
30 जनवरी का दिन ढल रहा था. बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार के आवास पर समीक्षा बैठक चल रही थी. मामला पिछले 20-22 दिन से बिहार को मथ देने वाले राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET) छात्रा की मौत का था, जिसे तमाम कोशिशों के बावजूद बिहार पुलिस तब तक सुलझा नहीं पाई थी. इस बार पुलिस शायद किसी नतीजे पर पहुंची थी और इसी वजह से बैठक में मृतक NEET छात्रा के माता-पिता को भी बुलाया गया था.
मगर बैठक के बाद जब छात्रा की मां बाहर निकलीं तो वे चीखने-चिल्लाने लगीं. उन्होंने पत्रकारों से कहा, “पुलिस बिकी हुई है. डीएसपी से लेकर एसपी तक. ये लोग कह रहे हैं, रेप नहीं हुआ है, डॉक्टर ने गलत कहा है. मेरी बेटी ने सुसाइड किया है.” उनके साथ बाहर निकले पीड़िता के पिता बोले, “न्याय के लिए आए थे, लेकिन न्याय नहीं हुआ.”
ऐसी खबरें हैं कि इन दोनों को पुलिस ने गृह मंत्री सम्राट चौधरी से मिलने को भी कहा था. इस दौरान पीड़िता के भाई का कहना था, “होम मिनिस्टर से मिलकर क्या करेंगे!” फिर पूरा परिवार अपने घर जहानाबाद लौट गया. खबर यह भी है कि रास्ते में भी उन्हें रोककर मनाने की कोशिश की गई. मगर वे नहीं माने. आखिरकार अगली सुबह गृह मंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने NEET छात्रा हत्याकांड की जांच CBI से कराने का आग्रह किया है.” उनकी इस पोस्ट से साफ हो गया कि राजधानी पटना के एक छात्रावास में NEET परीक्षा की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मृत्यु के मामले को सुलझाने में बिहार पुलिस सफल नहीं हो पाई.
नाम न प्रकाशित करने पर एक पूर्व पुलिस अधिकारी कहते हैं, “यह विफलता इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि इस मामले में चित्रगुप्त नगर थाना की प्रभारी से लेकर विनय कुमार जैसे डीजीपी स्तर के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल रहे. यहां काबिल और अनुभवी अफसरों की फौज है. राजधानी का मामला है और अपराध की छानबीन के लिए हर तरह की फॉरेंसिक लैब मौजूद हैं. इसके लिए विशेष जांच दस्ते (SIT) का भी गठन हुआ. फिर भी वे किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए और हार कर मामले को CBI को सौंपना पड़ा.”
बिहार सरकार के इस फैसले की आलोचना नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी की. उन्होंने कहा है, “इस फैसले ने फिर साबित कर दिया कि बिहार का प्रशासनिक ढांचा भ्रष्ट, अयोग्य, अदक्ष और अनप्रोफेशनल है, जो बलात्कार और हत्या के केस को भी नहीं सुलझा सकता. पुलिस से अधिक यह बड़बोली एनडीए सरकार के करप्ट और कंप्रोमाइज्ड तंत्र की विफलता है.”
क्या था मामला?
यह मामला जहानाबाद से आकर पटना के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली छात्रा की संदिग्ध मृत्यु से जुड़ा है. वह छह जनवरी को बेहोशी की हालत में अपने कमरे में मिली. उसे फिर अस्पताल में भर्ती कराया गया. अस्पताल में इलाज के दौरान 11 जनवरी को उसकी मौत हो गई.

मौत के बाद पहले पुलिस ने कहा कि छात्रा की मौत नींद की दवा अधिक मात्रा में खाने से हुई है. जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसके साथ हिंसक हमले के साथ यौन संबंध बनाए जाने की आशंका जताई गई थी. इसके बाद बिहार में इस मामले को लेकर आंदोलन होने लगे. मजबूरन 16 जनवरी को मामले के लिए SIT का गठन करना पड़ा. इसके बाद भी पुलिस किसी नतीजे पर नहीं पहुंच रही थी.
कहां-कहां चूकी पुलिस
इस मसले पर इंडिया टुडे ने कुछ वर्तमान और पूर्व पुलिस अधिकारियों से बातचीत की. नाम जाहिर न करने की शर्त पर इन अधिकारियों ने पुलिस जांच पर कई तरह के सवाल उठाए. इनसे कुछ-कुछ अंदाजा लगता है कि क्यों पुलिस मामले को अपने स्तर पर सुलझा नहीं पाई :
1. शुरुआत में स्थानीय पुलिस स्टेशन ने मामले की गंभीरता को नहीं समझा. सबूत जुटाने और पीड़िता का बयान लेने में लापरवाही हुई. यह जांच में विफलता की बड़ी वजह रही.
2. दरअसल स्थानीय पुलिस स्टेशन को मामले की जानकारी छह जनवरी से ही थी, मगर एफआईआर नौ जनवरी को दर्ज हुई. घटनास्थल से सबूत जुटाने में काफी देर हुई तब तक साफ सफाई में काफी सबूत नष्ट हो गए थे.
3. पीड़िता की मृत्यु 11 जनवरी को हुई. इस दौरान वह होश में भी आई. मगर पुलिस ने उसका बयान दर्ज नहीं किया. इन प्राथमिक सबूतों के अभाव में जांच मुश्किल होती चली गई.
4. थाना प्रभारी से लेकर सीनियर एसपी तक ने हड़बड़ी में बयान दिए. इससे ऐसा लगा कि पुलिस इस मामले को खुदकुशी साबित करने की हड़बड़ी में है. रेप या यौन हिंसा के एंगल पर ध्यान नहीं दिया गया.
5. 16 जनवरी को SIT का गठन जरूर हो गया. मगर वहां से भी रोज मीडिया के लिए जानकारियां लीक की जाती रहीं या उन्हें फीड किया गया.
6. SIT से मिलने वाले रोज के अपडेट से भी सामान्य लोगों के बीच भ्रम फैला, माहौल खराब हुआ और पुलिस पर बेवजह का दबाव बना.
7. इस बीच जातीय एंगल भी आ गया. कहा जाने लगा कि यह पूरा मामला एक खास जाति से संबंधित है. पीड़ित पक्ष से लेकर पुलिस के अधिकारियों तक एक ही जाति से संबंधित हैं. कहा जाने लगा कि इलाज करने वाले एक डॉक्टर दूसरी जाति के हैं, इसलिए उनको कटघरे में खड़ा किया जा रहा है.
8. इन परिस्थितियों में पुलिस अपनी शुरुआती गलतियों से उबर नहीं पाई. उसमें आत्मविश्वास की कमी नजर आई. इसलिए जांच के बाद उसने पहले पीड़ित परिवार को मनाने की कोशिश की, जब वे नहीं माने तो जांच CBI के सुपुर्द कर दी.
विधानसभा सत्र को हंगामे से बचाने के लिए आनन-फानन में किया फैसला?
यह भी कहा जा रहा है कि 2 फरवरी से बिहार विधानसभा का बजट सत्र शुरू हो रहा है. इसको हंगामे से बचाने के लिए आनन-फानन में मामले को CBI को सौंपा गया है. वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष कहते हैं, “हालांकि विधानसभा का मसला इतना महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि वहां विपक्ष काफी कमजोर है. मगर लगातार बढ़ रहे दबाव और फजीहत से बचने के लिए यह फैसला लिया गया होगा. वैसे भी CBI को ऐसे मामले को डालने का मतलब मामले को ठंडे बस्ते में डालना भर है. इससे पहले भी हम लोग मुजफ्फरपुर के नवारुणा हत्याकांड और उससे पहले पटना के ही शिल्पी-गौतम कांड का नतीजा देख चुके हैं.”
नए गृह मंत्री सम्राट चौधरी की क्षमता पर भी सवाल उठे
कहा जा रहा है कि इस मामले ने नए गृह मंत्री सम्राट चौधरी की काबिलियत पर भी सवाल खड़े किए हैं. एक लंबे अरसे के बाद बिहार में गृह विभाग BJP को मिला है. इससे पहले यह विभाग खुद नीतीश कुमार के पास था.
इस हवाले से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे और गृह विभाग भी उनके पास था, उन्होंने बहुत तत्परता से अपराध नियंत्रित किया था. उस दौर में हाई प्रोफाइल अपराधों में काफी कमी आई थी. इसी वजह से राज्य की महिलाओं में बाहर निकलने की हिम्मत आई. छोटे-छोटे गांवों से लोगों ने अपनी बच्चियों को अकेले पटना भेजना शुरू किया, ताकि वे पढ़ाई कर सकें. मगर सम्राट चौधरी अब तक कोई प्रभाव छोड़ने में सफल नहीं नजर आ रहे. उनमें काबिलियत और अपराध नियंत्रण को लेकर इनोवेशन की कमी दिख रही है. जबकि उनकी टीम में अच्छे अधिकारी हैं. इस घटना के बाद अब अभिभावकों में भी भरोसे की कमी देखी जा रही है. यह आशंका पैदा हो रही है कि पिछले बीस सालों में आधी आबादी को निर्भय बनाने में जो मेहनत की गई. वह कहीं जाया न चली जाए.”

