
गुरुवार, 26 फरवरी 2026. पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के प्रचार का आखिरी दिन. विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिष्ठित महाविद्यालय साइंस कॉलेज के मैदान में 'प्रेसिडेंशियल डिबेट' का मंच सजा है. मंच पर विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. नमिता सिंह भी मौजूद हैं. अलग-अलग छात्र संगठनों से जुड़े और निर्दलीय कुल 11 उम्मीदवार अपना पक्ष रखने के लिए मंच पर उपस्थित हैं.
ये उम्मीदवार अपने संबोधन में न सिर्फ विश्वविद्यालय के मसलों पर बात रख रहे हैं, बल्कि देश और दुनिया की राजनीति के सवालों को भी छेड़ रहे हैं. इनमें से कोई एक 28 फरवरी के चुनाव को जीतकर पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष बनेगा. मगर क्या इनमें से कोई अगला लालू, नीतीश या सुशील मोदी भी बनेगा? यह एक बड़ा सवाल है.
पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ की पहचान इसलिए भी है, क्योंकि यहां से बड़े-बड़े नेता निकले और इन नेताओं ने बिहार एवं देश, दोनों जगह सरकारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बिहार में पिछले 35-36 वर्षों से जिन दो नेताओं के इर्द-गिर्द सत्ता रही है- लालू प्रसाद और नीतीश कुमार, वे इसी पटना विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं और यहीं से उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत की थी.
इनके अलावा कांग्रेस के रामजतन सिन्हा, BJP के सुशील कुमार मोदी, अश्विनी चौबे और रविशंकर प्रसाद जैसे कद्दावर नेता इसी विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति की उपज रहे हैं. मगर हाल के वर्षों में इस विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों से जुड़ा कोई नेता शायद ही विधायक भी बन पाया है. और तो और, भाकपा-माले को छोड़ दें तो राज्य की किसी पार्टी ने हाल के वर्षों में यहां के छात्र नेताओं को टिकट तक नहीं दिया है.
प्रेसिडेंशियल डिबेट के दौरान वहां कुछ पूर्व छात्र नेता भी नजर आते हैं. इनमें 2012 के छात्र संघ चुनाव में उपाध्यक्ष पद पर जीतने वाले अंशुमन भी शामिल हैं. उनके बारे में स्थानीय छात्र बताते हैं कि वे हर चुनाव और कई आयोजनों में विश्वविद्यालय में नजर आते हैं, मगर राजनीति में अब तक उन्हें कोई बड़ी सफलता नहीं मिली.

उनके साथ अध्यक्ष का चुनाव जीतने वाले आशीष सिन्हा, जो BJP के कद्दावर विधायक रहे अरुण सिन्हा के पुत्र हैं, उन्हें भी विधायकी का टिकट नहीं मिला. हालांकि, वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से निकलकर अब भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं. 2012 के बाद से जितने भी लोग छात्र संघ के चुनाव में शामिल हुए, उनमें से सिर्फ एक दिव्या गौतम को 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाकपा-माले ने दीघा विधानसभा सीट से मैदान में उतारा था. हालांकि, वे जीत हासिल नहीं कर पाईं.
2012 का जिक्र इसलिए, क्योंकि 1970 से 'प्रेसिडेंशियल' तरीके से होने वाला पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव 1984 तक ही नियमित हो पाया था. उसके बाद यह 2011 तक बंद रहा. छात्र नेता बताते हैं कि 2012 में विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति शंभूनाथ सिंह की जिद की वजह से चुनाव संपन्न हुआ था. उसके बाद फिर चुनाव बंद हो गए. फिर 2018 में जब सत्यपाल मलिक बिहार के राज्यपाल थे, तो उन्होंने राज्य में अरसे से बंद पड़े छात्र संघ चुनावों को फिर से शुरू कराया. उसके बाद से कम से कम पटना विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव नियमित रूप से होते रहे हैं, हालांकि बीच-बीच में एक-दो साल का अंतराल भी आया.
फरवरी 2018 में पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष का चुनाव जीतने वाले दिव्यांशु भारद्वाज ABVP और जनता दल यूनाइटेड, दोनों में सक्रिय रहे. उन्होंने 2025 के विधानसभा चुनाव के लिए मोतिहारी सीट से अपनी तैयारी की थी, मगर उन्हें टिकट नहीं मिला. आखिरी वक्त में उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा, लेकिन उन्हें जीत हासिल नहीं हुई.

इंडिया टुडे से बातचीत में दिव्यांशु अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहते हैं, "बिहार की राजनीति में जितने पुराने लोग हैं, वे सभी छात्र राजनीति के रास्ते से ही आए हैं. उन्हें मालूम है कि अगर विश्वविद्यालय छात्र संघ से नए लोग आए, तो उनकी सत्ता को नियमित चुनौती मिलती रहेगी. इसलिए इस रास्ते को हमेशा के लिए बंद करने का प्रयास किया जाता रहा है. इसके अलावा कैंपस को जातियों में बांट दिया गया है. पटना विश्वविद्यालय में 25 हजार छात्र नियमित रूप से रहते हैं. अगर वहां समाज के मुद्दों पर छात्र सक्रिय रहेंगे और चर्चाएं होंगी या वे धरने पर बैठेंगे, तो पूरा पटना जाम हो जाएगा. इसलिए भी पार्टियां यहां के छात्र नेताओं को आगे बढ़ाने से बचती हैं."
वे आगे कहते हैं, "अब ऊपर के लोग चाहते हैं कि बिना जनाधार वाले नेता चुनाव लड़ें, ताकि उन्हें जब चाहे किनारे किया जा सके. ऐसे में हम जैसे लोग पांच साल जिंदाबाद-मुर्दाबाद करते हैं और आखिर में किसी पैसे वाले को टिकट दे दिया जाता है. खैर, हम यह समझते हैं कि कम से कम छात्र संघ के चुनाव तो हो रहे हैं. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में जरूर कुछ अच्छा होगा."
दिव्यांशु को तो उनकी पार्टी ने टिकट नहीं दिया, मगर 2012 में आईसा (AISA) से अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने वाली दिव्या गौतम को उनकी पार्टी भाकपा-माले ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में दीघा सीट से प्रत्याशी बनाया. दिव्या कहती हैं, "यह इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि हमारी पार्टी दूसरी पीढ़ी (सेकेंड जेनरेशन) को तैयार करने में जुटी रहती है. हमारे यहां संदीप सौरभ और अजीत कुशवाहा जैसे छात्र नेताओं को इसीलिए मौका मिलता है. मगर दूसरी मुख्यधारा की पार्टियों में यह मुमकिन नहीं है. वहां या तो 70-70 साल के पुराने लोग काबिज हैं, या नए लोगों के नाम पर बड़े नेताओं के बच्चों को टिकट दिया जाता है. तभी तो कुशवाहा जी (उपेंद्र कुशवाहा, अध्यक्ष रालोसपा) का बेटा बिना चुनाव लड़े मंत्री बन जाता है, जबकि स्टूडेंट लीडर महज कार्यकर्ता ही बने रह जाते हैं."
दिव्या यह भी बताती हैं, "2012 से मैं देख रही हूं कि मेरे साथ और मेरे बाद छात्र राजनीति में जो लोग आए, वे काफी निराश हैं. उनका संघर्ष काफी लंबा है. उनमें से कई लोग परेशान होकर राजनीति छोड़ देते हैं, क्योंकि आजीविका का सवाल बड़ा है. जो राजनीति में बचे भी रहते हैं, उनके पास कभी इतने पैसे नहीं होते कि बड़ी पार्टियों का टिकट हासिल कर सकें और चुनाव लड़ सकें. इसी वजह से पिछले एक दशक में हमने बिहार की किसी बड़ी पार्टी में स्टूडेंट एक्टिविस्ट को आगे बढ़ते नहीं देखा है."
2018 में छात्र संघ चुनावों की शुरुआत हुई तो पटना विश्वविद्यालय ही नहीं, बल्कि बिहार के दूसरे विश्वविद्यालयों में भी चुनाव हुए. मगर फिर ये चुनाव पटना विश्वविद्यालय तक ही सीमित होने लगे. 2018 के दिसंबर में फिर से छात्र संघ चुनाव हुए, जिसके बाद 2019, 2020, 2022 और 2025 में भी यहां चुनाव संपन्न हुए. और अब 2026 में फिर चुनाव हो रहे हैं.
दिसंबर 2018 के पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में एक बड़ा बदलाव यह हुआ कि अब तक सीमित संसाधनों में होने वाले इन चुनावों पर 'धन-बल' हावी होने लगा. पुराने छात्र बताते हैं कि उस साल पहली बार यहां दिल्ली विश्वविद्यालय की तर्ज पर चुनाव हुए और प्रत्याशियों ने खूब पैसे खर्च किए. प्रचार में गाड़ियां उतारी गईं, पैम्फलेट्स उड़ाए गए और विभिन्न कॉलेजों के सामने गोलगप्पे, चाट और आइसक्रीम के ठेले खड़े किए जाने लगे, जिसका असर इस चुनाव में भी दिखता है. पुराने छात्र इस शुरुआत का श्रेय प्रशांत किशोर को देते हैं, जो उस वक्त JDU में थे और छात्र संघ चुनाव का दायित्व पार्टी की ओर से उन्हीं के पास था.

इस बार भी प्रेसिडेंशियल डिबेट में एक बड़ी पार्टी के छात्र संगठन के नेता के काफिले के साथ कई एसयूवी गाड़ियां पहुंचीं, जिन्हें मंच से यह कहकर बाहर करना पड़ा कि इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना जाएगा. जानकार बताते हैं कि छात्र संघ चुनाव में अब पटना विश्वविद्यालय में भी खूब पैसे खर्च हो रहे हैं. पूरे कैंपस में पर्चे बिखरे दिखते हैं. उम्मीदवारों की जाति के नेता उन्हें फाइनेंस करते हैं और कुछ ठेकेदार भी उन्हें सहयोग करते हैं, ताकि उनकी पैरवी से विश्वविद्यालय के ठेकों में उन्हें हिस्सेदारी मिल सके. पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव में यह सब तो हो रहा है, बस अगर कुछ नहीं हो रहा, तो वह है एक अच्छे राजनेता का उभरकर सामने आना.

