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राजस्थान रिफाइनरी की चमक में दफन 600 साल पुरानी नमक की विरासत

राजस्थान के पचपदरा में जहां रिफाइनरी बनी है, वहां इससे पहले नमक की खदानें हुआ करती थीं और यह नमक अपनी गुणवत्ता की वजह से पूरी दुनिया में पहचाना जाता था

सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 21 अप्रैल , 2026

राजस्थान की पचपदरा रिफाइनरी में 20 अप्रैल को लगी आग ने एक बार फिर 80 हजार करोड़ की इस बहुचर्चित परियोजना को सुर्खियों में ला दिया है. पचपदरा की इस रिफाइनरी को विकास का नया प्रतीक बताया जा रहा है, लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसी कहानी दब गई है जो न सिर्फ 600 साल पुरानी है, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी से सीधे जुड़ी है. 

यह कहानी है पचपदरा के नमक कारोबार की. उस नमक की जिसने कभी इस इलाके को पहचान दी, रोजगार दिया और देश-विदेश तक अपनी गुणवत्ता का परचम लहराया. आज वही नमक उद्योग खामोशी से मिट्टी में समा गया है और उससे जुड़ा खारवाल समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.

पचपदरा के रण क्षेत्र में फैली करीब 32.34 वर्ग मील की जमीन पर सदियों से नमक उत्पादन होता रहा है. यह केवल एक व्यवसाय नहीं था, बल्कि खारवाल समाज की पहचान और जीवन का आधार था. इसी ‘खारे’ नमक से इस समाज का नाम खारवाल पड़ा. बताया जाता है कि 300-400 साल पहले 1200 से अधिक नमक की खानें इस इलाके में सक्रिय थीं. इनमें से 433 खानें सीधे खारवाल समाज की थीं. इन खानों से पचपदरा और इसके आस-पास के 40 किलोमीटर क्षेत्र से जुड़े लगभग 20 हजार लोगों की रोजी-रोटी चलती थी.

वर्ष 2013-14 में जब रिफाइनरी परियोजना को लीलाणा से पचपदरा शिफ्ट किया गया तो इसके लिए 12 हजार 34 बीघा जमीन हस्तांतरित की गई. इस विकास की कीमत नमक उद्योग को चुकानी पड़ी. रिफाइनरी की परिधि में आने वाली 198 नमक की खानें जमींदोज कर दी गईं. इन खानों के साथ हजारों परिवारों का रोजगार भी यहीं दफन हो गया. उस समय बेरोजगार हुए लोगों ने विरोध प्रदर्शन भी किया, मगर आज तक आश्वासनों के अलावा कुछ हाथ नहीं आया.

खारवाल समाज के शैतान सिंह बताते हैं, "हमारी खान नंबर 50 थी जिससे सालाना करीब 100-150 टन नमक उत्पादन होता था. खान चली गई तो अब ऑटो चलाकर अपनी आजीविका चलानी पड़ रही है." यह सिर्फ शैतान सिंह की कहानी नहीं है, बल्कि पूरे खारवाल समाज और इस क्षेत्र में नमक उद्योग से जुड़े हर परिवार की दास्तां है.

पचपदरा में नमक प्राकृतिक रूप से पाया जाता है
पचपदरा में नमक प्राकृतिक रूप से पाया जाता है; पीछे बनी रिफाइनरी

पचपदरा का नमक केवल स्थानीय उपयोग तक सीमित नहीं था. इसकी गुणवत्ता इतनी बेहतर है कि इसे बिना प्रोसेसिंग के सीधे ही उपयोग में लिया जा सकता था. उस वक्त नमक ही इस पूरे इलाके की जीवन रेखा था. यही वजह है कि यहां से नमक की ढुलाई के लिए रेलवे लाइन बिछाई गई थी और मालगाड़ियां चलती थीं. 1932 में जब पचपदरा में नमक की खानें और नमक परिवहन जोरों पर था, तब यहां अंग्रेजों ने रेल चलाई थी. इस रेल में चार पैसेंजर कोच और शेष नमक परिवहन के लिए कोच लगते थे.

1990 में आई बाढ़ में जब पटरी बह गई तो यहां रेल का संचालन स्थाई रूप से बंद कर दिया गया. रेल बंद होने के बाद वर्ष 1992 में रेल पटरियों को भी पचपदरा तक उखाड़ लिया गया था और इसके बाद यह रेलमार्ग पूर्णतया बंद हो गया. इसी बाढ़ के बाद सांभरा गांव पचपदरा आकर शिफ्ट हो गया. सांभरा और पचपदरा में ब्रिटिश काल के रेलवे स्टेशन आज भी मौजूद हैं. ब्रिटिश काल में इस नमक के व्यापार के लिए गेस्ट हाउस, ट्रेजरी और चौकियां तक बनाई गई थीं.

आजादी के आंदोलन के पन्नों में भी पचपदरा का नमक दर्ज है. वरिष्ठ पत्रकार गुलाब बत्रा बताते हैं, "महात्मा गांधी ने नमक कानून के खिलाफ दांडी पहुंचकर 6 अप्रैल 1930 को नमक कानून तोड़ा था, मगर यहां के स्थानीय लोगों ने 1926 में ही नमक पर ब्रिटिश एकाधिकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक दिया था. यह आंदोलन महात्मा गांधी की दांडी यात्रा का आधार बना था. पचपदरा सॉल्ट डिपो में नमक कानून को तोड़कर इस आंदोलन की नींव रखी गई थी. 1879 में मारवाड़ में नमक उत्पादन को लेकर हुई संधियों के खिलाफ भी यहां आंदोलन हुए थे. पचपदरा केवल नमक उद्योग नहीं, बल्कि संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक भी रहा है."

पचपदरा में नमक उत्पादन की कहानी भी रोचक है. बताया जाता है कि मेवाड़ रियासत के झांझा नामक एक अधिकारी अपने घोड़े पर सवार होकर यहां से गुजर रहे थे, तो उन्हें रेत के गड्ढों में चमकते हुए सफेद कण दिखाई दिए. उन्होंने इस पानी में हाथ डालकर चखा तो उसका स्वाद खारा था. हाथ का पानी सूखा तो रेत के कण नमक की तरह चिपक गए. वहीं से झांझा ने नमक बनाने का काम शुरू किया.

आज भी पचपदरा में नमक परंपरागत तरीके से ही बनाया जाता है. स्थानीय लोग नमक को आशापुरा माता का वरदान मानते हैं. सबसे पहले बारिश का पानी गड्ढों में जमा होता है. इसके बाद रेगिस्तान में बहुतायत से पाए जाने वाले मुराली नामक पौधे को नमक की खान में डाल दिया जाता है. इसके बाद 10-11 माह में यहां नमक तैयार हो जाता है. 

महिलाएं नमक को खान से निकालकर बाहर पिरामिड की आकृति में स्टॉक करती हैं. बरसात में नमक खराब न हो, इसके लिए यह तरीका काम में लिया जाता है. इस विधि के कारण बरसात में नमक की सिर्फ एक छोटी सी परत खराब होती है और नीचे का नमक सुरक्षित रह जाता. प्राकृतिक रूप से तैयार होने के कारण इस नमक का स्वाद सबसे अलग है.

पचपदरा के नमक उद्योग का अतीत चाहे कितना ही सुनहरा क्यों न रहा हो, मगर आज यह कारोबार एक दोराहे पर खड़ा है. एक तरफ आधुनिक विकास की रिफाइनरी परियोजना है जो भविष्य की संभावनाएं दिखाती है, वहीं दूसरी तरफ एक 600 साल पुरानी विरासत है जो धीरे-धीरे मिटती जा रही है. यहां के खारवाल समाज के लिए यह सिर्फ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि पहचान और अस्तित्व का सवाल बन चुका है. जिस नमक ने कभी उनकी जिंदगी में स्वाद घोला था, आज वही उनके आंसुओं का कारण बन गया है.

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