उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा के बाद जिस एक नाम ने सबसे अधिक राजनीतिक चर्चा पैदा की, वह रक्षा मंत्री और बीजेपी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में शामिल राजनाथ सिंह के छोटे बेटे नीरज सिंह का है.
46 सदस्यीय टीम में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया जाना केवल एक संगठनात्मक नियुक्ति नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे बीजेपी की भविष्य की राजनीतिक रणनीति और उत्तर प्रदेश में नेतृत्व की अगली पीढ़ी को तैयार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है.
नीरज परिवार के तीसरे सदस्य हैं जो सक्रिय राजनीति में आए हैं. उनके बड़े भाई, पंकज सिंह, नोएडा से बीजेपी विधायक हैं और पार्टी की पिछली उत्तर प्रदेश इकाई में उपाध्यक्ष रह चुके हैं.
44 वर्षीय नीरज सिंह पहली बार किसी बड़े संगठनात्मक पद पर पहुंचे हैं. इससे पहले वे न तो विधायक रहे, न सांसद और न ही बीजेपी के जिला या प्रदेश स्तर के किसी महत्वपूर्ण पद पर रहे. इसके बावजूद लखनऊ की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बढ़ता रहा. पार्टी के भीतर उन्हें लंबे समय से राजनाथ सिंह के "अनौपचारिक राजनीतिक प्रतिनिधि" के रूप में देखा जाता रहा है.
जब भी राजनाथ सिंह दिल्ली में व्यस्त रहते, तब स्थानीय संगठन, प्रशासन और आम लोगों के बीच संवाद बनाए रखने का काम अक्सर नीरज सिंह करते दिखाई देते थे. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "लखनऊ में राजनाथ सिंह के आधिकारिक प्रतिनिधि भले ही पूर्व आइएएस अधिकारी दिवाकर त्रिपाठी हों, लेकिन कार्यकर्ताओं, स्थानीय जनता और जिला प्रशासन के बीच यदि किसी का सबसे अधिक संपर्क रहा है तो वह नीरज सिंह का रहा है. कई वर्षों से वे बिना किसी पद के संगठन का चेहरा बने हुए थे."
नीरज सिंह की राजनीतिक यात्रा वर्ष 2002 से शुरू मानी जाती है. उस समय राजनाथ सिंह बाराबंकी जिले की हैदरगढ़ विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे थे; परिवार के सदस्य होने के नाते नीरज चुनाव प्रचार में उतरे, लेकिन इसके बाद उन्होंने राजनीति को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रखा. पार्टी नेताओं के अनुसार 2008 के बाद उन्होंने पूरी तरह संगठनात्मक राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू की.
गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, नोएडा, वाराणसी, चंदौली और बाद में लखनऊ जैसे क्षेत्रों में उन्होंने बूथ प्रबंधन, सदस्यता अभियान, जनसंपर्क और चुनावी रणनीति पर लगातार काम किया. वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में नीरज सिंह ने राजनाथ सिंह के चुनाव कैंपेन को मैनेज करने और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल बिठाने में मदद की थी. बीजेपी के सदस्यता अभियान में उनका प्रदर्शन संगठन के भीतर लंबे समय तक चर्चा का विषय रहा.
पार्टी नेताओं के मुताबिक उन्होंने सदस्यता अभियान में हजारों नए सदस्यों को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 'वॉलंटियर फॉर नमो' अभियान के दौरान गाजियाबाद में टोल-फ्री आधारित मॉडल तैयार कर लगभग 2.72 लाख लोगों को जोड़ने का दावा किया गया. बाद में नमो ऐप और विकसित भारत एंबेसडर अभियान में भी उन्होंने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें सम्मानित किया था. संगठन के कई
पदाधिकारी इसे उनकी मेहनत और तकनीकी समझ का प्रमाण बताते हैं. एक प्रदेश पदाधिकारी कहते हैं, "नीरज सिंह ने कभी केवल अपने पिता के नाम पर राजनीति नहीं की. उन्होंने सदस्यता अभियान से लेकर बूथ स्तर तक घंटों काम किया. आज जो पद मिला है, उसके पीछे दो दशक का संगठनात्मक अनुभव है."
हालांकि, बीजेपी के भीतर भी यह स्वीकार किया जाता है कि नीरज सिंह की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत लखनऊ रही है. 2014 में जब राजनाथ सिंह गाजियाबाद छोड़कर लखनऊ से लोकसभा चुनाव लड़ने आए, उसी समय नीरज भी पूरी तरह लखनऊ की राजनीति में सक्रिय हो गए. पार्टी के एक नेता बताते हैं कि पिछले एक दशक में लखनऊ का शायद ही कोई बड़ा राजनीतिक, सामाजिक या संगठनात्मक कार्यक्रम रहा हो, जिसमें नीरज सिंह मौजूद न रहे हों.
चाहे कार्यकर्ताओं की बैठक हो, किसी परिवार की व्यक्तिगत समस्या हो या किसी सामाजिक संस्था का आयोजन, वे लगातार अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे. बीते हफ्ते अलीगंज अग्निकांड के बाद उनकी सक्रियता भी काफी चर्चा में रही. हादसे में 15 लोगों की मौत के बाद वे ट्रॉमा सेंटर पहुंचे, पीड़ित परिवारों से मिले और अंतिम संस्कार तक में शामिल हुए. ऐसे अवसरों पर उनकी मौजूदगी ने आम लोगों के बीच उनकी अलग पहचान बनाई.
राजनीतिक सक्रियता के साथ-साथ नीरज सिंह ने सामाजिक कार्यक्रमों के जरिए भी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश की. पिछले सात वर्षों से अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में स्वास्थ्य मेले का आयोजन, रोजगार मेले, जरूरतमंदों को साइकिल और बैसाखी जैसी सहायता सामग्री उपलब्ध कराना और गरीब मरीजों के इलाज की व्यवस्था जैसे कार्यक्रम उनकी पहचान का हिस्सा बन गए हैं.
समर्थकों का दावा है कि इन्हीं गतिविधियों के कारण युवाओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के बीच भी उनकी अच्छी स्वीकार्यता बनी. उनके करीबी नेताओं का कहना है कि नीरज सिंह की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी चुनाव लड़ने की जल्दी नहीं दिखाई. संगठन के लिए काम करते रहे और लगातार कार्यकर्ताओं के बीच मौजूद रहे. बीजेपी के एक नेता अंकुर तिवारी कहते हैं, "आज लखनऊ में यदि किसी कार्यकर्ता को संगठन से जुड़ा कोई काम होता है तो वह सबसे पहले नीरज सिंह तक पहुंचने की कोशिश करता है. यह भरोसा वर्षों में बना है."
लेकिन हर कोई इस नियुक्ति को केवल संगठनात्मक मेहनत का परिणाम नहीं मानता. विपक्ष और भाजपा के कुछ असंतुष्ट नेता इसे परिवारवाद के नजरिए से भी देख रहे हैं. समाजवादी पार्टी के एक नेता आशुतोष तिवारी का कहना है, "बीजेपी वर्षों से परिवारवाद के खिलाफ राजनीति करती रही है, लेकिन जब बड़े नेताओं के बेटे संगठन में आते हैं तो उसके लिए अलग तर्क दिए जाते हैं. यदि यही काम किसी दूसरे दल में होता तो बीजेपी सबसे पहले सवाल उठाती."
कांग्रेस के नेता अमित राय ने भी इसी मुद्दे पर निशाना साधते हुए कहा कि बीजेपी में भी अब राजनीतिक परिवारों को प्राथमिकता मिलने लगी है. उनके अनुसार यदि कोई सामान्य कार्यकर्ता दो दशक तक काम करे तो भी उसे सीधे प्रदेश उपाध्यक्ष जैसा पद नहीं मिलता. इन आरोपों का जवाब बीजेपी के भीतर अलग तरीके से दिया जा रहा है. एक वरिष्ठ पदाधिकारी कहते हैं, "वंशवाद तब होता है जब बिना काम किए केवल परिवार के आधार पर पद मिल जाए. नीरज सिंह पिछले 24 वर्षों से लगातार संगठन के लिए काम कर रहे हैं. यदि कोई व्यक्ति दो दशक तक मैदान में सक्रिय रहे और उसके बाद उसे जिम्मेदारी मिले तो उसे परिवारवाद कहना उचित नहीं होगा."
नीरज सिंह ने भी अपनी नियुक्ति के बाद सोशल मीडिया पर वर्ष 2002 के चुनाव प्रचार की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि उनका राजनीतिक सफर 24 वर्ष पुराना है और वे उसी निष्ठा, ऊर्जा और समर्पण के साथ संगठन के लिए काम करते रहेंगे. इसे भी बीजेपी नेताओं ने इस संदेश के रूप में देखा कि वे अपनी पहचान केवल राजनाथ सिंह के बेटे के रूप में नहीं बल्कि संगठन के कार्यकर्ता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं.
उनकी व्यक्तिगत पृष्ठभूमि भी उन्हें अन्य नेताओं से कुछ अलग बनाती है. उन्होंने ब्रिटेन की लीड्स यूनिवर्सिटी से स्नातक की पढ़ाई की है. खेलों में भी उनकी रुचि रही है और वर्ष 2023 में उन्होंने ऑल इंडिया मास्टर्स बैडमिंटन चैंपियनशिप में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व किया था. राजनीति और सामाजिक गतिविधियों के साथ खेलों से जुड़ाव उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा रहा है.
बीजेपी के भीतर अब सबसे अधिक चर्चा उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर है. राजनाथ सिंह लंबे समय से लखनऊ से सांसद हैं, जबकि उनके बड़े भाई पंकज सिंह नोएडा से विधायक हैं और संगठन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं.
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि नीरज सिंह की अगली मंजिल क्या होगी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल उन्हें संगठन में बड़ी भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा. लेकिन यदि भविष्य में राजनाथ सिंह सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बनाते हैं तो क्या लखनऊ लोकसभा सीट पर नीरज सिंह स्वाभाविक दावेदार बन सकते हैं. इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है.

