राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत का लखनऊ प्रवास इस बार महज़ एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा. 18 और 19 फरवरी को राजधानी में उनकी मौजूदगी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उपमुख्यमंत्रियों केशव प्रसाद मौर्य तथा ब्रजेश पाठक से अलग अलग मुलाकातों ने सियासी हलकों में कई तरह की अटकलों को जन्म दिया है.
आधिकारिक तौर पर इन्हें शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन जिस राजनीतिक समय में ये बैठकें हुईं, उसने इनके मायनों को कहीं अधिक व्यापक बना दिया है. भागवत दो दिन के प्रवास पर लखनऊ पहुंचे थे. यह दौरा संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों की पृष्ठभूमि में चल रहे आउटरीच अभियान का हिस्सा था.
राजधानी में उन्होंने संगठन के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कीं, सामाजिक समरसता पर भाषण दिया और इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जातिगत भेदभाव को अप्रासंगिक बताया. उन्होंने साफ कहा कि छुआछूत जैसी कुरीतियों का आधुनिक समाज में कोई स्थान नहीं है. संघ के “पंच परिवर्तन” अभियान के तहत सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, कर्तव्य बोध, पारिवारिक मूल्यों और स्वदेशी को केंद्र में रखने की बात दोहराई गई. ऐसे में राज्य के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के साथ उनकी मुलाकात को केवल औपचारिक मान लेना सहज नहीं है.
18 फरवरी की शाम निराला नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में योगी आदित्यनाथ ने भागवत से करीब 30 से 40 मिनट की बैठक की. तीन महीने पहले अयोध्या में हुई पिछली मुलाकात के बाद यह अगली अहम बातचीत थी. राजनीतिक विश्लेषक इसे 2027 विधानसभा चुनावों की तैयारी के शुरुआती संकेत के रूप में देख रहे हैं. अगले वर्ष की शुरुआत में चुनावी तापमान बढ़ने की उम्मीद है. BJP संगठन और सरकार दोनों चुनावी मोड में आने की तैयारी कर रहे हैं. ऐसे में संघ नेतृत्व के साथ सीधी बातचीत का अपना महत्व है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में बूथ स्तर पर कैडर की सक्रियता में संघ की भूमिका ऐतिहासिक रूप से अहम रही है.
दिलचस्प यह भी रहा कि अगले दिन 19 फरवरी को भागवत ने दोनों उपमुख्यमंत्रियों से अलग अलग मुलाकात की. पहले केशव प्रसाद मौर्य पहुंचे और करीब आधे घंटे तक बातचीत चली. उसके बाद ब्रजेश पाठक से भी भेंट हुई. तीनों शीर्ष नेताओं से अलग अलग मुलाकात ने राजनीतिक संदेशों की परतें और गहरी कर दीं. मौर्य और योगी के बीच असहज संबंध को लेकर पिछले कुछ समय से चर्चा रही है. 2017 में जब BJP को प्रचंड बहुमत मिला था, तब मौर्य को मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जा रहा था, लेकिन आखिरकार योगी आदित्यनाथ को जिम्मेदारी मिली. 2022 में मौर्य अपनी सिराथू सीट हार गए, फिर भी उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाए रखना पार्टी के भीतर संतुलन साधने की रणनीति के रूप में देखा गया.
2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में BJP के प्रदर्शन को लेकर उठे सवालों के बीच मौर्य का यह बयान कि “पार्टी सरकार से बड़ी है” सियासी हलकों में काफी चर्चा का विषय बना था. ऐसे परिदृश्य में भागवत का उनसे अलग से मिलना संगठन और सरकार के बीच संवाद की निरंतरता का संकेत भी माना जा रहा है और आंतरिक समीकरणों को संतुलित रखने की कवायद भी.
ब्रजेश पाठक की भागवत से मुलाकात भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण रही. उसी सुबह पाठक ने अपने आवास पर 101 बटुक ब्राह्मणों का सम्मान किया, तिलक लगाया और पुष्पवर्षा की. उनका यह कदम ऐसे समय आया जब राज्य में ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है. हाल के महीनों में जाति आधारित राजनीति का स्वर ऊंचा हुआ है. समाजवादी पार्टी ने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया है. BJP पर कुछ वर्गों की अनदेखी का आरोप लगाया गया है. ऐसे में सामाजिक समरसता का संघ का संदेश और ब्राह्मण प्रतीकों के साथ दिखती सक्रियता, दोनों मिलकर एक व्यापक सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश का हिस्सा माने जा रहे हैं.
भागवत के प्रवास का समय भी गौर करने वाला है. हाल में प्रयागराज के माघ मेले के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के विरोध प्रदर्शन ने सरकार को असहज स्थिति में ला दिया था. त्रिवेणी संगम में डुबकी को लेकर विवाद ने विपक्ष को हमला करने का मौका दिया. समाजवादी पार्टी ने खुलकर संत के समर्थन में बयान दिए. BJP नेतृत्व ने हालात को शांत करने की कोशिश की. ऐसे मुद्दों पर संघ और सरकार के बीच दृष्टिकोण का तालमेल बनाए रखना राजनीतिक रूप से अहम हो जाता है. इसी तरह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के जाति भेदभाव संबंधी दिशा निर्देशों को लेकर राज्य में उभरे विरोध ने भी सामाजिक समीकरणों को प्रभावित किया. उच्च जातियों के बीच असंतोष की खबरें आईं.
संघ लंबे समय से सामाजिक समरसता की बात करता रहा है, लेकिन वह जातीय असंतोष को राजनीतिक अस्थिरता में बदलने से रोकने की रणनीति पर भी जोर देता है. भागवत के भाषणों में जातिगत भेदभाव को अप्रासंगिक बताने का संदेश इसी व्यापक पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है. कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा के मुद्दे पर भी चर्चा होने की बात सामने आई. राज्य में रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध तरीके से बसाने वालों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सरकार का रुख सख्त रहा है. संघ नेतृत्व की तरफ से इसे सामाजिक स्थिरता के संदर्भ में जरूरी बताया जाना, सरकार की नीति को वैचारिक समर्थन देने के रूप में देखा जा सकता है.
उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है. लोकसभा की सबसे अधिक सीटें यहीं से आती हैं. 2024 के आम चुनाव में BJP को यहां अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जिससे विपक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली. अब 2027 का विधानसभा चुनाव BJP के लिए प्रतिष्ठा का सवाल होगा. ऐसे में संघ और BJP के बीच तालमेल का मजबूत संदेश देना राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि संघ का शताब्दी वर्ष अभियान भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है. संगठन सामाजिक पहुंच बढ़ाने, परिवार आधारित संवाद और घर घर संपर्क पर जोर दे रहा है. कैडर एक्टिवेशन, बूथ स्तर पर नेटवर्क सुदृढ़ करना और विचारधारा को रोजमर्रा के मुद्दों से जोड़ना उसकी प्राथमिकताओं में शामिल है. उत्तर प्रदेश में यह अभियान चुनावी तैयारी के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ जाता है. ऐसे में भागवत का यह दौरा केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी दौर की भूमिका लेखन के रूप में भी देखा जा रहा है. 2027 की राह नजदीक आ रही है और उसकी तैयारी का प्रारंभिक खाका शायद लखनऊ के इन्हीं बंद कमरों में तैयार होना शुरू हो चुका है.

