
10 मार्च 2026 को सीएम नीतीश कुमार ने सुपौल से 'समृद्धि यात्रा' के तीसरे चरण की शुरुआत की. 14 मार्च तक वे कोसी और सीमांचल क्षेत्र के 10 जिलों का दौरा करेंगे.
दूसरी तरफ, उनके बेटे निशांत कुमार अपनी पहली राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले हैं. एक साथ पिता-पुत्र की इन दो यात्राओं से बिहार में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है.
कुछ लोग इसे नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन की उपलब्धियों और विरासत को जनता के सामने रखने की आखिरी कोशिश बता रहे हैं. निशांत की बात करें, तो यह पहली बार नहीं है जब किसी सियासी परिवार का बेटा राजनीति में प्रवेश के बाद यात्रा पर निकला हो.
देश की राजनीति में यात्राएं हमेशा से जनसमर्थन हासिल करने का अचूक मंत्र रही हैं. जगनमोहन रेड्डी इसका सबसे सटीक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने पिता वाई.एस. राजशेखर रेड्डी के निधन के कुछ साल बाद पूरे आंध्र प्रदेश में पदयात्रा की और राज्य के सबसे लोकप्रिय नेता बनकर उभरे. लेकिन, क्या निशांत कुमार को भी इन यात्राओं से जगनमोहन जैसी सफलता मिलेगी? इस सवाल का जवाब जानने से पहले, देश की सियासत में बड़ा उलटफेर करने वाली तीन प्रमुख सियासी यात्राओं के बारे में जानते हैं.
जगनमोहन रेड्डी: पिता की मौत के बाद यात्राओं के जरिए सत्ता में वापसी की
वाई.एस. राजशेखर रेड्डी, जिन्हें YSR के नाम से भी जाना जाता है, आंध्र प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता थे. वे 2004 में राज्य के मुख्यमंत्री बने थे. 2 सितंबर 2009 को एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनका निधन हो गया. इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने उनके बेटे जगनमोहन को मुख्यमंत्री बनाने से इनकार कर दिया था.
जगनमोहन को कांग्रेस का यह फैसला रास नहीं आया और उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने की ठानी. उन्होंने वाईएसआर कांग्रेस बनाई, लेकिन तब भी जनता के बीच उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता को लेकर सवाल उठ रहे थे.

ऐसे में साल 2017 में जगनमोहन ने सियासी यात्रा के जरिए इसका जवाब देने का फैसला किया. इस यात्रा के दौरान उन्होंने आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले से श्रीकाकुलम तक 430 दिनों में 13 जिलों के 125 विधानसभा क्षेत्रों से गुजरते हुए करीब 3648 किलोमीटर की दूरी तय की. इस 'प्रजा संकल्प यात्रा' के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 में से 22 सीटों पर वाईएसआर कांग्रेस को जीत मिली. वहीं, विधानसभा की 175 में से 152 सीटें जीतकर उन्होंने राज्य में सरकार बनाई.
एनटी रामा राव : 1982 का चैतन्य रथम यात्रा से राजनीतिक शुरुआत
29 मार्च 1982 को आंध्र प्रदेश में तेलुगू देशम पार्टी (TDP) बनाने के बाद एनटी रामा राव ने 'चैतन्य रथम यात्रा' की शुरुआत की. उन्होंने हैदराबाद से शुरू कर इस यात्रा के जरिए पूरे राज्य का भ्रमण किया और करीब 75,000 किलोमीटर की दूरी तय की.
एक तरह से इस यात्रा के जरिए ही तेलुगू सुपरस्टार एनटी रामा राव ने खुद को राजनीति में लॉन्च किया था. जिस पुरानी 'शेवरले' गाड़ी पर बैठकर उन्होंने यह यात्रा की, वह बाद में एक रोल मॉडल बन गई. उन्होंने यात्रा के दौरान चार बार पूरे राज्य का चक्कर लगाया था.

1972 से 1982 के बीच राज्य में दो विधानसभा चुनाव हुए और पांच बार मुख्यमंत्री बदले गए, जिसके कारण जनता एक मजबूत और स्थिर सरकार चाहती थी. यही वजह थी कि यात्रा खत्म होने के तुरंत बाद उनकी पार्टी सत्ता में आ गई. रामा राव को इस यात्रा से इतना जनसमर्थन मिला कि जनवरी 1983 में हुए चुनाव में उनकी पार्टी ने 294 में से रिकॉर्ड 199 सीटों पर जीत दर्ज की.
चंद्रशेखर: कांग्रेस की लहर में राजनीतिक हैसियत मजबूत करने की कोशिश
आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस को सिर्फ 154 और जनता पार्टी को 295 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन दो साल बाद ही जनता पार्टी टूट गई. इसके एक गुट का नेतृत्व चंद्रशेखर कर रहे थे, जबकि दूसरे हिस्से 'जनता पार्टी सेक्यूलर' की कमान चौधरी चरण सिंह के हाथ में थी.
साल 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 531 में से 353 सीटें जीतकर वापसी की, जबकि जनता पार्टी को सिर्फ 31 सीटें मिलीं. जनसमर्थन दोबारा हासिल करने के लिए 6 जनवरी 1983 को चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से दिल्ली तक 4000 किलोमीटर की पदयात्रा शुरू की. उस समय चंद्रशेखर के सामने 'इंदिरा लहर' के बीच अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की बड़ी चुनौती थी.
उन्होंने देश को करीब से समझने के लिए यह यात्रा की थी. जिस दिन उन्होंने कर्नाटक से इस यात्रा की शुरुआत की, उसी दिन उनकी पार्टी ने राज्य में सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की थी. इस छह महीने की यात्रा ने उन्हें राजनीतिक तौर पर मजबूती से स्थापित किया और इसके करीब सात साल बाद वे देश के प्रधानमंत्री बने.
बिहार में हो रही इन दो यात्राओं से क्या निशांत का राजनीतिक कद बढ़ेगा?
राजनीतिक विशेषज्ञ अमिताभ तिवारी के मुताबिक, बिहार की ये दो यात्राएं अलग-अलग उद्देश्यों से हो रही हैं. नीतीश कुमार 'समृद्धि यात्रा' के जरिए अपनी सरकार के कामकाज को जनता तक पहुंचाएंगे और प्रशासनिक कार्यों पर फीडबैक लेंगे. वहीं, निशांत कुमार जनता के बीच जाकर खुद का परिचय स्थापित करने की कोशिश करेंगे.
उन्होंने आगे कहा कि निशांत अपनी पार्टी JDU के कार्यकर्ताओं और जनता को यह भरोसा दिलाने का प्रयास करेंगे कि वे अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं. चूंकि यह उनकी पहली राजनीतिक यात्रा है, इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि वे इसमें कितने सफल रहते हैं.
अमिताभ तिवारी, निशांत की यात्रा को जगनमोहन या एनटी रामा राव की यात्रा से अलग मानते हैं. उनका तर्क है कि उन दोनों नेताओं ने अपने दम पर नई पार्टियां खड़ी की थीं, जबकि निशांत अपने पिता की राजनीतिक विरासत और बनी-बनाई पार्टी को आगे ले जाने की कोशिश कर रहे हैं. वे मुख्य रूप से जनता से जुड़ने और राज्य की राजनीति को समझने के लिए यह यात्रा कर रहे हैं.
हालांकि, कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नीतीश की 'समृद्धि यात्रा' के साथ निशांत की यात्रा का चलना इसे और प्रभावशाली बनाता है, क्योंकि यह पिता-पुत्र की जोड़ी को सत्ता और विरासत के हस्तांतरण के रूप में पेश करता है.

