scorecardresearch

ओडिशा की जेलों का हाल : खुले में नहाने को मजबूर महिला कैदी, सोने के लिए 4 वर्गफुट से कम जगह!

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक ओडिशा की एक तिहाई जेलों में क्षमता से बहुत ज्यादा कैदी हैं और इनमें भी महिला कैदियों की हालत बहुत बुरी है

Prison
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 3 अप्रैल , 2026

ओडिशा की जेलों में अत्यधिक भीड़ होने की बात सामने आई है. इसके अलावा रहने की तंग स्थिति, नहाने की सुविधाओं की कमी, गार्डों की कमी और जरूरी सुरक्षा उपकरणों का अभाव भी प्रमुख समस्याओं के रूप में उभरा है. यह जानकारी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट में सामने आई है.

31 मार्च को ओडिशा विधानसभा में CAG की एक रिपोर्ट पेश की गई. इसके मुताबिक ओडिशा की 87 में से 31 जेलें अत्यधिक भीड़भाड़ वाली हैं. इसमें सबसे खराब स्थिति महिला कैदियों की है, जहां उन्हें खुले में स्नान करने पर मजबूर होना पड़ रहा है. जबकि ओडिशा मॉडल जेल मैनुअल के अनुसार, हर 10 कैदियों पर एक ढका हुआ स्नान कक्ष होना चाहिए और निजता सुनिश्चित करने के लिए उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

लेकिन CAG की जांच में पाया गया कि 2,203 वॉशरूम की आवश्यकता के मुकाबले केवल 916 ही उपलब्ध थे. यानी 58.4 प्रतिशत की भारी कमी है. कुछ जेलों में महिला कैदी खुले प्लेटफॉर्म (पिंडी) पर नहाने को मजबूर थीं. जेलों में पर्याप्त स्नान और शौचालय सुविधाओं की कमी के कारण कैदियों को स्वच्छ जीवन की बुनियादी जरूरतों से वंचित रहना पड़ रहा है.

राज्य की 15 जेलों के ऑडिट में 10 जेलों में स्नान स्थलों की भारी कमी सामने आई. उप-जेल अठगढ़ में 50 फीसदी से लेकर जिला जेल बालासोर में 90.57 फीसदी तक की कमी पाई गई. महिला कैदियों के लिए खुले में नहाने की व्यवस्था उनकी निजता को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती है. ये हालात तब हैं जब हालिया बजट सत्र में राज्य सरकार ने गृह विभाग के लिए वित्त वर्ष 2026-27 हेतु 10,786.69 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया है.

रिपोर्ट के अनुसार, एक शिफ्ट में जेलों की सुरक्षा के लिए 3,515 कर्मचारियों की जरूरत थी, लेकिन सरकार ने केवल 1,689 पद ही स्वीकृत किए. इनमें से भी केवल 1,282 गार्ड ही कार्यरत थे. इस प्रकार कुल 2,233 कर्मचारियों की कमी सामने आई है. इसका मतलब है कि लगभग 63.5 फीसदी पद खाली हैं. परिणाम यह हुआ कि गार्डों और सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण कैदियों के जेल से भागने की घटनाएं भी सामने आईं.

साल 2020-23 के दौरान ऐसी 29 घटनाएं हुईं, जिनमें से 17 कैदियों को दोबारा पकड़ लिया गया, जबकि 12 अब भी फरार हैं. इन घटनाओं के बावजूद विभाग ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए, जैसे जरूरी सुरक्षा स्टाफ की तैनाती या आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके.

सोने के लिए प्रति कैदी मात्र 0.34 वर्ग मीटर यानी 3.6 वर्ग फुट की जगह

CAG ऑडिट में कैदियों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं की भी कमी पाई गई. जैसे बिस्तरों और क्लिनिकल सुविधाओं का अभाव देखा गया. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे कैदियों को अलग संस्थानों में रखने के बजाय सामान्य कैदियों के साथ ही रखा जा रहा है. जांच के दौरान पाया गया कि 10 जेलों में 121 मानसिक रूप से बीमार कैदियों को सामान्य कैदियों के साथ रखा गया, जो एक गंभीर चिंता का विषय है.

रिपोर्ट के अनुसार, प्रति कैदी कम जगह उपलब्ध होने के कारण रहने की स्थिति बेहद तंग हो गई है. कैदियों को सोने और बुनियादी जीवन जीने के लिए निर्धारित मानकों के अनुसार पर्याप्त स्थान नहीं मिल पा रहा है. जेल मैनुअल के मुताबिक प्रत्येक कैदी के लिए सोने वाले बैरकों में कम से कम 3.71 वर्ग मीटर स्थान उपलब्ध कराना आवश्यक है.

लेकिन CAG ने अपने ऑडिट में पाया कि जेलों के बैरकों में निर्धारित मानकों की तुलना में प्रति कैदी स्थान की भारी कमी है. राजधानी भुवनेश्वर की स्पेशल जेल में प्रति कैदी मात्र 0.34 वर्ग मीटर जगह उपलब्ध थी. वहीं नयागढ़ की जेल में प्रति कैदी 1.61 वर्ग मीटर ही उपलब्ध था. चार जेलों में कैदियों की संख्या निर्धारित क्षमता से 40 फीसदी से अधिक थी, जिससे स्थिति और भी गंभीर दिखती है. इसके साथ ही 15 जेलों में से 4 में 71 शौचालयों की कमी पाई गई, जिसमें भुवनेश्वर की विशेष जेल में 25 फीसदी शौचालयों की कमी थी.

इसके अलावा, ऑडिट में यह भी पाया गया कि कई जरूरी सुरक्षा उपकरण या तो उपलब्ध नहीं हैं या काम नहीं कर रहे हैं. कुल 15 जेलों की जांच में चार जेलों में 'डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर' नहीं थे. सात बैगेज स्कैनरों में से केवल एक ही काम कर रहा था. कुछ जेलों में मोबाइल जैमर भी खराब स्थिति में पाए गए.

सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण कैदियों की जेल में प्रवेश के समय ठीक से जांच नहीं हो पाती, जिससे प्रतिबंधित सामान अंदर ले जाने का खतरा बना रहता है. रिपोर्ट के अनुसार, 2020-23 के बीच भुवनेश्वर की विशेष जेल में 46 तलाशी अभियानों के दौरान 74 मोबाइल फोन, 56 सिम कार्ड, एक पेन ड्राइव, 26 खाली शराब की बोतलें और 1.76 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया. इसके अलावा, रिपोर्ट में राज्य सरकार की आलोचना की गई है कि 9.22 करोड़ रुपए खर्च करने के बावजूद 'e-Prisons' पोर्टल को 'इंटर-ऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम' से नहीं जोड़ा गया.

इस पूरी स्थिति पर ओडिशा के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता विश्वप्रिय कानूनगो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट तक ने इस पर चिंता जाहिर की है. फिलहाल जो समस्याएं हैं, उनमें सबसे पहले महिलाओं की निजता का हनन न हो, इसका ध्यान रखा जाना चाहिए. इसके बाद मनोरोगियों को बेहतर इलाज मुहैया कराया जाना चाहिए, ताकि वे और अधिक बीमार होकर न निकलें. जेल सुधार गृह होता है, लेकिन ओडिशा में कैदियों को और अमानवीय बनाया जा रहा है."

वे आगे कहते हैं, "मैं सलाह देना चाहूंगा कि राज्य में अधिक से अधिक ओपन जेल खोली जाएं. राजस्थान इसका शानदार उदाहरण है. राजधानी भुवनेश्वर में एक ओपन जेल है, लेकिन उसका अभी तक इस्तेमाल शुरू नहीं हो सका है. जेल प्रशासन बहुत गलत तरीके से इसका संचालन कर रहा है, उनके काम में गंभीरता नहीं है."

Advertisement
Advertisement