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टीएमसी को फायदा पहुंचाने वाली सीपीआई (एम) की रणनीति क्या अब बीजेपी को मजबूत करेगी?

करीब पांच लाख ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द करने का कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण के लोकसभा चुनाव से पहले टीएमसी और बीजेपी के लिए एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन गया है

ओबीसी आरक्षण के फैसले पर अमित शाह और ममता बनर्जी के बीच हुई तीखी बयानबाजी
ओबीसी आरक्षण के फैसले पर अमित शाह और ममता बनर्जी के बीच हुई तीखी बयानबाजी
अपडेटेड 29 मई , 2024

कलकत्ता हाई कोर्ट की एक बेंच ने 22 मई को अपने एक फैसले में कहा कि पश्चिम बंगाल के जिन 77 वर्गों को 2010 और 2012 में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल किया गया था, उन्हें अब आरक्षण का फायदा नौकरियों समेत कहीं नहीं मिलेगा. इस एक फैसले से करीब पांच लाख जाति प्रमाण-पत्रों की वैधता हाई कोर्ट ने खारिज कर दी. 

जाहिर है इस फैसले का लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम चरणों के मतदान पर असर पड़ेगा. राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जहां इसे 'भगवा साजिश' बताया है तो वहीं भाजपा इसे ममता की कथित तुष्टिकरण की राजनीति पर चोट बता रही हैं. मगर सवाल यह है कि आखिर हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों किया?

2010 में 42 वर्गों को ओबीसी के रूप में मान्यता दी गई थी, जिनमें से 41 मुस्लिम थे. वहीं 2012 में मान्यता प्राप्त 35 वर्गों में से भी 30 मुस्लिम समुदाय से थे. यह विवाद का केंद्र इसलिए भी बना क्योंकि 2010 तक ओबीसी के मान्यता प्राप्त 66 वर्गों में से केवल 12 ही मुस्लिम थे. इस मामले की सुनवाई 2010 से ही कलकत्ता हाई कोर्ट में हो रही थी. जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की बेंच ने अपने 211 पन्नों के फैसले में कहा कि इन वर्गों को ओबीसी मान्यता 'राजनीतिक उद्देश्यों' को पूरा करने के लिए दी गई थी.

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, बंगाल सरकार ने 2010 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से पिछड़े वर्गों में 'अधिक पिछड़े' की पहचान करने के लिए एक सर्वे करने को कहा था. उसी साल 15 सितंबर को विश्वविद्यालय ने एक प्रारंभिक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की. लेकिन अंतिम रिपोर्ट का इंतजार किए बिना, राज्य सरकार ने ओबीसी कोटा 7 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत करने का निर्णय लिया. 24 सितंबर को राज्य ने दो श्रेणियां बनाईं - एक 10 प्रतिशत आरक्षण के साथ और दूसरी 7 प्रतिशत आरक्षण के साथ. 

बेंच ने पश्चिम बंगाल पिछड़ा वर्ग (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा) (सेवाओं और पदों में रिक्तियों का आरक्षण) अधिनियम, 2012 के कई हिस्सों को रद्द कर दिया. इस कानून के रद्द किए गए हिस्सों में धारा 16, धारा 2(एच) का दूसरा भाग, और अधिनियम की धारा 5(ए) शामिल थीं, जो उप-वर्गीकृत श्रेणियों में 10% और 7% आरक्षण देने की बात करती थीं. इसके अलावा उप-वर्गीकृत श्रेणियों - ओबीसी-ए और ओबीसी-बी - को अधिनियम की पहली पहली अनुसूची से हटा दिया गया.

अदालत ने कहा, "ऊपर दिए गए वर्गों के नागरिक (जिन्हें ओबीसी से बाहर किया गया), जो पहले से ही राज्य की सेवा में हैं, या पहले से ही आरक्षण का लाभ उठा चुके हैं या किसी राज्य के चयन प्रक्रिया में सफल हुए हैं, वे इस फैसले के कारण प्रभावित नहीं होंगे."

नाम न बताने की शर्त पर एक राजनीतिक विश्लेषक ने इंडिया टुडे को बताया, "2009 के आम चुनावों के बाद, सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम मोर्चे को एहसास हुआ कि मुस्लिम समुदाय दूर जा रहा है. तब से सीपीआई (एम) ने आंतरिक रूप से कई चर्चाएं कीं और यह निर्णय लिया गया कि मुसलमानों को आरक्षण दिया जाए. हालांकि, इससे पार्टी को चुनावी फायदा नहीं हुआ क्योंकि टीएमसी ने 2011 में सत्ता संभाली, पार्टी ने इस प्रथा को जारी रखा और मुसलमानों के समर्थन को मजबूत किया."

पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कहा है कि वे कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले को स्वीकार नहीं करतीं. उन्होंने एक चुनावी रैली में कहा, "जब 26,000 लोगों (स्कूल शिक्षण/गैर-शिक्षण कर्मचारियों) ने भाजपा के कारण अपनी नौकरियां खो दीं, तो मैंने कहा था कि मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगी. उसी की तरह मैं आज भी कहती हूं कि भाजपा की ओर से निर्देशित इस आदेश को मैं स्वीकार नहीं करती हूं. ओबीसी आरक्षण जारी रहेगा.''

बंगाल सीएम की ओर से कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को 'भाजपा निर्देशित' कहे जाने के अलावा टीएमसी नेता साकेत गोखले ने भी फैसला देने वाले एक जज पर निशाना साधा. उन्होंने ट्वीट किया, "कलकत्ता उच्च न्यायालय की ओर से आज के ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द करने के फैसले के बारे में बहुत दिलचस्प तथ्य...जिस न्यायाधीश ने आज फैसला सुनाया, वे वही न्यायाधीश हैं जिन्होंने भाजपा के सुवेंदु अधिकारी को आपराधिक मामलों में छूट दी थी."

कलकत्ता हाई कोर्ट के इस फैसले के दो दिन पहले 20 मई को कलकत्ता हाई कोर्ट के ही एक जज जस्टिस चित्तरंजन दास ने अपनी रिटायरमेंट स्पीच में कहा था कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सदस्य थे और संगठन में वापस जाने के लिए तैयार हैं. 

भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के दबाव की ओर इशारा करते हुए, ममता बनर्जी ने आरोप लगाते हुए कहा, "पिछले कुछ दिनों से, प्रधानमंत्री दावा कर रहे हैं कि अल्पसंख्यक तपशिली समुदायों का आरक्षण छीन लेंगे. यह कैसे हो सकता हे? तपशिली या आदिवासी आरक्षण को अल्पसंख्यक कभी छू नहीं सकते. लेकिन ये शरारती लोग (बीजेपी) अपना काम कुछ संस्थाओं के जरिए कराते हैं."

22 मई को बंगाल में चुनाव प्रचार कर रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा था, "ममता बनर्जी ने पिछड़ेपन के किसी भी सर्वेक्षण के बिना मुस्लिम वर्गों को आरक्षण दिया था. वे अपने वोट बैंक के लिए पिछड़े वर्ग के आरक्षण को लूटकर मुसलमानों को देना चाहती हैं."

केंद्रीय गृह मंत्री ने आगे कहा, "क्या कोई संवैधानिक प्रमुख कह सकता है कि वह उच्च न्यायालय के आदेश को स्वीकार नहीं करता? बंगाल में यह कैसा लोकतंत्र है? पूरा इंडिया गुट यही कर रहा है. कांग्रेस ने तेलंगाना और कर्नाटक में ऐसा किया है. भाजपा इसके खिलाफ है क्योंकि संविधान धर्म के आधार पर किसी भी आरक्षण की अनुमति नहीं देता."

लोकसभा चुनाव प्रचार में सांप्रदायिक बयान इतने बढ़ चुके हैं कि चुनाव आयोग को कहना पड़ गया, "राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों, विशेषकर स्टार प्रचारकों के आचरण की प्राथमिक जिम्मेदारी लेनी होगी. उच्च पदों पर बैठे लोगों के प्रचार भाषणों के अधिक गंभीर परिणाम होते हैं." इसके अलावा चुनाव आयोग ने सत्तारूढ़ बीजेपी से भी समाज को बांटने वाले भाषण नहीं देने की बात कही है. अब बंगाल में ओबीसी पर उच्च न्यायालय के इस फैसले का लोकसभा 2024 के आखिरी चरणों में मतदान पर असर होने की पूरी संभावना नजर आ रही है.

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