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ओडिशा के विधायकों ने सैलरी तीन गुना बढ़वाई, लेकिन अब उसे लेने से मना क्यों कर रहे?

ओडिशा विधानसभा के शीतकालीन सत्र में पेश एक विधेयक के मुताबिक अब यहां विधायकों की सैलरी देश में सबसे ज्यादा हो जाएगी

Odisha CM Mohan Manjhi
ओडिशा के मुख्यमंत्री एक कैबिनेट मीटिंग में (फाइल फोटो)
अपडेटेड 30 दिसंबर , 2025

कुल 147 सदस्यों वाली ओडिशा विधानसभा में बीते 9 दिसंबर को बड़ा ही खुशनुमा माहौल था. सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के ही विधायकों के चेहरे दमक रहे थे, क्योंकि जिस मांग के लिए अमूमन थर्ड और फोर्थ ग्रेड के कर्मचारियों को अक्सर आंदोलन करने पड़ते हैं, वह इन विधायकों के लिए बिना कोई जोर लगाई ही पूरी हो रही थी और वह भी, तीन गुना ज्यादा! 

दरअसल उस दिन संसदीय कार्यमंत्री मुकेश महालिंग ने विधायकों, मंत्रियों, जिसमें मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं, के वेतन और भत्तों में तीन गुना बढ़ोतरी से संबंधित चार अहम विधेयक पेश किए. बिना किसी देरी के, इस विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया. ओडिशा के विधायकों का वेतन अब देशभर के किसी भी विधानसभा सदस्यों से सबसे अधिक यानी 3.50 लाख रुपये से 3.68 लाख रुपये प्रतिमाह तय हुआ. हालांकि माकपा विधायक लक्ष्मण मुंडा एकमात्र ऐसे विधायक थे, जिन्होंने इस विधेयक का विरोध किया था. 

बहरहाल विधेयक तो पारित हो गया, लेकिन राज्यभर में धीमे स्वर में ही सही, इसका विरोध भी शुरू हो गया. मौके की नजाकत भांपते हुए 13 दिसंबर को बीजू जनता दल (BJD) के प्रमुख और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इस बढ़े हुए वेतन का पहले तो विरोध किया और वेतन लेने से इंकार भी कर दिया. मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में पटनायक ने घोषणा की कि वे वेतन वृद्धि का लाभ नहीं लेंगे और इस राशि को राज्य के गरीबों के कल्याण में उपयोग करने का आग्रह किया. 

जवाब में सीएम मोहन माझी ने भी बढ़ा हुआ वेतन लेने से इंकार कर दिया. यानी लक्ष्मण मुंडा की जलाई मशाल अब आगे बढ़ने लगी थी. विरोध को आमजन का भी भरपूर साथ मिला. अब नया अपडेट ये है कि तीन गुना बढ़ोतरी को लेकर बढ़ती सार्वजनिक आलोचना के बीच राज्य सरकार राज्यपाल की मंजूरी के लिए लंबित इस विधेयक को वापस लेने पर विचार कर रही है. 18 दिसंबर को BJP विधायकों ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से इस फैसले पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया. 

संसदीय कार्य मंत्री मुकेश महालिंग ने पार्टी मुख्यालय में BJP विधायकों की बैठक के बाद कहा, “राज्य विधानसभा में हाल ही में विधायकों और अन्य के वेतन व भत्तों में वृद्धि से संबंधित पारित चार विधेयकों पर विस्तार से चर्चा हुई. जनभावनाओं का सम्मान करते हुए सभी BJP विधायकों ने मुख्यमंत्री को वेतन वृद्धि के फैसले की समीक्षा और पुनर्विचार के लिए एक ज्ञापन सौंपा है.” राज्य BJP सूत्रों के अनुसार, विधायकों से यह ज्ञापन देने को इसलिए कहा गया क्योंकि वेतन वृद्धि के समय और उसके पैमाने को लेकर जनता में नाराज़गी है. यह भी पता चला है कि BJP के केंद्रीय नेतृत्व ने इस कदम पर असंतोष जताया है. 

विधेयकों के प्रावधानों के अनुसार, विधायकों का मासिक वेतन और भत्ते 1 लाख रुपये से बढ़कर 3.45 लाख रुपये हो जाएंगे, जो देश में सबसे अधिक होंगे. इसी तरह मुख्यमंत्री, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, उपमुख्यमंत्री, मंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य सचेतकों का वेतन और भत्ते 3.50 लाख रुपये से 3.68 लाख रुपये प्रतिमाह के बीच होंगे. विधानसभा में यह विधेयक पेश करने वाले महालिंग ने पहले महंगाई दर का हवाला देते हुए विधायकों के वेतन में बढ़ोतरी को उचित ठहराया था. अधिकारियों के अनुसार, विधायकों और अन्य के वेतन व भत्तों में वृद्धि से राज्य के खजाने पर सालाना लगभग 45 से 50 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा. 

क्या तर्क दे रहे हैं विधायक 

BJP के एक विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “वेतन बढ़ाने से कोई समस्या नहीं थी. यह आखिरी बार साल 2018 में बढ़ा था. लेकिन महंगाई को देखते हुए इसे तीन गुना बढ़ा दिया गया. जबकि हमारी सरकार को अभी दो साल भी नहीं हुए हैं. इससे राज्यभर में सरकार और पार्टी की छवि खराब हुई. जनता के बीच गलत संदेश गया. सैलरी बढ़ने से खुश तो सभी थे लेकिन बदनामी केवल BJP की हुई.’’ 

वहीं पूरी कवायद का शुरूआती चरण से ही विरोध करनेवाले माकपा विधायक लक्ष्मण मुंडा कहते हैं, "यह हमारी पार्टी का स्टैंड था कि हम पहले आशा वर्कर, आंगनबाड़ी सेविका, शिक्षकों के वेतन वृद्धि पर बात करें. वृद्धावस्था पेंशन बढ़े, सरकार इसको लेकर पहल करे. बदले में सभी दलों के विधायकों ने खुद के वेतन को बढ़ा दिया. हालांकि मैं ये नहीं कहूंगा कि मेरे विरोध शुरू करने के बाद BJD या फिर बाद में BJP इसको लेकर पीछे हटी, बल्कि आम जनता का विरोध देखते हुए उन्हें पीछे हटना पड़ा. अभी ओडिशा में विधायकों का वेतन 1.17 लाख रुपए है. मैं इसमें से 25 हजार पार्टी फंड में देता हूं.’’ 

BJD नेता और विधायक गौतम बुद्ध दास इस मामले पर पार्टी का रुख बताते हैं, "इस प्रस्ताव पर सभी दलों के विधायकों की सहमति थी. लेकिन हमें ये नहीं मालूम था कि वेतन इतना ज्यादा बढ़ गया. ओडिशा जैसे राज्य के विधायकों का वेतन देशभर में सबसे ज्यादा होना, लोगों को खल गया और उनमें एक आक्रोश दिखने लगा. हालांकि मेरा अभी भी मानना है कि विधायकों का वेतन बढ़ना चाहिए. ज्यादा न सही, लेकिन थोड़ा बढ़ना चाहिए. सरकार ने अभी बिल को वापस नहीं लिया है, संशोधन के लिए विधायकों ने सीएम के पास अनुरोध पत्र भेजा है.’’ BJD विधायक के मुताबिक वर्तमान विधायकों से पहले पूर्व विधायकों की पेंशन तत्काल बढ़ना चाहिए क्योंकि कई लोग काफी वृद्ध हो चुके हैं, वे कुछ कर नहीं सकते और उनके मेडिकल खर्चे भी काफी ज्यादा हैं. 

वहीं कांग्रेस के विधायक रमेश चंद्र जेना कहते हैं, "सैलरी बढ़ाने की मांग सभी दलों के विधायकों ने की थी. यह कहना गलत होगा कि केवल BJP ने इस प्रस्ताव को पेश किया था. इसके पीछे मंशा ये थी कि विधायकों खासकर पूर्व विधायकों को इसकी सख्त जरूरत थी. एक बार राजनीति में आने के बाद वे कुछ और कर नहीं पाते. जहां तक इस मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी के स्टैंड की बात है तो हमारा कोई स्टैंड नहीं है. अगर वेतन बढ़ाया गया तो लेंगे, नहीं बढ़ाया गया तो नहीं लेंगे.” 

अन्य राज्यों में विधायकों को वेतन-भत्ता किस हिसाब से मिलता है
ओडिशा सहित अधिकांश राज्यों में मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष को विधायकों की तुलना में अधिक वेतन मिलता है. महंगाई को ध्यान में रखते हुए वेतन में समय-समय पर संशोधन किया जाता है, जिसके लिए राज्य के वेतन और भत्ता अधिनियम में बदलाव किए जाते हैं. मूल वेतन के अलावा विधायकों को अपने निर्वाचन क्षेत्र में किए जाने वाले कार्यों, सहायकों की नियुक्ति और टेलीफोन बिलों के लिए भत्ते भी मिलते हैं. इसके साथ ही विधायक कई सुविधाओं के भी हकदार होते हैं, जिनमें सरकारी आवास, देशभर में मुफ्त यात्रा, चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता और वाहन खरीदने के लिए ऋण शामिल हैं. 

झारखंड के विधायकों का वेतन 2.90 लाख रुपये प्रतिमाह तय किया गया है. इसके बाद तेलंगाना और मणिपुर का नंबर आता है, जहां विधायकों को 2.50 लाख रुपये प्रतिमाह वेतन मिलता है. पश्चिम बंगाल में 1.21 लाख रुपये का वेतन तय है. केवल आठ राज्य ऐसे हैं जहां विधायकों को 2 लाख रुपये से अधिक मासिक वेतन मिलता है. दूसरी ओर, पांच राज्यों में विधायकों का वेतन 1 लाख रुपये प्रतिमाह से भी कम है. केरल में देश का सबसे कम विधायक वेतन 70,000 रुपये है. हालांकि दिल्ली ने पिछले वर्ष विधायकों के वेतन में 67 फीसदी की बढ़ोतरी की थी, फिर भी कम वेतन देने वाले राज्यों में यह देश में चौथे स्थान पर है.  

देश की विधानसभाओं में विधायकों का औसत मासिक वेतन 1.5 लाख रुपये है. इसके मुकाबले सांसदों को प्रतिमाह औसतन 2.70 लाख रुपए वेतन-भत्ते के तौर पर मिलते हैं.

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