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ओडिशा की राजनीति के दिग्गज नवीन पटनायक को कैसे मात दे रहे सीएम मोहन माझी?

पहले उप-चुनाव, फिर राज्यसभा चुनाव में BJP को जोरदार जीत दिलाकर मोहन चरण माझी ने केंद्र की तरफ से 'नियुक्त' मुख्यमंत्री की अपनी छवि को तेजी से पीछे छोड़ा है

Mohan Charan Majhi with Rajyasabha winner in Odisha
राज्यसभा चुनाव जीतने वाले BJP उम्मीदवारों के साथ CM मोहन चरण माझी
अपडेटेड 17 मार्च , 2026

4 जून 2024 को जब लोकसभा के साथ ओडिशा विधानसभा चुनाव का परिणाम आया, तो ओडिशा के इतिहास में बहुत कुछ बदल चुका था. नवीन पटनायक के नेतृत्व वाले बीजू जनता दल (BJD) के 24 वर्षों के शासन को BJP ने 78 विधायकों के साथ अंत कर दिया था. राज्य को नया नेतृत्व मिलना था. चर्चा चली कि आखिर BJP का वह कौन-सा नेता होगा जिसे नवीन पटनायक की करीब ढाई दशक लंबी सत्ता हटाने के बाद राज्य की कमान दी जाएगी.

घर से लेकर एयरपोर्ट तक लोगों को लगा कि धर्मेंद्र प्रधान या फिर अश्विनी वैष्णव को सीएम बनाया जाएगा. कुछ लोगों ने संबित पात्रा और प्रताप षडंगी पर भी दांव लगाया. लेकिन जब फैसला आया तो वह बेहद चौंकाने वाला था. BJP आलाकमान ने क्योंझर के विधायक मोहन चरण माझी को राज्य के 15वें सीएम की जिम्मेदारी संभालने को कहा. विश्लेषक और विरोधी यह मानते रहे कि मोहन माझी केवल केंद्र के इशारों पर चलने वाले कठपुतली सीएम ही साबित होंगे. इसके बावजूद, मोहन माझी ने बीते समय में खुद को हर कदम पर साबित किया है.

नेतृत्व संभालने के बाद राजनीतिक रूप से उन्होंने अब तक कुल दो परीक्षाएं दी हैं. पहली परीक्षा अक्टूबर 2025 में शुरू हुई, जब नुआपाड़ा विधानसभा क्षेत्र से BJD के विधायक राजेंद्र ढोलकिया का निधन हुआ और यहां उप-चुनाव की घोषणा हुई. पहली ढाई चाल चलते हुए मोहन माझी ने BJD के सबसे वफादारों में से एक राजेंद्र ढोलकिया के बेटे जय ढोलकिया को BJP में शामिल कराया. इसके बाद उन्हें टिकट देकर प्रत्याशी बनाया. अगली चाल चलते हुए साल 2014 के बाद नुआपाड़ा सीट पर BJP का परचम लहराया. यह जीत भी छोटी नहीं थी, बल्कि कुल 83,748 वोटों के साथ मिली. 14 नवंबर 2025 को आए परिणाम ने सीएम माझी को पहला मौका दिया, जिससे वह अपनी क्षमताओं के बारे में BJP के केंद्रीय नेतृत्व के साथ ओडिशा के आम लोगों को बता सकें.

अब चार सीटों पर हुए राज्यसभा चुनाव में भी BJD के आठ विधायकों को बागी बनाकर अपने प्रत्याशी दिलीप राय को जिताने के बाद उन्होंने पूरे अंकों के साथ दूसरी परीक्षा पास कर ली है. शतरंज के इस खेल में एक बार फिर उन्होंने ढाई चाल का दांव चला. बिसात बिछने के दौरान वे जानते थे कि दो सीटें BJP की हैं, एक सीट BJD की और चौथी पर जंग होगी. यहां उन्होंने पहली चाल चलते हुए BJD और कांग्रेस के संयुक्त प्रत्याशी की घोषणा का इंतजार किया. BJD ने प्रसिद्ध यूरोलॉजिस्ट डॉ. दत्तेश्वर होता को अपना उम्मीदवार बनाया और कांग्रेस ने उन्हें समर्थन दे दिया.

दूसरी चाल चलते हुए केंद्रीय नेतृत्व से मशवरे के बाद मोहन माझी ने दिलीप राय को सामने रख दिया. BJP नेता होने से पहले वे BJD के संस्थापक सदस्य रह चुके हैं. दिलीप राय प्रसिद्ध होटल व्यवसायी और करोड़पति नेता हैं, ऐसे में साम-दाम की व्यवस्था वे कर सकते थे. माझी को दंड के बारे में सोचना नहीं था, जबकि भेद के लिए BJD और कांग्रेस के नाराज विधायकों पर पहले से नजर रखी और फिर मौका देखते ही उन्हें अपने पाले में कर लिया. इसी कड़ी में आधी चाल चलते हुए चुनाव से ठीक पांच दिन पहले BJD के पूर्व सांसद रविंद्र जेना को BJP में शामिल कराया और उनकी पत्नी व BJD विधायक सुहासिनी जेना का वोट हासिल कर लिया. परिणाम सबके सामने है. दोनों दलों के कुल 11 विधायकों ने अपनी पार्टी लाइन से बाहर जाकर BJP समर्थित प्रत्याशी को मतदान किया.

हर परीक्षा की अलग तैयारी

आखिर मोहन माझी ने पार्टी के अंदर कैसे तालमेल बिठाया? सरकार चलाने के लिए टीम को कैसे विश्वास में लिया? प्रदेश महासचिव जतिन मोहंती कहते हैं, "मोहन माझी तीन बार विधायक रह चुके हैं. वे जमीनी पॉलिटिक्स को बेहतर समझते हैं. वे पार्टी की प्रशिक्षण पद्धति का अब भी हिस्सा हैं. यही वजह है कि पार्टी और उनके बीच कोई दीवार नहीं है. दोनों एक-दूसरे को कॉम्प्लिमेंट करते हैं. इससे उनका सक्सेस स्मूथ रहा है. पार्टी कैडर निचले स्तर तक उनकी सफलता की कहानी कहने में संकोच नहीं कर रहा है. सफलता की असली कुंजी यही है."

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रवि दास कहते हैं, "नुआपाड़ा उप-चुनाव के दौरान BJD कैंडिडेट को लाने के लिए हाईकमान को मनाना मोहन माझी की पहली सफलता थी, क्योंकि जीत की गारंटी उन्होंने ली थी. यहां उन्होंने नवीन पटनायक को बड़ा झटका ही नहीं दिया, बल्कि BJD की परंपरागत सीट होने के बावजूद उन्हें संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया. जहां तक राज्यसभा चुनाव की बात है, तो यह अकेले मोहन माझी के बूते की बात नहीं थी. इसमें दिलीप राय और विजय महापात्र की बड़ी भूमिका रही. दोनों नेताओं के BJD सहित अन्य दलों में अपने व्यक्तिगत संबंध हैं. हालांकि माझी की यह भूमिका जरूर थी कि उन्होंने दिलीप राय को वोट देने वाले सभी विधायकों को इस बात के लिए आश्वस्त किया कि उनके विधानसभा क्षेत्र में विकास कार्य प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि और बेहतर होंगे. बहरहाल, इस जीत ने मोहन माझी की उस इमेज को पुख्ता कर दिया है कि वे एक अच्छे राजनेता हैं."

कुछ शुभचिंतक यह भी मानते हैं कि अच्छे राजनेता की इमेज तो पुख्ता हुई है, लेकिन अच्छे प्रशासक की छवि अभी तक नहीं बन पाई है. मंत्रिमंडल पर उनकी पकड़ अभी तक पूरी तरह नहीं हो सकी है, वह अभी प्रोसेस में है. उनके साथी उन्हें वह सम्मान नहीं देते जो देना चाहिए, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें सीएम ने नहीं, बल्कि दिल्ली में बैठे आलाकमान ने व्यवस्था सौंपी है. ऐसे में वे केवल दिल्ली के प्रति जिम्मेदार हैं. शायद यही वजह है कि राज्य के बड़े अस्पताल में आग लगने से 12 लोगों की मौत हो गई, लेकिन घटनास्थल पर पहुंचने और मुआवजा घोषित करने के अलावा वे किसी जिम्मेदार व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं कर सके. जबकि अपनी अथॉरिटी दिखाने का उनके पास यह बड़ा मौका था.

BJP के किसी नेता की सफलता और उसके बारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का विचार क्या है, यह बहुत मायने रखता है. ओडिशा में संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि मोहन माझी की सफलता में उनके खुद से ज्यादा BJD का योगदान है. वह एक ऐसी रीजनल पार्टी है, जहां विचारधारा के बजाय सत्ता का होना 'ग्लू पॉइंट' होता है. जब ग्लू पॉइंट ही खत्म हो गया, तो लोग अब वहां से टूट रहे हैं. खुद को बनाए रखने के लिए वे सत्ता के साथ जुड़ रहे हैं. आप जिस परीक्षा में सफल होने की बात कह रहे हैं, दोनों इसी वजह से सफल हुई हैं. वह आगे कहते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो दूसरी पार्टियों में हो रहा हो और BJP में न हो रहा हो. फर्क बस विचारधारा के प्रति समर्पण का है. BJP संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों की बदौलत ही अलग होती है.

मोहन माझी इसी साल पंचायत चुनाव के रास्ते तीसरी परीक्षा में बैठने जा रहे हैं. यहां बैठने से पहले ही उन्होंने राज्यभर में बड़ी संख्या में पंचायत सदस्यों को BJD से इस्तीफा दिलवाकर BJP में शामिल कराया है. अभियान अब भी जारी है. यही नहीं, पार्टी के अंदर भी सबको लग रहा था कि कम अनुभव वाले मोहन माझी प्रदेश अध्यक्ष मनमोहन सामल, अश्विनी वैष्णव और धर्मेंद्र प्रधान के बीच तालमेल कैसे बिठाएंगे. कुछ मौकों को छोड़ दिया जाए तो यहां भी वह सफल होते दिख रहे हैं.

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