उत्तर प्रदेश के शहरों और कस्बों में बंदरों का बढ़ता आतंक अब महज एक शहरी परेशानी नहीं रहा, बल्कि यह सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका तीनों के लिए एक जटिल नीतिगत संकट बन चुका है. सड़क पर चलते लोगों पर अचानक हमले, घरों की छतों और बालकनियों से सामान उठा ले जाना, स्कूलों और अस्पतालों में दहशत, खेतों और बागानों में फसल नुकसान.
ऐसी घटनाएं अब प्रयागराज, लखनऊ या आगरा तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कौशांबी, सीतापुर, बरेली और छोटे कस्बों तक फैल चुकी हैं. इसी पृष्ठभूमि में इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने दाखिल जनहित याचिका ने सरकार की तैयारियों और आपसी समन्वय की कमी को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है.
इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र शामिल हैं, ने 13 जनवरी को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दिए गए उस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लिया, जिसमें कहा गया कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग एक महीने के भीतर बंदरों की समस्या से निपटने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार करेगा. अदालत ने इस PIL को 17 फरवरी, 2026 के लिए सूचीबद्ध किया है, यानी सरकार के पास ठोस रोडमैप पेश करने के लिए अब समय बेहद सीमित है.
यह मामला सितंबर 2025 से ही हाई कोर्ट के रडार पर है, जब सामाजिक कार्यकर्ता विनीत शर्मा और प्राजक्ता सिंघल ने राज्यभर में बढ़ते मानव-बंदर संघर्ष को लेकर याचिका दाखिल की थी. याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट के सामने न सिर्फ अखबारों की रिपोर्ट्स रखीं, बल्कि यह भी तर्क दिया कि बंदरों की बढ़ती आबादी और भोजन की कमी उन्हें आक्रामक बना रही है. एक तरफ इंसानों की सुरक्षा और जीवन का अधिकार है, तो दूसरी तरफ बंदरों के भोजन, भूख से मुक्ति और क्रूर परिस्थितियों से बचाव जैसे पशु अधिकारों का सवाल. याचिका का मूल तर्क यही है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत इन दोनों के बीच संतुलन बनाना राज्य की जिम्मेदारी है.
हालांकि, जमीन पर स्थिति इससे कहीं अधिक उलझी हुई है. समस्या का सबसे बड़ा कारण है 2023 में हुआ वह कानूनी बदलाव, जिसने बंदरों के प्रबंधन की जिम्मेदारी को लेकर प्रशासनिक शून्य पैदा कर दिया. 2023 तक बंदर केंद्रीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की अनुसूची में शामिल थे, यानी उनका संरक्षण और प्रबंधन सीधे तौर पर वन विभाग के दायरे में आता था. उसी साल बंदरों को अनुसूची से हटा दिया गया. नतीजा यह हुआ कि वन विभाग ने यह कहना शुरू कर दिया कि वे अब बंदर प्रबंधन से जुड़े किसी भी निर्देश को लागू करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य नहीं हैं.
यहीं से शुरू हुआ विभागों के बीच टकराव. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अनुसूची से हटाए जाने के बाद बंदरों का प्रबंधन नगर निगम और नगर पालिकाओं के जिम्मे आ गया है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में पशु नियंत्रण का अधिकार स्थानीय निकाय कानूनों के तहत उन्हीं के पास है. लेकिन शहरी विकास विभाग के अधिकारी इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं. उनका तर्क है कि बंदरों को पकड़ना, उन्हें बेहोश करना, सुरक्षित तरीके से स्थानांतरित करना और फिर पुनर्वास करना एक तकनीकी और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके लिए प्रशिक्षित कर्मी, विशेष उपकरण और प्रोटोकॉल चाहिए. यह सब उनके पास नहीं है.
इस नौकरशाही गतिरोध की झलक हाल ही में तब देखने को मिली, जब मुख्य सचिव एसपी गोयल ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई. बैठक में वन विभाग, शहरी विकास विभाग और अन्य संबंधित इकाइयों के अधिकारी मौजूद थे, लेकिन नतीजा शून्य रहा. दोनों विभागों ने साफ कहा कि हाई कोर्ट की PIL में जिस तरह बंदरों को पकड़ने, स्थानांतरित करने, पुनर्वास करने और खिलाने की मांग की गई है, उसकी जिम्मेदारी उनकी नहीं बनती. बैठक बिना किसी ठोस फैसले के खत्म हो गई, जबकि अदालत में सुनवाई की तारीख नजदीक आती जा रही है.
सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीष गोयल ने हाई कोर्ट में 8 जनवरी, 2026 की एक अहम बैठक का विवरण पेश किया, जिसमें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग, लखनऊ नगर निगम और पीपल फॉर एनिमल्स जैसे संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे. इस बैठक में यह तय किया गया कि बंदरों के खतरे को मैनेज करने की नोडल जिम्मेदारी पर्यावरण विभाग की होगी और जरूरत पड़ने पर अन्य विभाग उसका सहयोग करेंगे. इसी आधार पर कोर्ट से कार्य योजना पेश करने के लिए समय मांगा गया.
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय पशु कल्याण बोर्ड ने भी बंदरों की समस्या से निपटने के लिए एक संशोधित अस्थायी कार्य योजना कोर्ट के सामने रखी है. हाई कोर्ट ने निर्देश दिया है कि पर्यावरण विभाग इस प्रस्ताव पर भी गंभीरता से विचार करे. यह संकेत है कि अदालत अब सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस और व्यावहारिक समाधान देखना चाहती है.
इस पूरे विवाद में एक और अहम पहलू है बंदरों की भूख और उनके प्राकृतिक आवास का सिकुड़ना. याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जंगलों के कटाव और शहरी विस्तार के कारण बंदरों के लिए भोजन के पारंपरिक स्रोत खत्म होते जा रहे हैं. नतीजतन वे शहरों की ओर रुख कर रहे हैं, जहां कचरे, घरों और बाजारों में उन्हें आसानी से खाने को कुछ न कुछ मिल जाता है. लेकिन यह भोजन असंतुलित होता है और अक्सर इंसानों के साथ टकराव को जन्म देता है. कई मामलों में लोग डर या गुस्से में बंदरों के साथ क्रूर व्यवहार भी करते हैं, जो पशु क्रूरता की श्रेणी में आता है.
वन विभाग की स्थिति भी पूरी तरह आसान नहीं है. विभाग के अधिकारी निजी बातचीत में कहते हैं कि जब तक कानून में संशोधन कर बंदरों को दोबारा वन्यजीव अनुसूची में शामिल नहीं किया जाता, तब तक वे खुलकर कार्रवाई नहीं कर सकते. नवंबर में भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने बंदरों को फिर से अनुसूची में बहाल करने की सिफारिश जरूर की थी, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक अधिनियम में संशोधन नहीं किया है. वन विभाग का कहना है कि वे सिर्फ सिफारिशों के आधार पर कानूनी जिम्मेदारी नहीं ले सकते.
वहीं शहरी विकास विभाग का पलटवार है कि अगर बहाली लगभग तय है, तो वन विभाग को बदलाव की उम्मीद में जिम्मेदारी निभानी चाहिए. यह तर्क प्रशासनिक तौर पर भले व्यावहारिक लगे, लेकिन कानूनी तौर पर जोखिम भरा है. नतीजा यह है कि बंदर न तो किसी एक विभाग की प्राथमिकता हैं और न ही किसी के पास उनके लिए समग्र नीति है.
इस बीच आम जनता सबसे ज्यादा परेशान है. छोटे शहरों और कस्बों में जहां संसाधन पहले से ही सीमित हैं, वहां बंदरों का आतंक रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है. स्कूलों में बच्चों को डर है, बुजुर्ग घर से बाहर निकलने से कतराते हैं और दुकानदारों को नुकसान उठाना पड़ रहा है. कई मामलों में चोटें भी गंभीर हुई हैं, लेकिन मुआवजे और जिम्मेदारी को लेकर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.
यही वजह है कि यूपी में बंदरों का आतंक सरकार के लिए सिरदर्द बन गया है. यह सिर्फ कानून और विभागों का सवाल नहीं है, बल्कि शासन की उस क्षमता की परीक्षा भी है, जिसमें वह बदलते हालात के मुताबिक नीतियां बना सके.
हाई कोर्ट की अगली सुनवाई से पहले सरकार को यह तय करना होगा कि वह सिर्फ जिम्मेदारी तय करने की कवायद में उलझी रहेगी या फिर जमीन पर असर दिखाने वाली कार्य योजना लेकर आएगी. बंदरों और इंसानों के बीच बढ़ता टकराव अब उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां टालमटोल की गुंजाइश बहुत कम बची है.

