कागजों पर बिहार भले ही ड्राई स्टेट है लेकिन हकीकत में ऐसा बिल्कुल नहीं है. NFHS-6 सर्वे ने इस बात का खुलासा किया है कि बिहार में अब भी बड़ी संख्या में लोग चोरी-छीपे शराब पी रहे हैं. अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू हुए दस साल पूरे हो चुके हैं.
इस मौके पर यह खुलासा और भी अहम हो जाता है. दरअसल, यह सर्वे रिपोर्ट 15 साल और उससे ज्यादा उम्र के लोगों से पूछकर ली गई जानकारी के आधार पर तैयार की गई है. इससे पता चलता है कि बिहार में 16.5 फीसद पुरुष अब भी शराब पीते हैं.
सर्वे के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में शराब पीने वालों का आंकड़ा बढ़कर 17.1 फीसद हो गया है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 12.8 फीसद है. यहां ध्यान रखने वाली बात यह है कि NFHS-6 सर्वे रिपोर्ट बिहार के हर व्यक्ति से बातचीत कर तैयार नहीं किया गया है, बल्कि यह वैज्ञानिक तरीके से चुने गए कुछ परिवारों के नमूने पर आधारित है.
ऐसे में बिहार में अब भी 16.5 फीसद लोगों के शराब पीने के आंकड़े को अनुमानित दर ही समझा जाना चाहिए. वहीं, राज्य में महिलाओं में शराब पीने का आंकड़ा बेहद कम 0.4 फीसद पर स्थिर बना हुआ है. इससे साफ होता है कि राज्य में महिलाएं कम ही सही लेकिन अब भी शराब पी रही हैं.
NFHS-6 सर्वे 2023-24 में केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के जरिए कराया गया था. मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज (IIPS) को इस सर्वे के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया था. यह सर्वे पूरे देश के 715 जिलों में लगभग 6,79,000 परिवारों को कवर करता है.
भारत में जनसंख्या, स्वास्थ्य, पोषण और परिवार कल्याण से जुड़े आंकड़े इकट्ठा करने का यह सबसे बड़े सर्वेक्षणों में से एक है. इसकी रिपोर्ट 29 मई को जारी की गई. सरकारें और नीति-निर्माता इस रिपोर्ट का इस्तेमाल जिला स्तर तक साक्ष्य-आधारित (Evidence-Based) योजना बनाने के लिए करते हैं.
बिहार की शराबबंदी कानून कभी सिर्फ जन स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं था, बल्कि यह एक नैतिक और चुनावी वादा था. राज्य सरकार का यह कहना था कि शराबबंदी कानून के जरिए वह शराब की लत से बिगड़ रहे सामाजिक व्यवस्था को सख्ती से ठीक करेगा. कुछ समय तक यह वादा बहुत बड़ा राजनीतिक लाभ दे रहा था.
इस कानून के जरिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद को एक सुधारक के रूप में पेश कर पाए. यह माना जाता है कि इसकी वजह से महिलाओं को घर और बाहर दोनों जगहों पर सुरक्षा मिली. साथ ही राज्य को एक अलग पहचान मिली. बिहार को अनुशासित और सामाजिक स्तर पर सुधार करने वाले राज्य के साथ-साथ सैद्धांतिक तौर पर ही सही पर ड्राई स्टेट की पहचान मिली.
बिहार में शराबबंदी कानून और हकीकत के बीच का अंतर ही असली कहानी बयां करता है. हालांकि, बिहार में 16.5 फीसद पुरुषों के शराब पीने का आंकड़ा यह साबित नहीं करता है कि शराबबंदी पूरी तरह अससफल हो गई है. हां, यह आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि शराबबंदी उस हद तक सफल नहीं हो पाई है, जितना इसके समर्थक अक्सर दावा करते हैं.
13 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले राज्य में छोटा-सा फीसद भी शराब पीने वालों की बहुत बड़ी संख्या की ओर इशारा करता है. इनमें छुपकर पीने वालों, कभी-कभी पीने वालों और सामाजिक दबाव में पीने वालों को आंकड़ा भी शामिल है. सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात शराब पीने का ट्रेंड है. NFHS-5 (2019-21) में बिहार के 15 साल और उससे ऊपर के पुरुषों में शराब पीने की दर 15.4 फीसद थी. दो साल बाद NFHS-6 में यह बढ़कर 16.5 फीसद हो गई यानी 1.1 फीसद की बढ़ोतरी.
आंकड़ों के लिहाज से यह बढ़ोतरी मामूली लग सकती है लेकिन राजनीतिक रूप से यह बहुत अहम है. ऐसा इसलिए क्योंकि यह सवाल उठाता है कि क्या शराबबंदी कानून ने शराब पीने वालों की आबादी को खत्म करने की बजाय सिर्फ छुपा दिया है?
इस मामले में ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच का अंतर बहुत कुछ बताता है. बिहार के गांवों में शहरों की तुलना में शराब पीने की दर ज्यादा है. यह किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए बिहार में शराब की डिलीवरी होती है. छुपकर पी जाती है और जब कोई अधिकारी पूछताछ करने आता है तो इनकार कर दिया जाता है.
शराबबंदी ने गांवों में एक नई अर्थव्यवस्था खड़ी कर दी है, जो तस्कर, बिचौलियों और अधिकारियों के बीच सांठ-गांठ पर टिकी है. बिहार में शराबबंदी को लेकर दो अहम चीजें देखने को मिलती हैं. एक तो यह कि सार्वजनिक तौर पर पुलिस छापेमारी कर शराब जब्त करती है. गिरफ्तारियां होती हैं. पुलिस के बयान और मंत्रियों का सख्त रुख सामने आता है. वहीं, दूसरी ओर घर के पिछवाड़े के कमरे में बोतल रखे जाते हैं, लोग चुप-चाप घर पर बनी शराब पीते हैं. इतना ही नहीं ट्रक ड्राइवर शाम में तो मजदूर वीकेंड पर शराब पीना पसंद करते हैं. अब भी शादी और दूसरे अवसरों पर कई सारे लोग चोरी-छीपे शराब पीते हैं.
राज्य सरकार इसे अपराध कहता है लेकिन बहुत से नागरिक इसे एक सामान्य हकीकत मानते हैं. यह तनाव उन जगहों पर और भी तेज है जहां समाज बहुत स्तरों में बंटा हुआ है. कुछ पुरुषों के लिए शराब आराम, दिखावा या तनाव मुक्ति से जुड़ी है. वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह घरेलू झगड़ों और आर्थिक परेशानी का कारण है.
कुछ वंचित समुदायों में इसका प्रचलन पलायन, अनिश्चित जीवन और मर्दानगी के प्रदर्शन से जुड़ा है. महिलाओं का मुद्दा भी बहुत महत्वपूर्ण है, जिसे शराबबंदी के समर्थक हमेशा अपने तर्क के तौर पर इस्तेमाल करते हैं. NFHS-6 में बिहार में महिलाओं में शराब पीने की दर बेहद कम है, जो कानून के समर्थकों के लिए काफी मायने रखती है. दरअसल, बिहार में शराबबंदी को कभी सिर्फ शराब छुड़ाने की नीति के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक मुक्ति के रूप में बताया जाता रहा है.
नीतीश सरकार ने वादा किया था कि वह इस कानून के जरिए महिलाओं को पुरुषों की शराब पीने से होने वाली हिंसा, कर्ज और परिवारिक अस्थिरता से बचाएगा. यह वादा आज भी महिलाओं को प्रभावित करता है. बहुत सी महिलाएं आज भी शराबबंदी का समर्थन करती हैं, क्योंकि उन्होंने घर में शराब बंद होने के बाद काफी सुरक्षित महसूस किया है. एक तरह से महिलाओं के खिलाफ हिंसा को रोकने में यह कानून एक सुरक्षा की दीवार की तरह है.
फिर भी सर्वे के ये आंकड़े इस बात पर सवाल खड़े करते हैं कि कानून ने अपना काम सही से पूरा किया है. अगर 16.5 फीसद पुरुष अब भी शराब पीने की बात स्वीकार कर रहे हैं, तो साफ है कि कानून उस व्यवहार को पूरी तरह खत्म नहीं कर सका, जिसे वह दबाना चाहता था.
हो सकता है कि उसने शराब पीने को अंडरग्राउंड (छुपा) कर दिया हो. इसे कम दिखने वाला और ज्यादा महंगा बना दिया हो. नकली शराब का बाजार और खतरनाक भी हो गया हो लेकिन यह सामाजिक जीवन से शराब को पूरी तरह मिटा नहीं पाया है. NFHS सर्वे बिहार की शराबबंदी की कहानी के इसी विरोधाभास को जाहिर करता है.
इन सबके बावजूद यह नीति इसलिए टिकी हुई है क्योंकि इसमें अभी भी नैतिक बल है. खासकर महिलाओं और गरीब परिवारों के बीच, जो सख्त सार्वजनिक व्यवस्था में कुछ फायदा देखते हैं. इसे सरकार की गंभीरता का प्रतीक बताया जा सकता है. फिर भी हकीकत बार-बार यही दिखाती है कि कानून की पहुंच अधूरी है. बिहार इस मामले में अकेला नहीं है. दुनिया में कहीं भी शराबबंदी हो, वहां कम या ज्यादा पर इसी तरह की स्थिति देखने को मिलती है.
NFHS-6 के ये आंकड़े दिखाते हैं कि नीतियों की बड़ी-बड़ी बातें और समाज का असली व्यवहार शायद ही कभी एक साथ चलते हैं. ये यह भी बताते हैं कि राज्य अपनी छवि को जितना बड़ा और महत्वाकांक्षी बनाना चाहता है, उसकी असली पहुंच अक्सर उससे काफी कम होती है.
कानून में बिहार सूखा राज्य यानी ड्राई स्टेट हो सकता है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि वहां अब भी शराब पीना जारी है. कथित तौर पर यह ड्राई स्टेट आदत, जरूरत, सावधानी और इनकार से पूरी तरह भीगा हुआ है. यह सिर्फ विरोधाभास नहीं, बल्कि एक तरह की प्रशासनिक मायूसी की ओर इशारा करता है.

