scorecardresearch

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 20 साल : किन उम्मीदों को पंख दिए, कहां चूके!

सुशासन और विकास का वादा करके 2005 में बिहार की सत्ता संभालने वाले नीतीश कुमार की मुख्यमंत्री पद से विदाई हो रही है. इन बीस सालों में बिहार कितना आगे बढ़ा और कहां ठिठक गया

सुशासन से गठबंधन तक - नीतीश कुमार की राजनीति और यात्राओं का बदलता चेहरा (Photo: ITG)
'समृद्धि यात्रा' के समापन के मौके पर 26 मार्च 2026 को नीतीश कुमार
अपडेटेड 10 अप्रैल , 2026

नीतीश कुमार इतिहास में प्रताप सिंह कैरों या कांग्रेस नेता के. कामराज जैसा कद हासिल कर सकते थे लेकिन वे चूक गए. किसी जमाने में नीतीश के वैचारिक करीबी रहे लेखक और राजनेता प्रेमकुमार मणि जब यह कहते हैं तो उनकी बात में अफसोस भी दिखता है. 

कैरों पंजाब के तीसरे मुख्यमंत्री थे. उन्हें राज्य में हरित क्रांति लाने और आजादी के बाद पंजाब को नए सिरे से बसाने का श्रेय दिया जाता है. वहीं कांग्रेस नेता कामराज तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे. उन्हें राज्य में भूमि सुधार, शिक्षा सुधार और कांग्रेस में नई जान डालने का श्रेय दिया जाता है.

ये दोनों निर्विवाद रूप से भारत के महान नेताओं में शुमार हैं और नीतीश की क्षमताओं को इनके बराबर रखना बड़ी बात है. प्रेमकुमार मणि बताते हैं, “एक बार मैंने कहा था कि नीतीश कुमार सबाल्टर्न नेहरू बनें. पिछड़ों-वंचितों के नेहरू बनें. हालांकि तब मेरी बहुत आलोचना हुई थी, मगर मैं मानता था कि वे ऐसा कर सकते हैं. उन्होंने कुछ हद तक किया भी. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने निचले स्तर पर मौजूद सामंतवाद की जड़ें कमजोर करने की कोशिश की. मगर उसके बाद वे चूकने लगे. समान शिक्षा और भूमि सुधार के मसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया.” 

यह माना जाता है कि नीतीश कुमार को पहली बार सत्ता इसलिए मिली क्योंकि उन्होंने पिछड़ों में अति पिछड़े, दलितों में महादलित और मुसलमानों के बीच पसमांदा के लिए आवाज बुलंद की थी. मणि कहते हैं कि इस विचार को राजनीतिक मुद्दा बनाने की सलाह उन्होंने ही नीतीश को दी थी. मगर पहले कार्यकाल के बाद वे इन मुद्दों से दूर होने लगे. इसी वजह से 2011 में दोनों के रास्ते अलग हो गए. प्रेम कुमार मणि अब पूर्णकालिक लेखन करते हैं. 

राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन जमा करते नीतीश कुमार
राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन जमा करते नीतीश कुमार

आज यानी 10 अप्रैल को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा की शपथ लेने वाले हैं. इसके साथ ही बिहार में मुख्यमंत्री के रूप में करीब बीस साल का उनका कार्यकाल खत्म होने पर औपचारिक मुहर लग जाएगी.

अपने दो दशकों के कार्यकाल में नीतीश कुमार का देश और खासकर बिहार की राजनीति व समाज में क्या योगदान रहा, इसकी चर्चा आज से शुरू हो सकती है.

दिलचस्प है कि जिस समय प्रेम कुमार मणि उन्हें नेहरू और कामराज बनने से चूका हुआ बता रहे हैं, उसी समय उनके एक अन्य करीबी सहयोगी केसी त्यागी कुछ और ही कहते हैं. 

‘बिहार तक’ के साथ इंटरव्यू में वे कहते हैं, “मैं इस कल्पना से भी भयभीत हो जाता हूं कि नीतीश के बाद जो मुख्यमंत्री बनेगा, वह उनकी कद-काठी का नहीं होगा. बिहार में इस वक्त मुख्यमंत्री पद के जितने भी दावेदार हैं, वे सब मिलकर नीतीश की बराबरी नहीं कर सकते. चौधरी चरण सिंह और कर्पूरी ठाकुर के बाद हमारी पीढ़ी में उनसे ज्यादा तेजस्वी, ईमानदार और गुड-गवर्नेंस के सपने को साकार करने वाला कोई दूसरा नेता नहीं हुआ.” त्यागी JDU की स्थापना के वक्त से ही उनके साथ हैं. हाल ही में उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने के लिए राष्ट्रीय लोक दल की सदस्यता ले ली है.  

त्यागी कहते हैं कि उनका और नीतीश का पिछले 50 साल का साथ है. उन्हीं की तरह नीतीश के पुराने साथी अशोक, जो फिलहाल JDU कार्यालय के सचिव हैं, भी यही कहते हैं कि नीतीश जैसा अब बिहार में कोई दूसरा नहीं होगा. 

नीतीश की विदाई के वक्त उनके सहयोगियों की राय बंटी हुई है. कोई कहता है कि उन्होंने महान शासकों की फेहरिस्त में नाम दर्ज कराने का मौका गंवा दिया, तो कोई कहता है कि नीतीश जैसा कोई नहीं हो सकता. मगर उनके कार्यकाल की तटस्थ समीक्षा का काम शायद लंबे वक्त तक चलेगा.

सत्ता की शुरुआत और सबसे यादगार विरासत

साल 2005 के आखिरी महीनों में जब RJD के 15 साल के शासन के बाद नीतीश को सत्ता मिली, तो चर्चा चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक के.जे. राव की अधिक थी. उन्होंने अपनी सक्रियता से बिहार में निष्पक्ष चुनाव कराने में सफलता हासिल की थी. 

अखबारों में तब नीतीश से ज्यादा के.जे. राव का प्रोफाइल छपा था. मगर सत्ता संभालने के बाद नीतीश ने धीरे-धीरे अपने प्रयासों से जनता का दिल जीतना शुरू किया. उन्होंने भरोसा कायम किया कि बिहार को अपराध मुक्त बनाया जा सकता है. यहां सड़क-बिजली की समस्याओं को सुलझाया जा सकता है और महिलाओं व अति पिछड़ों को सशक्त किया जा सकता है.

अच्छी ग्रामीण सड़कें और उन पर साइकिल से जाती किशोरियों का झुंड नीतीश के पहले कार्यकाल का प्रतीक बनीं. हर कोई मानता है कि 2005 से 2010 तक का उनका पहला कार्यकाल बेहतरीन साबित हुआ. 

उस वक्त उनके करीबी रहे अधिकारी अंजनी कुमार सिंह कहते हैं, “बिहार में बदलाव की भूख थी. जिस बिहारी होने को गाली मान लिया गया था, उस पहचान को बदलना था. नीतीश अपने भाषण के अंत में कहते थे- बिहार का गौरव लौटाना है. उनका नारा था, ‘गर्व से कहो, हम बिहारी हैं.’ इस प्रयास से लगने लगा कि बिहार बदल रहा है. कई अधिकारी जो केंद्र में थे, वे बिहार लौट आए और सबने मिलकर जी-जान लगा दिया.”

बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पहले कार्यकाल में आम लोगों के बीच
बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पहले कार्यकाल में आम लोगों के बीच

नीतीश ने अपने पहले कार्यकाल में तीन लक्ष्य रखे. पहला अपराध नियंत्रण, दूसरा बुनियादी ढांचे का विकास और तीसरा महिलाओं व वंचितों का सशक्तीकरण. 

RJD का 15 साल का शासन मुख्य रूप से जातिगत संघर्ष का दौर था. उस दौर में लोग असुरक्षित महसूस करते थे. नीतीश ने सत्ता में आते ही कानून का राज स्थापित करने की चुनौती ली. यह जिम्मेदारी अफजल अमानुल्लाह और अभयानंद जैसे अधिकारियों को दी गई. उन अधिकारियों ने एनकाउंटर के बजाय कानूनी तरीकों से अपराध नियंत्रण की कोशिश की और सफल रहे.

अभयानंद बताते हैं, “हमने आर्म्स एक्ट को ठीक से लागू करने से शुरुआत की. सजा दिलाने के लिए पुलिस अधिकारी की गवाही काफी होती थी. यह प्रयोग सफल रहा. उसके बाद हमने किडनैपिंग और मर्डर जैसे अपराधों पर फोकस किया.” इन तरीकों से पहले दो साल में 27 हजार से अधिक मामलों में दोष सिद्ध हुए. आनंद मोहन, पप्पू यादव और शहाबुद्दीन जैसे कुख्यात अपराधी जेल भेज दिए गए. 

अपराधिक मामलों के तेजी से निपटारे के लिए 183 फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए गए. सैप और स्पेशल टास्क फोर्स को सक्रिय किया गया. 

नीतीश का दूसरा मोर्चा बुनियादी ढांचा था. 2005 तक बिहार की 81,655 किमी सड़कों में से 36,851 किमी कच्ची थीं. 2025 तक सड़कों की कुल लंबाई 1,57,797 किमी हो गई और कच्ची सड़कें घटकर 11,939 किमी रह गईं. इसके अलावा बड़े पुलों और फ्लाइओवर का जाल बिछाया गया. पटना में ज्ञान भवन, बापू टावर और बिहार म्यूजियम जैसी इमारतें बनीं, जिन्हें आधुनिक पटना का प्रतीक कहा गया.

नीतीश कुमार बुनियादी ढांचा विकास पर काफी जोर देते रहे हैं
नीतीश कुमार बुनियादी ढांचा विकास पर काफी जोर देते रहे हैं

सड़क के साथ बिजली पर भी फोकस रहा. 2005 तक 53 फीसदी गांवों में बिजली नहीं थी. राज्य का काम सिर्फ 1157 मेगावाट से चलता था. 2025 तक हर टोले में बिजली पहुंचने का दावा है और खपत 8752 मेगावाट तक पहुंच गई है. बिहार में प्रति माह 125 यूनिट तक बिजली मुफ्त है.

नीतीश सरकार की तीसरी उपलब्धि महिलाओं के लिए किया गया काम है. अंजनी कुमार सिंह कहते हैं कि उन्होंने महिलाओं के लिए 'पॉजिटिव डिस्क्रिमिनेशन' की नीति अपनाई. साइकिल योजना से लेकर मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना तक इसका असर दिखता है. 

इसकी शुरुआत पोशाक योजना से हुई, फिर नौवीं की लड़कियों को साइकिल दी गई. पंचायती राज चुनाव में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया गया. फिर शिक्षकों की बहाली और बिहार पुलिस सहित सभी सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण की घोषणा की गई. 

आंगनबाड़ी और जीविका समूहों के जरिए महिलाओं का बड़ा वर्कफोर्स तैयार हुआ. BJP नेता किरण घई कहती हैं, “इन योजनाओं से महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा और वे चारदीवारी से बाहर निकलीं. इसी का परिणाम है कि बिहार में महिलाओं का वोट प्रतिशत बढ़ा और अब वे अपनी मर्जी से वोट कर रही हैं.”

जाति के मोर्चे पर नीतीश की बड़ी सफलता

महिलाओं के साथ नीतीश ने अति पिछड़ा और महादलित समूहों के लिए भी काम किया. पसमांदा मुसलमानों को विशेष सहायता दी और अति पिछड़ों के लिए अलग से 20 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की. 

प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “इन कामों से ग्रामीण क्षेत्र में सामंतवाद की चूलें हिल गईं. इसी का नतीजा था कि 2009 के लोकसभा और 2010 के विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद काफी पीछे चले गए.”

2009 के लोकसभा चुनाव में 40 सीटों में से 20 JDU  को मिली, BJP को 12 सीटें मिलीं और RJD सिर्फ 18 सीटों का नुकसान सहते हुए सिर्फ चार सीटों पर सिमट गई. 2010 बिहार विधानसभा चुनाव में यह सिलसिला और आगे बढ़ा. 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए को 206 सीटें आईं, RJD महज 22 सीटें जीत पाया. इस चुनाव में JDU को 115 सीटें आईं और वह अकेले ही बहुमत के आंकड़े 122 के पास पहुंच गई. 

2010 के विधानसभा चुनाव में NDA को 206 सीटें मिलीं. JDU ने अकेले 115 सीटें जीतीं. नीतीश के समर्थक और विरोधी दोनों इसे उनके पहले कार्यकाल के कामकाज का इनाम मानते हैं. उस चुनाव में अल्पसंख्यकों ने भी नीतीश को वोट दिए, क्योंकि BJP के साथ रहने के बावजूद उन्होंने सांप्रदायिकता को नियंत्रित रखा.

BJP के साथ के बावजूद काफी वक्त तक मुसलमान वोट नीतीश को मिलता रहा
BJP के साथ के बावजूद काफी वक्त तक मुसलमान वोट नीतीश को मिलता रहा

पसमांदा मुस्लिम महाज के संस्थापक और पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर कहते हैं, “पहले समता पार्टी और बाद में JDU दोनों का BJP के साथ लंबे समय से गठबंधन था, मगर दोनों मिलकर RJD को हरा नहीं पाते थे. क्योंकि मुसलमान इन्हें वोट नहीं करते थे. ऐसे में 2005 के नवंबर वाले चुनाव से पहले नीतीश जी ने हमलोगों से सहयोग मांगा. हम साथ आए तो नीतीश को सफलता भी मिली और इस बात को ध्यान में रखते हुए नीतीश ने मुसलमानों का साथ भी दिया. उन्हें आरक्षण का लाभ मिला. कब्रिस्तानों की घेराबंदी कराई. भागलपुर दंगे के मुख्य आरोपी को सजा दिलाई. इस वजह से 2010 में मुसलमानों ने और खुलकर नीतीश को वोट किया.”

अली अनवर आगे कहते हैं, “नीतीश ने हमलोगों से वादा किया था कि अगर आपलोग हमें साथ देंगे तो हम BJP की बैशाखी छोड़ देंगे. मगर 2010 में 115 सीटें लाने के बावजूद उन्होंने भाजपा का साथ नहीं छोड़ा. 2013 में जरूर नरेंद्र मोदी के मजबूत होने की स्थिति में वे अलग हुए, जिसका हमलोगों ने स्वागत भी किया. क्योंकि एक तरह से वह सेकुलर मिजाज नीतीश कुमार का प्रायश्चित था. नीतीश ने मुसलमानों का साथ दिया. कब्रिस्तानों की घेराबंदी कराई और भागलपुर दंगे के मुख्य आरोपी को सजा दिलाई. मगर जब 2017 में वे फिर BJP के साथ चले गए, तो मुसलमानों का उनसे मोहभंग शुरू हो गया. तभी उनके साथ ‘पलटूराम’ नाम जुड़ा.”

राजनीति में बदलाव और करीबियों से दूरी

JDU की तरफ से दो बार राज्य सभा भेजे गए अली अनवर ने 2017 में JDU से अलग हो गये. उन्हें पार्टी से हटा दिया गया. अली अनवर की तरह ही प्रेम कुमार मणि को भी 2011 में JDU से हटा दिया गया था, वे पार्टी की तरफ से 2006 में बिहार विधान परिषद में भेजे गए थे.

प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “नीतीश जी के साथ मेरा मतभेद तब हुआ जब उन्होंने बंद्योपाध्याय कमिटी की सिफारिशों को लागू नहीं कराया. भूमि सुधार की उस कमिटी की सिफारिशों में ऐसा कुछ रेडिकल नहीं था. यह समिति बस बंटाईदारों की पहचान दर्ज कराने और उन्हें किसानों के लिए बनने वाली योजनाओं का लाभ दिलाने की बात करती थी. इसी तरह समान शिक्षा की बात करने वाली मुचकुंद दुबे कमिटी की रिपोर्ट भी ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी. मगर 2011 में जब उन्होंने सवर्ण आयोग का गठन किया तो मैंने उसका विरोध किया. क्योंकि मेरा मानना है कि इलाज तो बीमार लोगों का होता है, स्वस्थ लोगों को इलाज की क्या जरूरत?”

प्रेम कुमार मणि आगे यह भी जोड़ते हैं, “दरअसल 2010 की भारी जीत के बाद उनके कुछ करीबी लोगों ने उन्हें यह समझाने में सफलता प्राप्त कर ली थी कि यह जीत उन्हें सवर्ण जातियों की वजह से मिली है. इसलिए वे धीरे-धीरे अपने कोर समर्थकों के बदले सवर्ण नेताओं से घिरने लगे. उनके सलाहकारों में भी सवर्ण और इलीट किस्म के लोग दिखने लगे.”

इन दोनों की तरह ही नीतीश के साथ शुरुआत में रहने वाले अति पिछड़ा नेता उदयकांत चौधरी नीतीश से अलग हो गये. हाल ही में दिवंगत हुए उदयकांत चौधरी ने एक बातचीत में इस संवाददाता को बताया था, “क्योंकि मैंने अति पिछड़ा वर्ग में तेली, तमोली और दांगी जैसी संपन्न और सक्षम जातियों को शामिल करने का विरोध किया था. बाद में मेरा अंदेशा सही साबित हुआ. आज स्थानीय निकाय चुनाव को देख लें या विभिन्न परीक्षाओं को, यही तीन जातियां अति पिछड़ा समूह के सभी अवसरों पर काबिज हो रही हैं.” 

इसी तरह महादलित श्रेणी से जिन चार जातियों दुसाध, चमार, धोबी और पासी को अलग रखा गया था, उन्हें एक-एक कर महादलित श्रेणी में शामिल करा लिया गया. इस फैसले का नीतीश के करीबी रहे जीतनराम मांझी ने तीखा विरोध किया था. 2024 में भी मांझी ने जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा उपवर्गीकरण के फैसले के समर्थन में अभियान शुरू किया तो इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था. 

जेपी आंदोलन के वक्त से ही नीतीश के करीबी रहे समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी जो अभी भी नीतीश और लालू दोनों के साथ बड़े भाई जैसा बर्ताव करते हैं, का कहना है, “नीतीश के स्वभाव में बड़े फैसले लेने के साहस की कमी रही है. 2009 में जब नीतीश और मोदी का एक दूसरे के हाथ पकड़े हुए विज्ञापन अखबारों में छपा था और नीतीश ने कोसी आपदा के लिए आया गुजरात का पैसा वापस कर दिया था और BJP नेताओं के लिए प्रस्तावित भोज को भी रद्द कर दिया था. तब मैंने उसे सलाह दी थी कि वह अकेले चुनाव लड़े. अभी जनता में उसकी ऐसी लहर है कि लोग JDU को अकेले जिता देंगे. मगर वह तैयार नहीं हुआ. 2010 की बंपर जीत के बाद भी वह अकेले सरकार बना सकता था. मगर उसने हिम्मत नहीं दिखाई.” 2014 में शिवानंद तिवारी को भी JDU से हटा दिया गया था.

नरेंद्र मोदी के उभार का दौर

दरअसल 2009 से 2014 के बीच का वक्त नीतीश कुमार की राजनीति के लिए उथल-पुथल भरा वक्त रहा. राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उभार को लेकर वह सहज नहीं थे. तब तक वे बिहार में BJP को अपने हिसाब से चलाते रहे थे. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार का मतलब कॉमन मिनिमम प्रोग्राम होता था. BJP की हिंदुत्ववादी राजनीति से वे बिहार को बचाते रहे थे. वे शुरुआत से ही नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार के लिए बिहार बुलाने के खिलाफ थे. वे इस मांग को यह कहते हुए टाल देते थे कि हमारे पास तो पहले से एक मोदी है.

नीतीश कुमार BJP के सुशील मोदी के साथ
नीतीश कुमार BJP के सुशील मोदी के साथ

उनका इशारा अपने उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की तरफ हुआ करता था. इधर सुशील कुमार मोदी के इस बयान ने खाई को और चौड़ा कर दिया कि नीतीश पीएम मटेरियल हैं. इसका नतीजा यह हुआ कि जब जब BJP ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी को अपना पीएम उम्मीदवार घोषित कर दिया तो उन्होंने बिहार में BJP से अपने रास्ते अलग कर लिए. उन्होंने 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ा और उन्हें 18 सीटों का नुकसान हुआ. बाद में जब नरेंद्र मोदी पीएम बने तो उन्होंने पद से इस्तीफा देकर अपने सहयोगी जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया. हालांकि यह प्रयोग भी सफल नहीं हुआ और उन्हें सिर्फ नौ महीने में पद से हटाना पड़ा.

2015 में नीतीश अपने पुराने सहयोगी RJD नेता लालू प्रसाद के साथ आए और उस साल विधानसभा चुनाव में उन्होंने BJP को पराजित किया. फिर मुख्यमंत्री बने. मगर 2013 से उनकी राजनीति में जो अस्थिरता आई वह आखिर तक बनी रही. इस बीच उन्होंने दो मौकों पर RJD के साथ सरकार बनाई और फिर लौटकर BJP के साथ आए. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने BJP के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने का प्रयास किया, मगर उसमें भी सफल नहीं हो पाये और आखिर में लौटकर चुनाव के पहले BJP के साथ आ गए. 

2013 से शुरू हुई उनकी इस राजनीतिक अस्थिरता की वजह से बिहार में नौ बार सरकार बदली और इसका असर कामकाज पर पड़ा. विकास की रफ्तार भी बाधित हुई. ऐसे में कई ऐसे काम जो वे पूरा करना चाहते थे, कर नहीं पाए. पलायन की स्थिति बनी रही, रोजगार का मसला सुलझ नहीं पाया, उद्योग और निवेश नहीं आए. शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव विकास सूचकांक के मामले में भी बिहार देश में सबसे नीचे ही रहा.

सरकार पर उठने लगे सवाल

इन सबमें सबसे बड़ी विफलता आर्थिक मोर्चे पर ही रही. उद्योग-धंधे नहीं लगे तो रोजगार सृजन नहीं हुआ. ऐसा क्यों हुआ, इस मसले पर जब हमने टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र से पूछा तो उन्होंने कहा, “इतने साल बाद भी बिहार में खेती से निर्भरता कम नहीं हुई, शहरीकरण नहीं हुआ, इसलिए न उद्योग बढ़े और रोजगार में विविधता भी नहीं आई. सरकार जरूर जीडीपी ग्रोथ का दावा करती रही, मगर वह ग्रोथ कंस्ट्रक्शन की गतिविधियों के कारण था. अब जब नीतीश कुमार इस ट्रैप को तोड़ नहीं पाये तो उन्होंने कंस्ट्रक्शन की गतिविधियों को ही लगातार बढ़ाये रखा. इससे यह हुआ कि अच्छी सड़कें, अच्छी इमारतों और बिजली की उपलब्धता से ऐसा लगा कि बिहार बदल रहा है. मगर वह बदलाव लोगों के जीवन को बदल नहीं पाया, ऐसे में मजबूरी में लोग आज भी पलायन करते हैं. शिक्षा और स्वास्थ्य के स्तर में बहुत सुधार नहीं हुआ है. राज्य के लोगों की प्रति व्यक्ति आय जस की तस है.” 

इस बात को कुछ हद तक अंजनी कुमार सिंह भी स्वीकार करते हैं. वे कहते हैं, “इतने साल की मेहनत के बाद हम उस गड्ढे से बाहर निकले हैं, जिसमें 2005 के पहले के शासन में हम पड़े थे. इस बीच देश आगे बढ़ गया है. हालांकि नीतीश कुमार ने पिछले बीस सालों में जिस प्लेटफार्म को खड़ा किया है, उससे बिहार विकास की रफ्तार में देश के विकसित राज्यों के बराबर पहुंच सकता है. ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए.”

Advertisement
Advertisement