आम आदमी के लिए अदालत के मायने क्या हैं, इसे ओडिशा के इस एक मामले से समझा जा सकता है. संबलपुर के कुचिंडा अनुविभागीय दंडाधिकारी न्यायालय यानी एसडीजेएम कोर्ट ने लगभग 20 साल बाद तीन लोगों को बरी कर दिया. इन लोगों पर महज 52 रुपए का गुटखा और सिगरेट चोरी करने का आरोप था.
यह मामला वर्ष 2006 का है. उस समय संबलपुर जिले के बामरा क्षेत्र के स्टेशन बस्ती में दिवंगत प्रफुल्ल साहू की पान दुकान से गुटखा पैकेट और सिगरेट चोरी होने की घटना सामने आई थी. इनकी कुल कीमत 52 रुपए बताई गई थी.
गोविंदपुर थाने में शिकायत दर्ज होने के बाद पुलिस ने नुनियामुंडा गांव के चार लोगों को चोरी के आरोप में गिरफ्तार किया था. वहीं, केचुपानी गांव के एक व्यक्ति को कथित तौर पर चोरी का सामान खरीदने के आरोप में पकड़ा गया था. बाद में सभी आरोपियों को जमानत मिल गई और वे नियमित रूप से अदालत की कार्यवाही में शामिल होते रहे.
हालांकि, अदालती कार्यवाही के दौरान मामला धीरे-धीरे ठंडा पड़ गया और अदालत के नोटिस भी कम आने लगे. लंबी कानूनी प्रक्रिया के दौरान दो आरोपियों और शिकायतकर्ता प्रफुल्ल साहू की मौत हो गई.
कुछ दिन पहले बाकी आरोपियों को अचानक अदालत की ओर से लंबित मामले में वारंट जारी होने की सूचना मिली. प्रक्रिया के तहत पुलिस ने नुनियामुंडा गांव के गणेश जयपुरिया और अमेश बंकारा को चोरी के आरोप में तथा केचुपानी गांव के हेमंत साहू को चोरी का सामान खरीदने के आरोप में गिरफ्तार कर कुचिंडा अदालत में पेश किया.
मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने आखिरकार तीनों आरोपियों को बरी कर दिया. इसके साथ ही महज 52 रुपए के सामान से जुड़े लगभग दो दशक पुराने मामले का अंत हो गया.
वकील मिनाकेतन मिश्रा बताते हैं, "वे 2006 से 2026 तक कानूनी लड़ाई लड़ते रहे. अब जाकर कुचिंडा एसडीजेएम कोर्ट ने तीनों को बरी कर दिया. कई बार चश्मदीद गवाह अदालत में पेश नहीं हुए, जिसकी वजह से मामले में देरी हुई."
बरी किए गए लोगों में से एक हेमंत कुमार साहू ने कहा, "हमें अदालत में पेश किया गया था और 29 दिनों तक जेल में रखा गया. बाद में हमें जमानत मिल गई. अब 20 साल बाद आखिरकार अदालत ने फैसला सुनाया."
ओडिशा के कोर्ट में 18 लाख से अधिक मामले पेंडिंग
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मुताबिक ओडिशा की अलग-अलग अदालतों में एक साल से अधिक पुराने कुल 18,35,576 मामले पेंडिंग हैं. इसमें क्रिमिनल केस की संख्या 15,67,708 है, जबकि सिविल केस की संख्या 2,67,868 है.
अगर दस साल से अधिक पुराने मामलों को देखें तो 2,48,700 क्रिमिनल केस पेंडिंग हैं जबकि सिविल के कुल 31,006 मामले लंबित हैं. वहीं इसी डेटा ग्रिड के मुताबिक देशभर में इस वक्त कुल 4,90,02,891 मामले लंबित हैं. इसमें एक साल से अधिक पुराने 3,32,98,753 केस शामिल हैं जो कुल मामलों का 67.95 प्रतिशत है. इनमें क्रिमिनल केस की संख्या 3,78,46,489 है, जबकि सिविल के कुल 1,11,56,402 केस चल रहे हैं.
पेंडिंग केस के निपटारे को लेकर बीते 19 मई को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने छत्तीसगढ़ में हुए मध्य क्षेत्रीय परिषद की बैठक में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए. शाह ने कहा, "सरकार का लक्ष्य 2029 से पहले हर आपराधिक मामले का निपटारा सुनिश्चित करना होना चाहिए. इसमें सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वाले मामले भी शामिल हैं और यह काम तीन साल के भीतर होना चाहिए."
अमित शाह ने कहा कि हाई कोर्ट को उन मामलों के तेज निपटारे के लिए विशेष अदालतें बनानी चाहिए जो पांच साल से ज्यादा समय से लंबित हैं. उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन को गंभीर अपराधों से निपटने में गंभीरता दिखानी चाहिए.
वहीं, 11 मई को सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के हाई कोर्ट में लंबित जमानत याचिकाओं के शीघ्र निपटारे के लिए कई उपाय सुझाए थे. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जॉयमाल्या बागची की अध्यक्षता वाली पीठ ने अग्रिम जमानत और नियमित जमानत याचिकाओं की समय पर सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता पर जोर दिया. साथ ही पीठ ने पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण बताया.
सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि जमानत याचिकाओं की स्वतः लिस्टिंग हो. उनके निपटारे के लिए एक निश्चित समय-सीमा तय की जाए. ऐसी याचिकाओं को अदालत की कार्यसूची में प्राथमिकता दी जाए.
अदालत ने यह भी सिफारिश की कि देरी से बचने के लिए सॉफ्टवेयर आधारित प्रणाली के माध्यम से जमानत याचिकाओं को हर सप्ताह या पखवाड़े में सूचीबद्ध किया जाए. अदालत ने कहा कि जमानत याचिकाओं की लंबित संख्या विशेष रूप से इलाहाबाद हाई कोर्ट में बहुत अधिक है और वहां सुनवाई के लिए एक निश्चित तंत्र की आवश्यकता है. इसी तरह की चिंता पटना हाई कोर्ट में देरी को लेकर भी जताई गई.
पीठ ने कहा कि सरकारी वकीलों को अनावश्यक स्थगन से बचना चाहिए. अदालतों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के अपने दायित्व को याद रखना चाहिए. इससे पहले 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एमएम सुंदरेशन ने कहा था कि देशभर में 4.81 करोड़ मामले लंबित हैं. इनमें से 4.18 करोड़ मामले जिला अदालतों में लंबित हैं.
इन 4.18 करोड़ मामलों में 3.50 करोड़ आपराधिक मामले हैं. इनमें से लगभग 2.50 करोड़ मामले सात साल की सजा से जुड़े अपराधों के हैं. उन्होंने बताया कि हाल ही में लागू हुए BNSS की धारा 360 के तहत शिकायतकर्ता की सहमति से मामलों को वापस लिया जा सकता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि मामलों का जल्द निपटारा होना चाहिए.

