बीते 21 मार्च को अंतरराष्ट्रीय वन दिवस के मौके पर सीएम मोहन माझी ने एक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए कहा था कि वन, जीवन और जीविका के आधार हैं. हमें ग्रीन कवर को बढ़ाना होगा और पर्यावरण व औद्योगिकीकरण के बीच संतुलन बनाना होगा. उन्होंने वनों के संरक्षण के लिए आम लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की बात भी कही थी.
ठीक तीन दिन बाद यानी 24 मार्च को राज्य के वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री गणेशराम सिंह खुंटिया ने विधानसभा के सत्र के दौरान बताया कि पिछले 10 वर्षों के दौरान ओडिशा में 176 खनन परियोजनाओं के लिए 14,433 हेक्टेयर (करीब 35 हजार एकड़) से अधिक वन भूमि का डायवर्जन किया गया है. यानी इतनी वन भूमि खनन के लिए दे दी गई है. यह इतनी जमीन है, जिसमें फीफा के मानक के अनुसार 20,200 से अधिक फुटबॉल मैदान बनाए जा सकते हैं.
कांग्रेस विधायक सोफिया फिरदौस के सवाल के जवाब में मंत्री ने बताया कि विभाग के राउरकेला सर्किल में सबसे अधिक 8,676 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन हुआ. जबकि अंगुल सर्किल में 3,794 हेक्टेयर वन भूमि को खनन के लिए उपयोग में लिया गया. इसके अलावा, पिछले एक दशक में कोरापुट सर्किल में 492 हेक्टेयर, बारिपदा सर्किल में 470 हेक्टेयर और संबलपुर सर्किल में 0.073 हेक्टेयर वन भूमि खनन परियोजनाओं के लिए डायवर्ट की गई.
इससे पहले 2 दिसंबर 2025 को वन मंत्री ने बताया था कि इन्हीं दस साल के दौरान विभिन्न परियोजनाओं के लिए 17 लाख से अधिक पेड़ काटे गए हैं. इसके अतिरिक्त छह साल पहले आए फेनी साइक्लोन की वजह से राजधानी भुवनेश्वर और उसके आसपास के इलाकों के 2 लाख से अधिक पुराने पेड़ों को भारी नुकसान पहुंचा था. यही नहीं, इसी शहर में विधायकों के लिए बनी कॉलोनी के निर्माण के दौरान भी 900 से अधिक पेड़ काटे गए.
दूसरी तरफ सरकार का यह भी कहना है कि इस दौरान 406.60 करोड़ रुपए की लागत से 1.76 करोड़ पौधे लगाए भी गए हैं, जिनका सर्वाइवल रेट लगभग 84 प्रतिशत है यानी हर सौ में 84 पौधे सूखे नहीं और उनमें बढोतरी हो रही है. लेकिन असल सवाल यह है कि जंगल काटने के मुकाबले सिर्फ पौधे लगाने के दावे से क्या संतुष्ट हुआ जा सकता है?
राज्य के प्रसिद्ध पर्यावरण एक्टिविस्ट प्रफुल्ल सामंत कहते हैं, "किसी इंसान को हार्ट अटैक आता है तो सुरक्षा के लिए स्टंट लगाया जाता है. यहां यही हो रहा है. जंगल काटकर पर्यावरण को हार्ट अटैक दिया जा रहा है और बदले में स्टंट की तरह पौधे लगाए जा रहे हैं. नेचुरल जंगल में सैकड़ों प्रकार के पेड़-पौधे होते हैं. उस पर पूरी जैव विविधता, जानवर, पक्षी, पानी, हवा, जड़ी-बूटी और फॉरेस्ट प्रोडक्ट निर्भर होते हैं. ये एक झटके में खत्म हो जाते हैं. इसकी जगह अक्सर वही पौधे लगाए जाते हैं जिनकी डिमांड बाजार में होती है. केवल कमर्शियल पौधे लगाकर किस तरह के नुकसान की भरपाई की जा रही है? यही नहीं, इन पौधों के जीवित रहने का दावा भी अक्सर सच नहीं होता."
वे आगे कहते हैं, "इस पूरी कवायद का सबसे बुरा प्रभाव यहां रह रहे आदिवासियों पर पड़ता है. पहले माइनिंग के लिए जमीन खोदी जाती है, जिससे आसपास के पानी के स्रोत सूख जाते हैं और पर्यावरण खत्म होता है. लोग पलायन करने को मजबूर होते हैं. माइनिंग को विकास से जोड़ा जाता है, लेकिन कभी इसका आर्थिक और सामाजिक आकलन नहीं किया जाता कि इस विनाश की असल कीमत क्या है. जब वे इसका सही आंकलन करेंगे, तो माइनिंग से होने वाली आमदनी बहुत पीछे रह जाएगी."
ओडिशा में इस वक्त कोरापुट जिले में अडाणी समूह और सुंदरगढ़ जिले में डालमिया सीमेंट के खिलाफ आंदोलन चल रहा है. यहां आदिवासी अपने जंगल बचाने के लिए व्यवस्था से लड़ रहे हैं. क्योंझर जिले में दस साल पहले हुए आंदोलन के बाद जिंदल कंपनी को माइनिंग से रोक दिया गया था. हाल ही में कंपनी के अधिकारियों की मुलाकात सीएम से हुई है, जिसके बाद लोगों को आशंका है कि यहां फिर से भूमि अधिग्रहण होगा और जंगल काटे जाएंगे. स्थानीय आदिवासी अभी-से आंदोलन के लिए तैयार हैं. यह सीएम मोहन माझी का विधानसभा क्षेत्र भी है.
जंगल के साथ जंगली जानवर भी निशाने पर
जंगल तो निशाने पर हैं ही, वहां रहने वाले जानवर भी सुरक्षित नहीं हैं. पिछले तीन सालों के दौरान ओडिशा में शिकारियों ने एक बाघ, 11 तेंदुए और 14 हाथियों सहित कुल 325 जंगली जानवरों का शिकार किया है. यह जानकारी भी वन मंत्री गणेशराम सिंह खुंटिया ने 24 मार्च को विधानसभा में दी. BJD विधायक रमेश चंद्र बेहेरा के प्रश्न के उत्तर में मंत्री ने बताया कि साल 2023-24 में 136, साल 2024-25 में 79 और साल 2025-26 में अब तक 110 जानवरों के शिकार की रिपोर्ट सामने आई है.
मारे गए जानवरों में 160 जंगली सूअर, 23 सांभर, 31 हिरण, एक भालू, एक किंग कोबरा, दो पैंगोलिन और 11 साही भी शामिल हैं. इस अवधि के दौरान वन अधिकारियों ने लकड़ी और अन्य वन उत्पादों की तस्करी से जुड़े 89,805 मामले दर्ज किए और 1,452 वाहनों को जब्त किया. उन्होंने बताया कि शिकार पर रोक लगाने के लिए एंटी-पोचिंग कैंप, पैदल गश्त, और जंगल की आग की चेतावनी के लिए तकनीक व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग जैसे कई कदम उठाए गए हैं.
खनिज संपदा से समृद्ध ओडिशा में विकास की दौड़ अब पर्यावरण पर भारी पड़ती दिख रही है. ये आंकड़े न सिर्फ जंगलों के तेजी से सिमटने की कहानी कहते हैं, बल्कि भविष्य के पर्यावरणीय संकट की चेतावनी भी देते हैं. राज्य में खनन आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने की नीति से राजस्व और रोजगार तो बढ़े हैं, लेकिन इसके समानांतर जैव विविधता और आदिवासी जीवन पर गहरा संकट मंडरा रहा है.

