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फिर विवादों में क्यों घिरीं मुलायम परिवार की बहू अपर्णा यादव

KGMU में हंगामे से लेकर महिला आयोग की सक्रिय भूमिका तक, मुलायम परिवार की बहू अपर्णा यादव एक बार फिर विवादों में हैं

Aparna yadav with CM Yogi Adityanath
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ अपर्णा यादव (फाइल फोटो)
अपडेटेड 12 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव उत्तर प्रदेश की उन राजनीतिक शख्सियतों में शामिल हो चुकी हैं, जिनका नाम आते ही समर्थन और विरोध दोनों एक साथ खड़े दिखाई देते हैं. हालिया KGMU विवाद ने एक बार फिर उन्हें सुर्खियों के केंद्र में ला दिया है. 

लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में महिला आयोग की उपाध्यक्ष के तौर पर उनका अचानक पहुंचना, प्रशासन से टकराव, समर्थकों का हंगामा और फिर एफआईआर की तैयारी, इस पूरे घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े किए हैं. सवाल सिर्फ KGMU की जांच प्रक्रिया पर नहीं हैं, बल्कि खुद अपर्णा यादव की भूमिका, उनके राजनीतिक इरादों और उनकी कार्यशैली पर भी हैं.

KGMU विवाद और अपर्णा यादव की भूमिका

9 जनवरी को KGMU उस वक्त विवादों में घिर गया, जब महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव बिना पूर्व सूचना अपने समर्थकों के साथ विश्वविद्यालय पहुंचीं. मामला दिसंबर 2025 में सामने आए कथित लव जिहाद, जबरन धर्मांतरण और महिला डॉक्टर के उत्पीड़न से जुड़ा था. अपर्णा का कहना था कि विशाखा कमेटी की जांच निष्पक्ष नहीं है और पीड़िता पर बयान बदलने का दबाव डाला गया. 

अपर्णा यादव ने सीधे तौर पर KGMU प्रशासन और कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद पर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि न तो उन्हें सहयोग मिला और न ही औपचारिक बातचीत का अवसर. इसके उलट, विश्वविद्यालय प्रशासन का दावा है कि उन्हें अपर्णा के दौरे की कोई जानकारी नहीं दी गई थी और अचानक 25 से 30 समर्थकों के साथ चैंबर में घुसने की कोशिश ने सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी. 

इस टकराव ने जल्द ही राजनीतिक रंग ले लिया. जहां अपर्णा यादव ने इसे महिला अधिकारों और न्याय से जोड़कर देखा, वहीं KGMU प्रशासन ने इसे दबाव बनाने और संस्थान की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश बताया. कुलपति और कर्मचारियों की ओर से पीस मार्च और कार्य बहिष्कार की चेतावनी ने विवाद को और गंभीर बना दिया.

महिला आयोग बनाम विश्वविद्यालय

राज्य महिला आयोग के संवैधानिक दायित्व और किसी विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारों के बीच की यह टकराहट नई नहीं है, लेकिन KGMU प्रकरण में जिस तरह से दोनों पक्ष आमने-सामने आए, उसने व्यवस्था की सीमाओं और जिम्मेदारियों पर बहस छेड़ दी है. अपर्णा यादव का तर्क है कि जब महिला उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण जैसे गंभीर आरोप हों, तो आयोग का हस्तक्षेप जरूरी है. 

दूसरी ओर, KGMU प्रवक्ता डॉ. केके सिंह का कहना है कि जांच पहले से चल रही थी और आरोपी डॉक्टर के खिलाफ बर्खास्तगी की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है. ऐसे में विश्वविद्यालय पर आरोप लगाना और बिना सूचना परिसर में हंगामा करना अनुचित है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह टकराव सिर्फ एक प्रशासनिक विवाद नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक संदेश भी छिपा है. वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अमित राय कहते हैं, “अपर्णा यादव ने इस मुद्दे को सिर्फ एक केस के तौर पर नहीं, बल्कि एक बड़े नैरेटिव के रूप में पेश किया है. यह नैरेटिव उन्हें एक मुखर और आक्रामक नेता के रूप में स्थापित करता है.”

समाजवादी परिवार से BJP तक का सफर

अपर्णा यादव की पहचान लंबे समय तक समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू के तौर पर रही. वर्ष 2011 में प्रतीक यादव से शादी के बाद वे यादव परिवार का हिस्सा बनीं और राजनीति के केंद्र में आ गईं. UK की मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल रिलेशन्स और पॉलिटिक्स में पोस्टग्रेजुएट और लखनऊ के भातखंडे संगीत संस्थान से शास्त्रीय और अर्ध-शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित गायिका, अपर्णा यादव राजनीति में आने से पहले सैफई महोत्सव और लखनऊ महोत्सव में नियमित रूप से परफॉर्म करती थीं. 

अपर्णा ने 2014 में मुलायम की मौजूदगी में SP की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पहली बार राजनीतिक मंच पर कदम रखा. उस समय UP में SP की सरकार थी. 2017 में, SP ने उन्हें लखनऊ कैंट विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया. SP के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, उनकी उम्मीदवारी मुलायम के दखल का नतीजा थी, जिन्होंने उस चुनाव में उनके लिए प्रचार भी किया था. हालांकि, एक ऐसे चुनाव में जिसमें BJP पूरी बहुमत के साथ सत्ता में आई, अपर्णा अपनी सीट BJP की रीता बहुगुणा जोशी से करीब 34,000 वोटों से हार गईं. 

इसके बाद, उन्हें धीरे-धीरे SP में किनारे कर दिया गया, खासकर जब बीमार मुलायम सिंह यादव पीछे हट गए. SP में रहते हुए, अपर्णा महिलाओं के लिए एक सोशल ऑर्गनाइज़ेशन चलाती थीं, लेकिन अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को लेकर अक्सर अपने परिवार से उनकी अनबन रहती थी. जल्द ही, उन्होंने योगी आदित्यनाथ सरकार की कुछ नीतियों का खुलकर समर्थन करना शुरू कर दिया और साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उठाए गए कदमों की भी तारीफ़ की, जिससे उस समय यह अटकलें लगने लगीं कि वे BJP में शामिल हो सकती हैं. 

2022 के विधानसभा चुनावों से पहले, अपर्णा ने पार्टी बदल ली और कहा कि वे मोदी के नेतृत्व और BJP की नीतियों से प्रभावित हैं. BJP में शामिल होने के बाद अपर्णा यादव को वह राजनीतिक स्पेस नहीं मिला, जिसकी उन्हें उम्मीद थी. न तो 2022 के विधानसभा चुनाव में और न ही 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें टिकट दिया गया. 

पार्टी के भीतर यह चर्चा आम रही कि अपर्णा की राजनीतिक पहचान अभी भी ‘यादव परिवार की बहू’ तक सीमित है. सितंबर 2024 में राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष की नियुक्ति को कई लोग उनके लिए सांत्वना पुरस्कार मानते हैं. हालांकि अपर्णा के करीबियों का कहना है कि यह पद उनके लिए एक मंच है, जिससे वे महिला मुद्दों पर अपनी पकड़ मजबूत कर सकती हैं. एक BJP नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, “अपर्णा महत्वाकांक्षी हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है. लेकिन पार्टी में जगह बनाने के लिए सिर्फ आक्रामकता काफी नहीं होती. संगठनात्मक संतुलन भी जरूरी है.”

KGMU विवाद और राजनीतिक महत्वाकांक्षा

KGMU प्रकरण को अपर्णा यादव के राजनीतिक भविष्य से जोड़कर देखा जा रहा है. इस पूरे घटनाक्रम में उन्होंने खुद को एक ऐसी नेता के रूप में पेश किया है, जो महिला सुरक्षा और धर्मांतरण जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बिना झिझक टकराव लेने को तैयार हैं. राजनीतिक विश्लेषक प्रो. सीमा चौधरी मानती हैं, “अपर्णा यादव की रणनीति साफ दिखती है. वह ऐसे मुद्दे उठा रही हैं, जो BJP के कोर वोटर बेस से मेल खाते हैं. इससे वह खुद को पार्टी के लिए उपयोगी साबित करना चाहती हैं.” 

हालांकि आलोचक इसे अवसरवाद भी कहते हैं. समाजवादी पार्टी से जुड़े एक नेता का कहना है कि अपर्णा का यह रुख सिद्धांत से ज्यादा पहचान बनाने की कोशिश है. उनके मुताबिक, “वे हर उस मुद्दे पर मुखर दिखना चाहती हैं, जिससे मीडिया में जगह मिले.” KGMU विवाद अपर्णा यादव के लिए पहला मौका नहीं है, जब वह विवादों में घिरी हों. समाजवादी पार्टी में रहते हुए भी वह कई बार पार्टी लाइन से अलग बयान देती रही हैं. BJP में आने के बाद भी उनकी बयानबाजी और सक्रियता अक्सर सुर्खियां बनती है. समर्थक उन्हें एक साहसी और स्वतंत्र सोच वाली नेता बताते हैं, जबकि आलोचक कहते हैं कि वह हर मुद्दे को राजनीतिक अवसर में बदल देती हैं. सच शायद इन दोनों के बीच कहीं है.

आगे की राह

KGMU विवाद ने यह साफ कर दिया है कि अपर्णा यादव टकराव से पीछे हटने वाली नेता नहीं हैं. सवाल यह है कि क्या यह टकराव उन्हें राजनीतिक तौर पर मजबूत करेगा या पार्टी के भीतर असहजता बढ़ाएगा. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले अपर्णा यादव खुद को प्रासंगिक बनाए रखने की पूरी कोशिश करेंगी. महिला आयोग का पद उनके लिए एक औजार है, जिससे वह लगातार मुद्दे उठाकर चर्चा में रह सकती हैं. 

फिलहाल, KGMU प्रकरण की जांच और कानूनी प्रक्रिया अपने रास्ते पर है. लेकिन राजनीतिक तौर पर इस विवाद ने अपर्णा यादव को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है. यह वही जगह है, जहां वह रहना चाहती हैं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विवाद उनकी राजनीतिक उड़ान का मंच बनता है या उनके लिए नई मुश्किलें खड़ी करता है.

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