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पीएम मोदी का काशी दौरा, निशाने पर बंगाल!

पश्च‍िम बंगाल में विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण के मतदान के दौरान पीएम मोदी अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में महिला सम्मेलन और रोडशो के जरिए करेंगे ‘मैसेज पॉलिटिक्स’

पीएम नरेंद्र मोदी और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी
अपडेटेड 27 अप्रैल , 2026

लोकसभा के विशेष सत्र में ‘नारी शक्ति वंदन’ संशोधन बिल के अटक जाने के बाद सियासत का केंद्र महिलाओं का मुद्दा बन चुका है और इसी बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य के बीच नरेंद्र मोदी का काशी दौरा सिर्फ एक स्थानीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की राजनीति-खासतौर पर पश्चिम बंगाल-के लिए एक सोचा-समझा संदेश बनकर उभर रहा है. 

28 अप्रैल को वाराणसी में प्रस्तावित ‘नारी शक्ति वंदन सम्मेलन’ और अगले दिन का लंबा रोड शो केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं हैं, बल्कि प्रतीकों, संस्कृति और कनेक्टिविटी के सहारे एक बड़े राजनीतिक नैरेटिव को गढ़ने की कोशिश है. BJP की कोशिश रहेगी कि इसकी गूंज काशी से निकलकर सीधे बंगाल तक सुनाई दे.

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी का यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब बंगाल में चुनावी प्रक्रिया अपने निर्णायक चरण में है. 29 अप्रैल को यहां दूसरे और अंतिम चरण का मतदान होगा. 27 अप्रैल की शाम को प्रचार थम जाएगा, लेकिन ठीक उसके बाद 28 अप्रैल को काशी में 50 हजार महिलाओं के बीच प्रधानमंत्री की मौजूदगी एक ऐसा विजुअल और संदेश तैयार करेगी, जिसे राजनीतिक तौर पर बंगाल के मतदाताओं तक पहुंचाने की रणनीति माना जा रहा है. 

BJP इस आयोजन के जरिए विपक्ष-खासतौर पर कांग्रेस, सपा, डीएमके और टीएमसी-को ‘महिला विरोधी’ के तौर पर स्थापित करने में जुटी है, और काशी इसका लॉन्चपैड बन रहा है.

काशी को इस संदेश के लिए चुनना महज संयोग नहीं है. वाराणसी के रहने वाले राजनीतिक विश्लेषक उत्पल पाठक बताते हैं, “वाराणसी और बंगाल का रिश्ता सदियों पुराना है. यह रिश्ता सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी गहराई से जुड़ा हुआ है. बंगाल की प्रसिद्ध दानवीर रानी भवानी ने काशी में कई घाट, मंदिर और धर्मशालाएं बनवाई थीं, जो आज भी इस जुड़ाव की गवाही देते हैं. गंगा किनारे बसे बंगाली टोला जैसे इलाकों में आज भी बंगीय संस्कृति सांस लेती है. शारदीय नवरात्र में दुर्गोत्सव और दीपावली के समय काली पूजा के दौरान बनारस का एक बड़ा हिस्सा मिनी बंगाल में बदल जाता है.” 

यही सांस्कृतिक सेतु प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति का अहम हिस्सा बनता दिख रहा है. काशी में होने वाले सम्मेलन में दो दर्जन से अधिक बंगाली महिलाएं पारंपरिक वेशभूषा में शंखनाद करेंगी. स्वागत भी बंगीय शैली में होगा. यह सिर्फ एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश है कि काशी और बंगाल का रिश्ता जीवंत है और BJP इस रिश्ते को राजनीतिक संवाद में बदलना चाहती है.

काशी में लगभग 70 हजार बंगाली मतदाता हैं, जो पिछले चार दशकों से शहर दक्षिणी और कैंट विधानसभा सीटों पर BJP के समर्थन का आधार रहे हैं. ऐसे में यह आयोजन स्थानीय स्तर पर भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका व्यापक लक्ष्य बंगाल के मतदाताओं को प्रभावित करना है. 

BJP पहले से ही बंगाल में महिला सुरक्षा को बड़ा चुनावी मुद्दा बना चुकी है. काशी में ‘नारी शक्ति’ के नाम पर होने वाला यह शक्ति प्रदर्शन उसी नैरेटिव को मजबूत करने की कोशिश है. प्रधानमंत्री का कार्यक्रम भी पूरी तरह इसी रणनीति के अनुरूप तैयार किया गया है. 28 अप्रैल को बरेका (BLW) परिसर में लगभग 40 हजार महिलाओं के लिए जर्मन हैंगर तकनीक से विशाल पंडाल तैयार किया जा रहा है. इसमें लखपति दीदी जैसी योजनाओं से जुड़ी महिलाओं को सम्मानित किया जाएगा. यह आयोजन पूरी तरह महिला-केन्द्रित होगा, जिसे भारतीय जनता महिला मोर्चा संचालित करेगा. मंडल स्तर तक बैठकों के जरिए 50 हजार से अधिक महिलाओं को जुटाने की तैयारी की गई है. बूथ स्तर पर संपर्क अभियान चलाया गया है ताकि यह कार्यक्रम केवल सभा न रहकर जनांदोलन जैसा स्वरूप ले सके. 

उत्पल पाठक बताते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाराणसी के सांसद बनने के बाद से काशी और बंगाल के बीच की कनेक्ट‍िविटी पर काफी काम किया गया. इसने काशी और बंगाल के बीच संबंधों को सिर्फ सांस्कृतिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक रूप से भी मजबूत किया है. गंगा जलमार्ग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. राष्ट्रीय जलमार्ग-1 के तहत वाराणसी से हल्दिया तक जलमार्ग विकसित किया गया है, जिससे मालवाहक और पर्यटक जहाजों का संचालन संभव हुआ है. 

यह परियोजना उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल को एक आर्थिक कॉरिडोर में जोड़ती है. इससे न सिर्फ व्यापार बढ़ा है, बल्कि काशी और बंगाल के बीच ऐतिहासिक नदी मार्ग को आधुनिक रूप भी मिला है.

इसी तरह सड़क और रेल कनेक्टिविटी भी तेजी से मजबूत हुई है. वाराणसी से कोलकाता के बीच सिक्स-लेन सड़क परियोजना ने यात्रा को तेज और सुगम बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है. साथ ही वाराणसी-हावड़ा हाईस्पीड रेल कॉरिडोर का सर्वे पूरा हो चुका है, जो भविष्य में इन दो महत्वपूर्ण शहरों के बीच दूरी को और कम करेगा. इसके अलावा, उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल को जोड़ने वाले करीब 2600 करोड़ रुपए के रेल-रोड ब्रिज का शिलान्यास भी प्रस्तावित है, जो इस क्षेत्र को एकीकृत आर्थिक क्षेत्र में बदलने की दिशा में बड़ा कदम होगा. 

इन परियोजनाओं का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है. BJP इन्हें ‘विकास मॉडल’ के तौर पर प्रस्तुत करती है और काशी को उसका प्रतीक बनाती है. वाराणसी में BJP के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, “जब प्रधानमंत्री काशी से इन परियोजनाओं का जिक्र करते हैं, तो उसका संदेश बंगाल तक जाता है कि विकास और कनेक्टिविटी के जरिए क्षेत्रीय असमानताओं को कैसे कम किया जा सकता है.”

29 अप्रैल को प्रधानमंत्री का करीब 14 किलोमीटर लंबा रोड शो भी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है. वाराणसी का सांसद बनने के बाद मोदी पहली बार यहां इतना लंबा रोडशो कर रहे हैं. इससे पहले पीएम मोदी ने 23 मई 2024 को बीएचयू से दशाश्वमेध तक पांच किलोमीटर लंबा रोड शो किया था. प्रधानमंत्री ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भी रोड शो किया था लेकिन रूट इतना लंबा नहीं था. 

इस बार का रोडशो बीएलडब्ल्यू से शुरू होकर मंडुवाडीह, लहरतारा, पुलिस लाइन, लहुराबीर और मैदागिन होते हुए श्री काशी विश्वनाथ मंदिर तक जाएगा. इस रोड शो के जरिए प्रधानमंत्री सीधे जनता से संवाद करेंगे, और इसकी तस्वीरें और वीडियो बंगाल सहित पूरे देश में प्रसारित होंगी. काशी विश्वनाथ धाम में दर्शन भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है. राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक प्रतीकों का यह मेल प्रधानमंत्री की राजनीति की खास पहचान रहा है. काशी से निकलने वाला यह धार्मिक-सांस्कृतिक संदेश बंगाल के उस मतदाता वर्ग को भी प्रभावित करने की कोशिश है, जो परंपरा और पहचान के मुद्दों से गहराई से जुड़ा हुआ है.

पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे चरण का मतदान जिन 142 सीटों पर होना है, वे ज्यादातर संवेदनशील और राजनीतिक रूप से अहम मानी जाती हैं. इसमें दक्षिण बंगाल के वे इलाके शामिल हैं जहां शहरी और अर्ध-शहरी मतदाताओं के साथ-साथ महिला वोटर निर्णायक भूमिका में हैं. इन क्षेत्रों में BJP और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर देखी जा रही है, जबकि कुछ सीटों पर वाम-कांग्रेस गठजोड़ भी प्रभाव डालने की कोशिश में है. खास बात यह है कि इन सीटों पर पिछली बार BJP ने अपने वोट शेयर में उल्लेखनीय बढ़त बनाई थी, इसलिए इस चरण को पार्टी के लिए “कंसॉलिडेशन फेज” माना जा रहा है.

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