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लालू, रामविलास सबने बेटे को सौंपी विरासत, लेकिन निशांत की पॉलिटिकल एंट्री इनसे अलग क्यों?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद उनके बेटे निशांत कुमार की राजनीतिक एंट्री तय मानी जा रही है

नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत को मिठाई खिलाते हुए (फाइल फोटो)
नीतीश कुमार अपने बेटे निशांत को मिठाई खिलाते हुए (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 मार्च , 2026

"परिवारवाद एक ऐसी बीमारी है, जो देश के युवाओं को आगे बढ़ने से रोकती है." 24 जनवरी 2024 को CM नीतीश कुमार ने जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में यह बात कही थी. इसके ठीक चार दिन बाद बिहार के मुख्यमंत्री ने परिवारवाद का आरोप लगाकार RJD से गठबंधन तोड़ BJP के साथ नई सरकार बनाई.

करीब दो साल बाद 5 मार्च को नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए नामांकन भरने के बाद एक बार फिर नई सरकार की चर्चा तेज हो गई है. राज्य में पहली बार BJP के सीएम बनने की बात कही जा रही है. हालांकि, इससे ज्यादा चर्चा नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री को लेकर है.
 
लालू यादव, रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी जैसे बिहार के तमाम बड़े नेताओं ने अपने बेटे को राजनीतिक विरासत सौंपी है. ऐसे में जानते हैं कि आखिर निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री पर लोग क्यों चौंके हुए हैं.

परिवारवाद के खिलाफ रहे नीतीश आखिरकार अपने बेटे को राजनीति में लाने को क्यों हुए मजबूर?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट और 'वोट वाइब' के फाउंडर अमिताभ तिवारी के मुताबिक, जनता दल यूनाइटेड (JDU) में नीतीश कुमार के बराबर के कद का कोई बड़ा नेता नहीं है. आमतौर पर जब क्षेत्रीय पार्टियों में दो नंबर पर कोई बड़ा चेहरा नहीं हो, तो नेता के कमजोर पड़ने के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए उनके बेटे-बेटी को ही आगे किया जाता है. ऐसा नहीं होने पर पार्टी में टूट हो जाती है.

इसका उदाहरण तमिलनाडु की राजनीति में देखने को मिलता है. जयललिता की मौत के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए नेताओं के बीच गुटबाजी बढ़ने से AIADMK पार्टी कई हिस्से में टूट गई. बाकी सभी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों का इतिहास देखने पर पता चलता है कि प्रमुख नेताओं के निधन या कमजोर पड़ने पर उस पार्टी को उनके करीबी परिवार के लोगों ने ही आगे बढ़ाया.

अमिताभ के मुताबिक नीतीश कुमार के कमजोर पड़ने पर निशांत को राजनीति में लाने की एक मजबूरी यह भी है. अगर नीतीश कुमार अपने किसी दूसरे करीबी नेता जैसे ललन सिंह, विजय चौधरी, अशोक चौधरी या संजय झा का नाम आगे बढ़ाते तो संभव है, दूसरे नेता इसका विरोध करते और पार्टी टूट जाती. जबकि निशांत का नाम आगे आने पर पार्टी के चाहे कितने भी ताकतवर नेता हों, हर कोई उन्हें आसानी से अपना नेता मान लेगा. इस तरह बिना किसी उथल-पुथल के पार्टी को नेता मिल जाएगा.

इसके अलावा, नीतीश की पार्टी का EBC, गैर-यादव OBC के साथ-साथ लव-कुश (कुर्मी-कोइरी), महादलित (SC) मुख्य वोट बैंक है. 2022 के बिहार जाति-आधारित सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) की आबादी 36.01 फीसद है, जो राज्य में सबसे बड़ा सामाजिक समूह है. इस समुदाय को साधने के लिए नीतीश के पास अपने बेटे निशांत को आगे बढ़ाने के अलावा कोई मजबूत विकल्प भी नहीं था.

संभव है कि नीतीश कुमार और उनकी पार्टी JDU के तमाम बड़े नेता भी इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर निशांत का नाम आगे कर रहे हैं.

नीतीश के बेटे निशांत की राजनीति में एंट्री पर इतना हंगामा या चर्चा क्यों?

निशांत कुमार अपने पिता CM नीतीश कुमार के इकलौते बेटे हैं. उन्होंने भी अपने पिता की तरह इंजीनियरिंग की डिग्री ली है. उनकी स्कूली शिक्षा पटना और फिर मसूरी में हुई है. बाद में उन्होंने रांची से अपनी इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

निशांत की उम्र इस वक्त करीब 50 साल है. वहीं नीतीश कुमार पिछले 20 साल से बिहार के मुख्यमंत्री हैं. इन दो दशकों में कभी भी निशांत को अपने पिता की सियासी जिंदगी में दखल देते या उसमें शामिल होते हुए नहीं देखा गया. अब तक वे एक बेहद लो प्रोफाइल व्यक्ति के तौर पर अपनी जिंदगी जीते रहे हैं. राजनीति में एंट्री के सवाल पर अक्सर निशांत चुप हो जाते हैं या टाल-मटोल करते रहे हैं.

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी का कहना है कि इस वक्त निशांत कुमार के राजनीति में एंट्री और डिप्टी सीएम बनाने की बात पर इतनी चर्चा और हंगामा होने की तीन मुख्य वजह हो सकती हैं-

1. निशांत की पॉलिटिकल एंट्री की टाइमिंग: लालू यादव, रामविलास पासवान, शिबू सोरेन, जीतन राम मांझी जैसे तमाम बड़े क्षेत्रीय नेताओं का उदाहरण लीजिए. इन सभी ने स्वस्थ और राजनीति में मजबूत रहते हुए अपने बेटे की राजनीतिक एंट्री करवाई. नीतीश जीवनभर अपने बेटे के राजनीति में आने का विरोध करते रहे. अब जब उनकी उम्र काफी ज्यादा हो गई है और वे अपनी राजनीति के आखिरी दौर में हैं, तब निशांत की राजनीति में एंट्री कराने की बात हो रही है. अगर उन्होंने 5-7 साल पहले निशांत की राजनीति में एंट्री करवा दी होती, तो शायद इतनी चर्चा का विषय नहीं होता.

2. परिवारवादी राजनीति के खिलाफ रही BJP का इस मुद्दे पर नीतीश को साथ: BJP अक्सर दूसरे दलों पर परिवारवाद का आरोप लगाती है. ऐसा लगता है कि नीतीश कुमार को साइडलाइन करने के लिए BJP उनके बेटे निशांत को आगे करने के लिए तैयार हो गई है. कहा तो यह भी जा रहा है कि निशांत बिना सियासी मैदान में पसीना बहाए सीधे डिप्टी सीएम बनाए जाएंगे. ऐसे में सिर्फ नीतीश नहीं बल्कि BJP के इस फैसले को लेकर भी यह मुद्दा लोगों के बीच चर्चा का विषय बन रहा है.

3. परिवारवाद विरोधी नीतीश की इमेज: नीतीश अपने लंबे राजनीतिक करियर में परिवारवादी राजनीति के खिलाफ रहे हैं. चुनाव के दौरान अक्सर वे लालू यादव के खिलाफ परिवारवाद का मुद्दा मजबूती से उठाते थे. ऐसे में अब जब वे खुद अपने बेटे का नाम नई सरकार में डिप्टी सीएम के लिए आगे बढ़ाएंगे, तो यह मुद्दा निश्चित ही चर्चा का विषय बनेगा.

अमिताभ का आगे कहना है कि नीतीश की राजनीति और आखिरी वक्त में बेटे को राजनीति में एंट्री कराने के फैसले को देखकर चौधरी चरण सिंह की याद आती है. वे भी इसी तरह आजीवन अपने बेटे की राजनीतिक एंट्री के खिलाफ रहे थे, लेकिन जब वे कमजोर और अस्वस्थ हुए तो अजित सिंह की राजनीति में एंट्री हुई और वे राज्यसभा भी गए.

चौधरी चरण सिंह के कमजोर और अस्वस्थ होने पर राजनीति में आए अजित

साल 1979 में मथुरा के डेम्‍पियर नगर में देश के कद्दावर किसान नेता और लोकदल के प्रमुख चौधरी चरण सिंह एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने कहा, "जो गांव और किसान को जानता है, उनकी परेशानियों को समझता है उसे देश की सियासत में आने का हक है, लेकिन राजीव गांधी ने जहाज उड़ाए हैं, विदेश में पढ़े हैं. मेरा बेटा अजित सिंह खुद विदेश में पढ़ा है, तो ऐसे लोगों के लिए सियासत में कोई जगह नहीं है."

एक सियासी कार्यक्रम में प्रकाश सिंह बादल, देवी लाल के साथ चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह के करीबी डॉ. केएस राना ने एक इंटरव्यू में उनसे जुड़ा एक किस्सा याद करते हुए इस घटना का जिक्र किया था. इस भाषण के करीब एक साल बाद ही जब चौधरी चरण सिंह की तबीयत खराब होने लगी तो उन्होंने IIT पास अपने बेटे अजित सिंह को वापस बुला लिया. विदेश से लौटने के बाद अजित सिंह धीरे-धीरे यहां की राजनीति में रुचि लेने गए, लेकिन इस वक्त पिता उनके राजनीति में आने के खिलाफ थे. वह भी इस हद तक कि एक बार किसी नेता के सुझाव मात्र से उन्होंने पार्टी की अहम बैठक छोड़ दी थी.

कुछ दिनों बाद लोकसभा चुनाव 1984 में किसे, कहां से टिकट देनी है इसको लेकर लिस्‍ट पढ़ी जा रही थी. मुलायम सिंह यादव खड़े होकर लिस्‍ट पढ़ रहे थे. कई बड़े नेताओं के अलावा चौधरी देवीलाल भी मौजूद थे. मथुरा का नाम आते ही अजित सिंह का नाम बोला गया. इस पर चरण सिंह ने कहा कि यह कौन है? राजनीति में जिसे मैं नहीं जानता और आप उसे मथुरा से टिकट दे रहे हैं, तो आखिर यह है कौन?

तब देवीलाल ने उनसे कहा कि यह तुम्‍हारा छोरा है. इस पर उन्‍होंने मुलायम सिंह को डांट लगाते हुए कहा, "तू तो मेरे से राजनीति सीख रहा है, फिर तू कैसे परिवारवाद की बात कर सकता है. मुझे तुझ से ऐसी उम्‍मीद नहीं थी." और यह कहकर वे उस मीटिंग को छोड़कर चले गए.

लोकदल के कार्यक्रम में चरण सिंह की तस्वीर
लोकदल के कार्यक्रम में चरण सिंह की तस्वीर

यही कारण है कि जब तक चौधरी चरण सिंह राजनीति में एक्टिव रहे, अजित राजनीति में चाहकर भी नहीं आ पाए. जब चरण सिंह बीमार और कमजोर होने लगे, तब पार्टी के बाकी नेताओं के समर्थन से अजित सिंह राजनीति में आए. बीमारी के चलते चौधरी चरण सिंह 1986 में बेहोशी की हालत में थे तो पहली बार अजित सिंह राज्यसभा के सांसद बने थे. इस तरह अजित सिंह की सियासत औपचारिक एंट्री हो पाई थी.

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