उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में एक बड़ा और दूरगामी बदलाव करते हुए योगी आदित्यनाथ सरकार ने 30 जनवरी को उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा (सातवां संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित कर दिया. इस संशोधन के तहत PCS-J (प्रांतीय सिविल सेवा–न्यायिक) भर्ती के लिए अब विज्ञापन की तिथि तक कम से कम तीन वर्ष की कानूनी प्रैक्टिस अनिवार्य कर दी गई है.
इसके साथ ही नियुक्ति के बाद नियमित अदालती कार्य शुरू करने से पहले एक साल का अनिवार्य न्यायिक प्रशिक्षण, और सिविल जज (जूनियर डिवीजन) से सीनियर डिवीजन में प्रमोशन के नियमों में भी अहम बदलाव किए गए हैं. सरकार का दावा है कि ये संशोधन सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुरूप हैं और इससे न्यायिक सेवा की गुणवत्ता, दक्षता और विश्वसनीयता मजबूत होगी.
यह संशोधन ऐसे समय में आया है जब लंबे समय से यह बहस चल रही थी कि क्या सीधे लॉ ग्रेजुएट्स को सिविल जज जैसे संवेदनशील पद पर नियुक्त करना व्यवहारिक है. अब तक की व्यवस्था में केवल एलएलबी डिग्री होना PCS-J परीक्षा में बैठने के लिए पर्याप्त था. हर साल बड़ी संख्या में ताजा कानून स्नातक सीधे न्यायिक सेवा की परीक्षा में शामिल होते थे, जिनमें से कई को अदालती प्रक्रिया, वकालत की व्यावहारिक बारीकियों और मुकदमों के वास्तविक संचालन का सीमित अनुभव होता था. सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में इस पर चिंता जताते हुए स्पष्ट किया था कि कम से कम तीन साल की प्रैक्टिस न्यायिक क्षमता और जिम्मेदारियों के लिए आवश्यक है. इसी के तहत सभी उच्च न्यायालयों और राज्य सरकारों को अपने नियमों में बदलाव के निर्देश दिए गए थे.
प्रदेश सरकार के प्रधान सचिव (नियुक्ति और कार्मिक) एम देवराज द्वारा 30 जनवरी को जारी अधिसूचना के अनुसार, यूपी न्यायिक सेवा नियम 2001 में यह संशोधन इलाहाबाद हाई कोर्ट और यूपी लोक सेवा आयोग से परामर्श के बाद किया गया है और इसे तुरंत प्रभाव से लागू कर दिया गया है. नए नियमों के मुताबिक, न्यायिक सेवा के इच्छुक उम्मीदवार को भारतीय नागरिक होना चाहिए, उत्तर प्रदेश या देश के किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से बैचलर ऑफ लॉ की डिग्री होनी चाहिए और वह एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत नामांकित वकील होना चाहिए. कानूनी प्रैक्टिस की गणना संबंधित राज्य बार काउंसिल में अनंतिम नामांकन या पंजीकरण की तारीख से होगी; इसके प्रमाण के लिए उम्मीदवार को बार द्वारा जारी कानूनी प्रैक्टिस सर्टिफिकेट भी प्रस्तुत करना होगा.
इसके अलावा, देवनागरी लिपि में हिंदी का ज्ञान अनिवार्य रखा गया है, जो पहले भी नियमों का हिस्सा था. नियुक्ति के बाद सिविल जज (जूनियर डिवीजन) को नियमित अदालती ड्यूटी शुरू करने से पहले न्यायिक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान, लखनऊ या अदालत द्वारा अधिसूचित किसी अन्य स्थान पर कम से कम एक साल का प्रशिक्षण लेना होगा. जरूरत पड़ने पर इस अवधि को बढ़ाया भी जा सकता है. सरकार का मानना है कि यह प्रशिक्षण न्यायाधीशों को व्यावहारिक रूप से अधिक सक्षम बनाएगा और फैसलों की गुणवत्ता में सुधार लाएगा.
पदोन्नति से जुड़े नियमों में भी बदलाव किए गए हैं. अब सिविल जज (जूनियर डिवीजन) को सीनियर डिवीजन में प्रमोशन के लिए कम से कम पांच साल की संतोषजनक सेवा पूरी करनी होगी. प्रमोशन की प्रक्रिया मेरिट-कम-सीनियरिटी के आधार पर होगी और इसके लिए हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस तीन मौजूदा जजों की एक चयन समिति गठित करेंगे. चयन समिति प्रमोशन के लिए योग्य अधिकारियों के रिकॉर्ड की जांच करेगी और रिक्तियों के बराबर नामों की सूची तैयार करेगी. साथ ही सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के कैडर में दस प्रतिशत पद सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा के जरिए भरे जाएंगे, जिसके लिए कम से कम तीन साल की लगातार संतोषजनक सेवा जरूरी होगी.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव न्यायिक प्रणाली के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार है. इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक वरिष्ठ अधिवक्ता कहते हैं, “सिविल जज का पद केवल कानून की किताबें जानने का नहीं, बल्कि अदालत के माहौल, वकीलों की दलीलों, साक्ष्यों की बारीकियों और मुकदमेबाजी की वास्तविकताओं को समझने का भी है. तीन साल की प्रैक्टिस से उम्मीदवारों में परिपक्वता आएगी और वे बेहतर तरीके से न्यायिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर पाएंगे.”
हालांकि इस फैसले को लेकर युवा कानून छात्रों और हाल ही में एलएलबी करने वालों में निराशा भी है. कई अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्होंने PCS-J की तैयारी लॉ कॉलेज के शुरुआती वर्षों से शुरू कर दी थी और अब अचानक नियम बदलने से उनके करियर प्लान पर असर पड़ेगा. लखनऊ के एक लॉ छात्र ने कहा, “हमने इसी सोच के साथ पढ़ाई की थी कि डिग्री मिलते ही परीक्षा में बैठ सकेंगे. अब तीन साल की प्रैक्टिस करनी होगी, जिससे तैयारी और नौकरी के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा.” हालांकि कुछ छात्र इसे सकारात्मक कदम भी मान रहे हैं और कहते हैं कि प्रैक्टिस का अनुभव लंबे समय में ही उनके लिए फायदेमंद साबित होगा.
बार काउंसिल से जुड़े पदाधिकारियों का भी मानना है कि यह संशोधन वकालत पेशे को मजबूती देगा. उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के एक सदस्य के अनुसार, “पिछले कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में लॉ ग्रेजुएट सीधे न्यायिक सेवा की तैयारी में लग जाते थे, जिससे बार में नए और प्रतिबद्ध वकीलों की कमी महसूस की जा रही थी. अब कम से कम तीन साल तक युवा वकील अदालतों में काम करेंगे, जिससे वकालत और न्यायपालिका के बीच बेहतर तालमेल बनेगा.”
सरकार का तर्क है कि इन बदलावों से भर्ती, प्रशिक्षण और पदोन्नति की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और मजबूत होगी. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में 29 जनवरी को हुई कैबिनेट बैठक में इस संशोधन को स्वीकृति दी गई थी. सरकार के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुपालन के साथ-साथ यह कदम न्यायिक फैसलों की गुणवत्ता सुधारने और जनता का न्यायपालिका पर भरोसा बढ़ाने की दिशा में है.
इस बीच, UP PCS-J 2026 की भर्ती को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं. रुझानों के मुताबिक, इस बार रिक्तियों की संख्या 250 से 400 के बीच हो सकती है, हालांकि आधिकारिक आंकड़ा अभी जारी नहीं हुआ है. विस्तृत अधिसूचना 2026 की शुरुआत में आने की उम्मीद है. चयन प्रक्रिया पहले की तरह तीन चरणों में होगी- प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार. सफल उम्मीदवारों को उत्तर प्रदेश के जिला न्यायालयों में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में नियुक्त किया जाएगा, जहां वे दीवानी और आपराधिक मामलों की सुनवाई करेंगे.
कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा (सातवां संशोधन) नियम, 2026 को न्यायिक सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम माना जा रहा है. जहां एक ओर यह बदलाव युवा अभ्यर्थियों के लिए चुनौती लेकर आया है, वहीं दूसरी ओर इससे न्यायिक अधिकारियों की व्यावहारिक समझ, प्रशिक्षण और पेशेवर दक्षता बढ़ने की उम्मीद है.

