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बच्चे, तीन अच्छे! क्या है मोहन भागवत के बयान के सियासी मायने?

तीन बच्चों की वकालत के जरिए मोहन भागवत ने जनसंख्या, घुसपैठ और पहचान की बहस को आपस में जोड़ दिया है

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मोहन भागवत (फाइल फोटो)
अपडेटेड 26 मार्च , 2026

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने 24 मार्च को वृंदावन में दिए अपने बयान में एक बार फिर ‘तीन बच्चों की नीति’ की वकालत करते हुए अवैध प्रवासन, जनसंख्या संतुलन और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को एक साथ जोड़ दिया. उनके इस बयान ने न सिर्फ जनसंख्या बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थों को लेकर भी नई चर्चा छेड़ दी है.

भागवत वृंदावन के रुक्मिणी विहार में महामंडलेश्वर स्वामी यतींद्रानंद गिरि द्वारा स्थापित 'जीवन दीप आश्रम' के उद्घाटन समारोह में बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे. यहां उन्होंने जो बात कही उसका तर्क मुख्यतौर पर दो स्तरों पर चलता है. पहला, सामाजिक-मानसिक स्तर, जहां वे कहते हैं कि तीन बच्चों वाला परिवार बेहतर सामाजिक समन्वय और सह-अस्तित्व की भावना विकसित करता है.

उनका मानना है कि बचपन में भाई-बहनों के बीच आपसी तालमेल से व्यक्ति में सामंजस्य बैठाने की क्षमता बढ़ती है, जो आगे चलकर पारिवारिक स्थिरता और वैवाहिक जीवन को भी प्रभावित करती है. यह तर्क एक तरह से ‘परिवार आधारित सामाजिक इंजीनियरिंग’ की सोच को दर्शाता है, जहां जनसंख्या सिर्फ संख्या नहीं बल्कि सामाजिक व्यवहार का आधार बन जाती है.

दूसरा स्तर कहीं अधिक राजनीतिक और रणनीतिक है. भागवत ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत को अपनी जनसंख्या नीति की समीक्षा करनी चाहिए और यह आकलन करना चाहिए कि आने वाले 50 वर्षों में जनसंख्या दर का स्वास्थ्य, शिक्षा और संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने दो महत्वपूर्ण कारण भी गिनाए, सीमा पार से अवैध घुसपैठ और ज़बरन धर्मांतरण. यही वह बिंदु है जहां यह मुद्दा महज़ जनसंख्या नियंत्रण या परिवार नियोजन की बहस से आगे बढ़कर पहचान और राजनीति के दायरे में प्रवेश करता है. 

अवैध घुसपैठ पर उनकी सख्त टिप्पणी कि घुसपैठियों को रोजगार न दिया जाए और समाज खुद उनकी पहचान कर प्रशासन को सूचित करे, दरअसल एक सामाजिक भागीदारी वाला सुरक्षा मॉडल पेश करती है. यह मॉडल राज्य और समाज के बीच एक सक्रिय साझेदारी की बात करता है, लेकिन आलोचक इसे सामाजिक अविश्वास और निगरानी की संस्कृति को बढ़ावा देने वाला भी मानते हैं.
टाइमिंग ने बनाया मुद्दा संवेदनशील 

विश्लेषकों का मानना है कि भागवत का यह बयान ऐसे समय आया है जब देश में जनसंख्या वृद्धि दर लगातार घट रही है. भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) कई राज्यों में प्रतिस्थापन स्तर (2.1) से नीचे आ चुकी है. ऐसे में ‘तीन बच्चों’ की बात करना एक अलग संकेत देता है. यह संकेत खास तौर पर उन समुदायों की ओर इशारा करता है जहां जन्म दर अपेक्षाकृत अधिक मानी जाती रही है. 

हालांकि भागवत ने अपने बयान में सभी भारतीयों के साथ समान व्यवहार की बात भी कही, लेकिन ‘घुसपैठ’ और ‘धर्मांतरण’ जैसे संदर्भ इस बहस को संवेदनशील बना देते हैं. राजनीतिक रूप से देखें तो यह बयान सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी (BJP) की दीर्घकालिक वैचारिक रेखा के अनुरूप दिखता है. संघ परिवार लंबे समय से जनसंख्या असंतुलन को एक प्रमुख चिंता के रूप में उठाता रहा है. ऐसे में भागवत की यह टिप्पणी उस विमर्श को फिर से गति देने की कोशिश मानी जा रही है, जो चुनावी राजनीति में समय-समय पर उभरता रहा है.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ‘तीन बच्चों की नीति’ की बात सीधे तौर पर किसी कानून के रूप में लागू करने का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक दिशा तय करने की कोशिश है. भागवत ने खुद भी कहा कि जल्दबाजी में कानून बनाने के बजाय पहले लोगों को समझाने की जरूरत है. इसका मतलब यह हो सकता है कि संघ इस मुद्दे पर सामाजिक सहमति बनाने की दिशा में काम करना चाहता है, ताकि भविष्य में यदि कोई नीति बनाई जाए तो उसे व्यापक समर्थन मिल सके. 

इसके साथ ही, यह बयान उत्तर भारत की राजनीति के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो जाता है, खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में, जहां जनसंख्या और जातीय-सामाजिक समीकरण चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा होते हैं. ऐसे मुद्दे अक्सर ध्रुवीकरण की जमीन तैयार करते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपने समर्थन आधार को मजबूत करने में मदद मिलती है.

जनसंख्या बढ़ाने की नीति पर सवाल 

हालांकि, इस पूरे विमर्श का एक व्यावहारिक पक्ष भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. भारत जैसे देश में, जहां संसाधनों पर पहले से ही दबाव है, वहां जनसंख्या बढ़ाने की नीति को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह एक गंभीर चिंता का विषय है. यही कारण है कि कई अर्थशास्त्री और जनसंख्या विशेषज्ञ ‘जनसंख्या स्थिरीकरण’ को ही बेहतर विकल्प मानते हैं.

दूसरी ओर कम होती जन्म दर को लेकर भागवत की चिंता पूरी तरह निराधार भी नहीं है. दुनिया के कई विकसित देशों, जैसे जापान और यूरोप के कुछ हिस्सों, में घटती जनसंख्या एक बड़ी चुनौती बन चुकी है. वहां कामकाजी उम्र की आबादी घट रही है और बुजुर्गों का अनुपात बढ़ रहा है, जिससे अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ रहा है. इस संदर्भ में भागवत का यह तर्क कि कम प्रजनन दर लंबे समय में जोखिम पैदा कर सकती है, एक वैश्विक प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है.

लेकिन भारत की स्थिति अभी उस स्तर पर नहीं पहुंची है. यहां जनसंख्या का आकार और उसकी विविधता दोनों ही बहुत बड़े हैं. इसलिए किसी एक समान नीति को लागू करना आसान नहीं होगा. यही वजह है कि विशेषज्ञ ‘वन-साइज़-फिट्स-ऑल’ दृष्टिकोण से बचने की सलाह देते हैं और क्षेत्रीय तथा सामाजिक भिन्नताओं को ध्यान में रखने की बात करते हैं.

धर्मांतरण पर भागवत की टिप्पणी भी इस पूरे विमर्श को और जटिल बना देती है. उन्होंने कहा कि भारत में रहने वाले सभी लोग मूल रूप से हिंदू हैं और जो लोग वापस लौटना चाहते हैं, उनका स्वागत किया जाना चाहिए. यह बयान संघ की उस विचारधारा को दर्शाता है, जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित है. लेकिन आलोचकों के लिए यह बयान धार्मिक पहचान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सवाल खड़े करता है.

कुल मिलाकर, मोहन भागवत का ‘तीन बच्चों की नीति’ पर जोर केवल एक सामाजिक सलाह नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक वैचारिक और राजनीतिक सोच काम कर रही है. यह सोच जनसंख्या, पहचान, सुरक्षा और सामाजिक संरचना को एक साथ जोड़ती है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह विमर्श किस दिशा में आगे बढ़ता है, क्या यह सिर्फ एक वैचारिक बहस तक सीमित रहता है या फिर नीति निर्माण और चुनावी राजनीति में भी इसका ठोस रूप देखने को मिलता है.

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