिक्कत इस बात से और बढ़ जाती है कि लगभग सभी नेताओं का दबदबा सिर्फ उनके अपने इलाके तक सीमित है. वे खुद को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहते हैं, लेकिन किसी के पास भी पूरे पंजाब में वह पकड़ नहीं है जो पार्टी को एकजुट कर सके और वोटर्स में जोश भर सके.
2024 के लोकसभा चुनावों के लगभग दो साल बाद (जिसने पंजाब में कांग्रेस की वापसी के संकेत दिए थे), राज्य इकाई अभी भी अविश्वास में फंसी है. पिछले जून में लुधियाना वेस्ट उपचुनाव में AAP के हाथों मिली हार ने पार्टी की कमजोरियों को उजागर कर दिया, जिसके बाद भारत भूषण आशु, परगट सिंह और कुशलदीप सिंह ढिल्लों जैसे सीनियर नेताओं ने इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफों को तुरंत मंजूर कर लेना कांग्रेस हाईकमान की हताशा का सिग्नल माना गया.
इन नेताओं ने स्थानीय सांसद राजा वड़िंग को चुनाव प्रचार नहीं करने दिया था. इसके तुरंत बाद, तरनतारन उपचुनाव के दौरान, कुछ नेताओं ने खुलेआम राजा वड़िंग पर "नेगेटिव" प्रचार करने का आरोप लगाया, जो असल में भितरघात कहने का एक शालीन तरीका था. हाईकमान की तरफ से कोई एक्शन न होने से अनुशासनहीनता को और हवा मिली.
गुटबाजी तब से एक फुल-टाइम काम बन गई है. पूर्व विधायक नवजोत कौर सिद्धू राज्य नेतृत्व पर लगातार हमलावर हैं. उन्होंने बीते साल के आखिर में यह आरोप लगाया था कि कांग्रेस का टिकट पाने के लिए 500 करोड़ रुपए देने होते हैं. वे पार्टी की दुर्दशा के लिए वड़िंग और रंधावा का नाम लेती हैं. उनके पति, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, सार्वजनिक रूप से चुप हैं लेकिन निजी तौर पर उनसे सहमति रखते हैं. एक सीनियर पार्टी नेता और सिद्धू समर्थक कहते हैं, "वे वही कह रही हैं जो हम में से कई लोग महसूस करते हैं लेकिन कह नहीं सकते."
इस जनवरी में, जाति का मुद्दा और भी खुलकर सामने आ गया. चंडीगढ़ में पार्टी के अनुसूचित जाति (SC) विंग की बैठक को संबोधित करते हुए, पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री चन्नी ने सवाल उठाया कि "पार्टी में नेतृत्व के पदों पर सवर्ण नेताओं का ही एकाधिकार क्यों बना हुआ है." इन टिप्पणियों को सीधे तौर पर जाट-सिखों के दबदबे पर एक छिपे हुए हमले के रूप में देखा गया. इसका रिएक्शन भी तुरंत दिखा: सवर्ण नेताओं में बेचैनी, दलित कैडर की तरफ से दबी हुई तालियां, और पार्टी के टूटे हुए ढांचे में एक और दरार. एक वरिष्ठ कांग्रेस पदाधिकारी ने कहा, "चन्नी ने शायद सच बोला हो, लेकिन उनकी टाइमिंग पूरी तरह से राजनीतिक थी. वे जानते हैं कि लीडरशिप का मुद्दा खुला है और वे खुद को फिर से उस पोजिशन में ला रहे हैं."
इस बीच, दिग्गज विधायक सुखपाल सिंह खैरा और राणा गुरजीत सिंह ने पार्टी की हर मीटिंग को एक-दूसरे पर निशाना साधने का मंच बना लिया है. दोनों का अपने-अपने इलाकों में रसूख है, और दोनों एक-दूसरे पर जरा भी भरोसा नहीं करते. कैंडिडेट चुनने और कैंपेन कंट्रोल करने की उनकी आपसी जंग ने लोकल कैडर को बांट दिया है. पिछले महीने कपूरथला में जब प्रशासन ने खैरा की पुश्तैनी संपत्ति की दीवार का एक हिस्सा गिरा दिया, तो उन्होंने AAP सरकार पर बदले की भावना का आरोप लगाया. राजा वड़िंग और बाजवा समेत पूरी कांग्रेस उनके बचाव में उतर आई, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह घटना भी कांग्रेस के विरोधी गुटों के बीच वर्चस्व की एक और प्रॉक्सी जंग बन गई.
यहां तक कि दिल्ली के दखल का भी कोई खास असर नहीं हुआ है. बघेल सुलह-सफाई की बैठकों के बीच भागदौड़ कर रहे हैं, जबकि खड़गे और राहुल ने नेताओं को बार-बार चेतावनी दी है कि वे सार्वजनिक रूप से पार्टी की फजीहत न कराएं. लेकिन ढांचे में कोई सुधार नहीं हुआ है. हाईकमान ने विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद के चेहरे का नाम घोषित करने से परहेज किया है. यह इस बात को दिखाता है कि वे जानते हैं कि कोई भी घोषणा नई गुटबाजी की आग भड़का सकती है.
पंजाब कांग्रेस में विरोध की आवाजें काफी तेज रही हैं. इसका एक नमूना देखिए:
पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर के सांसद चरणजीत चन्नी का कहना है, "जब कांग्रेस में फैसले होते हैं, तो अक्सर सवर्ण नेता सत्ता पर कब्जा कर लेते हैं. दलितों और दूसरे समुदायों को दरकिनार कर दिया जाता है, जबकि हम पंजाब की आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं."
वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और लुधियाना के सांसद अमरिंदर राजा वड़िंग कहते हैं, "हम 2027 के चुनावों में 60-70 युवा चेहरों को उतारने की योजना बना रहे हैं. यह राज्य की डेमोग्राफिक ताकत का इस्तेमाल करेगा और लोकतांत्रिक बदलाव के प्रति पार्टी के कमिटमेंट को दिखाएगा."
पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा की राय है, "पंजाब में, कांग्रेस को सबसे सीनियर नेता को मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में पेश करना चाहिए. अनुभव, सेवा रिकॉर्ड और पार्टी में सम्मान के आधार पर चुनाव होना चाहिए, न कि खरीद-फरोख्त या गुटबाजी के आधार पर."
पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भले ही खामोश हैं, लेकिन उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू सनसनीखेज आरोप लगा रही हैं, "ऐसा लगता है कि कांग्रेस में सिर्फ वही आगे बढ़ सकता है जिसके पास करोड़ों का सूटकेस हो. मेरिट और जनसेवा अब मायने नहीं रखती."
गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा का कहना है, "आंतरिक लोकतंत्र के बहाने, कुछ नेताओं को लगता है कि वे पार्टी से बड़े हैं. जो लोग अनुशासनहीनता फैला रहे हैं, उनके खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाना चाहिए."
फिलहाल, कांग्रेस की पंजाब इकाई अलग-अलग गुटों का एक 'पैचवर्क' है - बाजवा का पुराना खेमा, राजा वड़िंग का युवा धड़ा, चन्नी का दलित मोबिलाइजेशन, रंधावा का जाट बेस और सिद्धू परिवार का पॉपुलिस्ट 'वाइल्ड कार्ड'. हर कोई अपनी जमीनी पकड़ का दावा करता है, लेकिन कोई एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करता.
पंजाब में कांग्रेस के लिए विरोधाभास क्रूर रूप से बहुत सीधा है. राजनीतिक तौर पर, हालात एकदम मुफीद हैं: मान सरकार किसानों की नाराजगी और दिशाहीन शासन से जूझ रही है. BJP अभी हाशिए पर है. अकाली दल टूट रहा है और उसका जनाधार खिसक रहा है. फिर भी कांग्रेस, जिसे इस खालीपन का फायदा उठाना चाहिए था, अपनी अंदरूनी जंग में यह सब गंवा रही है.
राहुल का बरनाला भाषण एक अल्टीमेटम था. लेकिन जैसा कि कई अंदरूनी सूत्र मानते हैं, शायद यह काफी न हो. माझा इलाके के एक सीनियर नेता ने कहा, "आप भाषण देकर एकजुटता नहीं थोप सकते. लीडरशिप की समस्या स्ट्रक्चरल (ढांचागत) है; यह जाति, पर्सनैलिटी और हक जताने के बारे में है."
बाजवा के घर पर हुआ डिनर और बरनाला की रैली एक ही कहानी के दो सिरे हैं - एक ऐसी पार्टी जो अपने मौकों को जानती है, फिर भी अपने ही विरोधाभासों की वजह से लकवाग्रस्त है. कांग्रेस को अपने अंदरूनी राक्षसों से लड़ना ही होगा, वरना वह एक और जीता जा सकने वाला चुनाव हाथ से फिसलने देगी. हाईकमान का मैसेज बिल्कुल साफ है और राज्य इकाई का रिएक्शन अनिश्चित है. पंजाब में, कांग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन खुद कांग्रेस ही नजर आ रही है.

