मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों ही पड़ोसी राज्यों में विलुप्त हो चुके वन्य प्राणियों को फिर से बसाया जा रहा है. चीतों के बाद अब प्रदेश में गैंडे, जंगली भैंसे और किंग कोबरा को लाया जा रहा है. असम से लाकर इन्हें भोपाल के वन विहार में रखा जाएगा.
इनके बदले मध्य प्रदेश से टाइगर और मगरमच्छ असम जाएंगे. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने 15 जनवरी को गुवाहाटी प्रवास के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ वन्य जीवों के अदला-बदली को लेकर चर्चा की है.
25 साल पहले मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ राज्य के अलग होने के बाद राज्य में कई प्रमुख वन्यजीवों की संख्या में भारी कमी आई थी. इनमें गैंडा, जंगली भैंसा प्रमुख हैं. 2000 में जब मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग से छत्तीसगढ़ राज्य बना, तो जंगली भैंसों की आबादी वाला क्षेत्र नए राज्य छत्तीसगढ़ को मिल गया.
अब, देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट के आधार पर मध्य प्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में इन भैंसों को फिर लाने की कोशिश हो रही है. ऐतिहासिक अभिलेखों जैसे ब्रिटिश वन्यजीव संरक्षणवादी, लेखक डनबर ब्रैंडर और कैप्टन जेम्स फोर्साइथ की किताबों में हलोन घाटी में जंगली भैंसों की आबादी का जिक्र मिलता है. अब यह इलाका कान्हा राष्ट्रीय उद्यान का हिस्सा है.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा से मुलाकात की और दोनों राज्यों ने वन्यजीवों की अदला-बदली के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए. मध्य प्रदेश के वन विभाग के मुताबिक, मध्य प्रदेश असम को दो बाघ देगा और बदले में काजीरंगा से 50 जंगली भैंसें, कोबरा सांप और दो गैंडे अपने यहां ले जाएगा.
जंगली भैंसों का पहला जत्था फरवरी-मार्च में मध्य प्रदेश पहुंचेगा. मध्य प्रदेश से एक टीम असम का दौरा करेगी ताकि भैंसों को पकड़ने के बाद असम से पश्चिम बंगाल, ओडिशा और छत्तीसगढ़ होते हुए मध्य प्रदेश तक लाए जाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सड़क मार्ग का जायजा लिया जा सके.
मध्य प्रदेश में कम हो रही हाथी की संख्या को लेकर एक अच्छी खबर ये है कि यहां पड़ोसी राज्यों से आकर कुछ हाथियों ने बांधवगढ़ में अपना आवास बनाया है.
पिछले पांच वर्षों में हाथियों का एक झुंड दूसरे राज्यों से आकर संजय राष्ट्रीय उद्यान और बांधवगढ़ में बस गया है. जंगली भैंसों को मध्य प्रदेश में संकटग्रस्त प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया था.
असम में मुख्य रूप से लगभग 4,000 जानवर ही बचे हैं. असम में मिली भैंस की पहचान पूर्वोत्तर की जंगली भैंस के रूप में की गई है, जो मध्य भारतीय जंगली भैंस से काफी मिलती-जुलती है.
असम से लाए जाने वाले इन भैंसों को कान्हा के सुपखर पर्वतमाला की हलोन घाटी में छोड़ा जाएगा. यहां 120 हेक्टेयर का एक बाड़ा तैयार किया जा रहा है, जहां भैंसों को जंगल में छोड़ने से पहले रखा जाएगा. मध्य प्रदेश के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एल. कृष्णमूर्ति कहते हैं, "हलोन घाटी में लंबी घास है और जंगली भैंसों की उपस्थिति से घास के मैदानों के संरक्षण में मदद मिलेगी."
मध्य प्रदेश ने उन क्षेत्रों में वन्यजीव प्रजातियों की संख्या दोबारा बढ़ाने में अच्छी सफलता हासिल की है, जो विलुप्त हो गई थीं. इस दिशा में खास भूमिका पूर्व मुख्य वन्यजीव वार्डन एच.एस. पाबला ने निभाई. उन्होंने 2009 में पन्ना में बाघों की संख्या बढ़ाने से शुरुआत की, उसके बाद कान्हा से सतपुड़ा तक में हिरणों की संख्या बढ़ाई गई.
कान्हा से बांधवगढ़ तक गौर (बाइसन) और हाल ही में अफ्रीका से कुनो में चीता को लाकर दोबारा बसाया जा रहा है. हाल ही में हेलीकॉप्टर की सहायता से राज्य के अलग-अलग हिस्सों से काले हिरण और नीलगाय को पकड़ा गया और उन्हें गांधी सागर अभयारण्य में भेजा गया , जिसे चीतों के दूसरे घर के रूप में विकसित किया जा रहा है.
हालांकि, जंगली भैंसों को दोबारा राज्य में बसाने के रास्ते में कई चुनौतियां भी आ सकती हैं. सबसे बड़ा खतरा पालतू भैंसों से है, जो खतरनाक बीमारियों को फैला सकती हैं. इससे जंगली भैंसों की आबादी खत्म हो सकती है.
यही कारण है कि कान्हा क्षेत्र में टीकाकरण कार्यक्रम और पालतू भैंसों को वहां से निकालने के उपाय करने होंगे. छत्तीसगढ़ ने भले ही जंगली भैंस को अपना राज्य पशु घोषित किया है, लेकिन जंगली भैंसों की आबादी बढ़ाने के प्रयासों में राज्य का उतार-चढ़ाव भरा अनुभव रहा है.
छत्तीसगढ़ में जंगली भैंसों के तीन प्रमुख क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं. इनमें ओडिशा सीमा पर उदंती सीतानदी, पामेड अभयारण्य और बस्तर के बीजापुर में इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान हैं. राज्य ने जंगली भैंसों के संरक्षण के लिए क्लोनिंग सहित कई प्रयास किए हैं. छत्तीसगढ़ में जंगली भैंसों को उनके प्राकृतिक आवास में वापस लाने के प्रयासों को कुछ हद तक सफलता मिली है.
2020 में छत्तीसगढ़ को असम से चार जंगली भैंसें मिली, जिन्हें बरनावापारा वन्यजीव अभ्यारण्य में एक बाड़े में रखा गया था. अब इनकी संख्या बढ़कर 11 हो गई है. छत्तीसगढ़ के मुख्य वन्यजीव वार्डन अरुण पांडे ने कहा, "हम बरनावापारा में जंगली भैंसों की संख्या बढ़ाने के लिए तीन मादा भैंसों को उदंती में स्थानांतरित करने की योजना बना रहे हैं." उन्होंने आगे कहा कि यह परियोजना सफल रही है और बरनावापारा में मौजूद जंगली भैंसों को जल्द ही जंगल में छोड़ दिया जाएगा.
कुछ वन्यजीव लेखकों ने मध्य प्रदेश में पूर्वोत्तर जंगली भैंस को दोबारा बसाने को लेकर कुछ चिंता जरूर जाहिर की है. वन्यजीव इतिहासकार रजा काज़मी कहते हैं, “माओवाद के पतन के साथ इन राज्यों में भारतीय जंगली भैंस के संरक्षण की दिशा में काम करने का यह सुनहरा अवसर है. असम से पूर्वोत्तर जंगली भैंस लाने के बजाय मध्य प्रदेश को बस्तर से मध्य भारतीय किस्म की कुछ भैंसें लानी चाहिए थीं. असम की भैंस और छत्तीसगढ़ के सीतानदी उदंती अभ्यारण्य में पाई जाने वाली भैंसों की नस्ल में घरेलू भैंसों का भारी मिश्रण बताया जाता है.”

