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BJP की अंदरूनी राजनीति से परेशान निषाद पार्टी; गठबंधन में भरोसे की दरार क्यों गहराई

लखनऊ में निषाद पार्टी के संकल्प दिवस ने BJP गठबंधन की अंदरूनी खींचतान उजागर कर दी है

निषाद पार्टी के संकल्प दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम
निषाद पार्टी के संकल्प दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम
अपडेटेड 15 जनवरी , 2026

लखनऊ में 13 जनवरी को निषाद पार्टी का संकल्प दिवस सिर्फ एक वार्षिक आयोजन नहीं था, बल्कि यूपी की मौजूदा गठबंधन राजनीति के भीतर चल रही खींचतान का सार्वजनिक प्रदर्शन था. मंच पर BJP के केंद्रीय मंत्री, दो उपमुख्यमंत्री और सहयोगी दलों के नेता मौजूद थे, लेकिन मंच से दिए गए संदेशों के भीतर असहज सवाल भी छिपे थे. निषाद पार्टी को विपक्ष से ज़्यादा चिंता अब अपनी ही सहयोगी BJP की अंदरूनी राजनीति को लेकर दिख रही है.

निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद और उनकी पार्टी लंबे समय से BJP के साथ हैं. 2019 में गठबंधन के बाद से निषाद पार्टी ने खुद को सत्ता के केंद्र के क़रीब पाया और इसे वह अपनी राजनीतिक सफलता के रूप में भी पेश करती है. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का यह दावा कि 2019 के बाद BJP यूपी में कोई चुनाव नहीं हारी, इसी साझेदारी को मज़बूत करने का प्रयास था. लेकिन इसी मंच से संजय निषाद का यह कहना कि उनके बेटे प्रवीण निषाद 2024 का लोकसभा चुनाव “अंदरूनी धोखे” की वजह से हारे, गठबंधन के भीतर मौजूद अविश्वास को उजागर करता है.

संत कबीर नगर सीट से प्रवीण निषाद की हार को संजय निषाद ने समाजवादी पार्टी की ताकत नहीं माना. उनका सीधा आरोप था कि BJP के भीतर ही ऐसे तत्व हैं जिन्होंने जानबूझकर नुकसान पहुंचाया. यह बयान सिर्फ एक पिता या पार्टी प्रमुख की नाराजगी नहीं था, बल्कि यह चेतावनी भी थी कि निषाद पार्टी अब अपने सहयोगी के भीतर हो रही राजनीति को चुपचाप स्वीकार करने के मूड में नहीं है. जब वे कहते हैं कि BJP को ऐसे लोगों को “किनारे करना चाहिए”, तो वह दरअसल गठबंधन में अपनी सौदेबाज़ी की ताकत का भी संकेत दे रहे होते हैं.

निषाद पार्टी की बेचैनी की जड़ें केवल एक चुनावी हार तक सीमित नहीं हैं. पार्टी का पूरा राजनीतिक आधार निषाद समुदाय की पहचान, सम्मान और हिस्सेदारी के सवाल पर टिका है. वर्ष 2013 में राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद से शुरू हुई यह यात्रा 2016 में निषाद पार्टी के रूप में सामने आई. हर संकल्प दिवस पर SC दर्जे की मांग दोहराई जाती है, लेकिन आज तक इस मुद्दे पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. ऐसे में पार्टी के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि सत्ता में रहते हुए भी उनके मूल सवाल हाशिये पर हैं.

BJP के साथ गठबंधन ने निषाद पार्टी को मंत्री पद और सत्ता में भागीदारी तो दी, लेकिन समुदाय के बड़े मुद्दों पर प्रगति की रफ्तार धीमी रही. यही वजह है कि संकल्प दिवस के मंच से किरेन रिजिजू को “पारिवारिक गठबंधन” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा. यह भरोसा दिलाने की कोशिश थी कि निषाद पार्टी के मुद्दे BJP के लिए भी उतने ही अहम हैं. लेकिन भरोसे के ऐसे सार्वजनिक आश्वासन अक्सर तब दिए जाते हैं, जब भीतर कहीं न कहीं भरोसे की कमी महसूस की जा रही हो.

राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय कहते हैं, “BJP की अंदरूनी राजनीति निषाद पार्टी को इसलिए भी परेशान करती है क्योंकि यूपी में सत्ता के भीतर प्राथमिकताएं लगातार बदलती रहती हैं. बड़े सामाजिक समूहों और प्रभावशाली नेताओं के बीच संतुलन साधने की कोशिश में छोटे सहयोगी दल अक्सर असुरक्षित महसूस करते हैं. निषाद पार्टी को लगता है कि चुनावी वक्त पर उनके वोट अहम हैं, लेकिन टिकट बंटवारे, संगठनात्मक फैसलों और रणनीतिक प्राथमिकताओं में उनकी आवाज़ उतनी नहीं सुनी जाती.”

इस असुरक्षा को समाजवादी पार्टी की सक्रियता और बढ़ा देती है. अखिलेश यादव का PDA फार्मूला सीधे तौर पर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोटरों को जोड़ने की कोशिश है, जिसमें निषाद समुदाय भी शामिल है. BJP और उसके सहयोगी यह अच्छी तरह समझते हैं कि निषाद वोटों में सेंध लगने का मतलब कई सीटों पर समीकरण बिगड़ना है. यही वजह है कि संकल्प दिवस में शक्ति प्रदर्शन का निशाना भले ही विपक्ष था, लेकिन संदेश अपने सहयोगियों के लिए भी था.

कार्यक्रम में उपस्थ‍ित सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी (SBSP ) के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर का यह कहना कि राजभर और निषाद वोटों के बिना यूपी में सरकार नहीं बन सकती, उसी दबाव की राजनीति का हिस्सा है. SBSP और निषाद पार्टी दोनों ही यह दिखाना चाहते हैं कि वे सिर्फ़ नाम के सहयोगी नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी रखने वाले खिलाड़ी हैं. लेकिन BJP के भीतर जब स्थानीय स्तर पर फैसले लिए जाते हैं, तो अक्सर इन दलों को लगता है कि उन्हें “मैनेज” किया जा रहा है, न कि बराबरी का भागीदार माना जा रहा है.

संजय निषाद के भाषण का एक और अहम पहलू उनके समुदाय को “वोट बैंक” मानने से इनकार करना था. यह टिप्पणी सीधे तौर पर BJP की उस राजनीतिक शैली पर सवाल उठाती है, जिसमें सामाजिक समूहों को चुनावी गणित के तौर पर देखा जाता है. निषाद समुदाय के नेताओं की हत्या और कथित इस्तेमाल के आरोपों का ज़िक्र कर संजय निषाद ने यह याद दिलाने की कोशिश की कि उनका समाज अब पुराने तरीकों को स्वीकार नहीं करेगा. फूलन देवी और जमुना निषाद की CBI जांच की मांग भी इसी राजनीति का हिस्सा है. यह मांग सिर्फ़ न्याय की नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि निषाद पार्टी अपने इतिहास और पीड़ा को राजनीतिक एजेंडे के रूप में सामने रखकर दबाव बनाना चाहती है. BJP के लिए यह असहज स्थिति है, क्योंकि ऐसे मुद्दे गठबंधन को भावनात्मक और वैचारिक सवालों में उलझा सकते हैं.

सुशील पांडेय बताते हैं, “आने वाले विधानसभा चुनाव इस तनाव को और बढ़ाने वाले हैं. BJP की कोशिश होगी कि सहयोगी दलों को साथ रखते हुए भी संगठन पर अपनी पकड़ बनाए रखे. वहीं निषाद पार्टी यह सुनिश्चित करना चाहेगी कि उसकी राजनीतिक कीमत सिर्फ़ भाषणों और मंचों तक सीमित न रहे. प्रवीण निषाद की हार का मुद्दा इसी मोलभाव का शुरुआती बिंदु है.” संकल्प दिवस ने यह साफ़ कर दिया कि निषाद पार्टी अब सिर्फ़ विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने सहयोगी से भी सवाल पूछ रही है. BJP की अंदरूनी राजनीति, गुटबाज़ी और प्राथमिकताओं की लड़ाई निषाद पार्टी को इसलिए परेशान कर रही है क्योंकि उसका सीधा असर उसके राजनीतिक भविष्य पर पड़ता है. गठबंधन मजबूरी है, लेकिन बिना सम्मान और भरोसे के यह मजबूरी लंबे समय तक टिकाऊ नहीं होती.

यूपी की राजनीति में निषाद पार्टी की भूमिका छोटी नहीं है. यही वजह है कि उसके असंतोष को नज़रअंदाज़ करना BJP के लिए जोखिम भरा हो सकता है. संकल्प दिवस के मंच से दिया गया हर बयान इसी चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है कि निषाद वोटरों को हल्के में लेना अब आसान नहीं होगा.

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