उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव से पहले ग्रामीण राजनीति एक बार फिर केंद्र की योजनाओं के इर्द-गिर्द सिमटती दिख रही है. इस बार टकराव का केंद्र है मनरेगा बनाम ‘विकसित भारत–जी राम जी’ योजना. एक तरफ कांग्रेस इसे गरीबों के अधिकार पर हमला बताकर सड़क से सदन तक संघर्ष की तैयारी में है, तो दूसरी तरफ योगी सरकार इसे रोजगार और आजीविका के विस्तार की नई शुरुआत बताकर गांव-गांव पहुंचाने में जुट गई है. पंचायत चुनाव की आहट के बीच यह टकराव सिर्फ योजनाओं का नहीं, बल्कि राजनीतिक पकड़ और ग्रामीण वोट बैंक का है.
कांग्रेस का दांव : मनरेगा बचाओ, गांव जोड़ो
कांग्रेस कार्य समिति की 27 दिसंबर की बैठक में यह साफ हो गया कि पार्टी मनरेगा को सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि राजनीतिक मुद्दा बनाएगी. पांच जनवरी से देशव्यापी ‘मनरेगा बचाओ अभियान’ की घोषणा उसी रणनीति का हिस्सा है. कांग्रेस का आरोप है कि सरकार मनरेगा का नाम और स्वरूप बदलकर एक अधिकार आधारित कानून को कमजोर कर रही है. पार्टी का कहना है कि जैसे तीन कृषि कानूनों को किसान आंदोलन के दबाव में वापस लिया गया, वैसे ही सरकार को इस फैसले पर भी पीछे हटने को मजबूर किया जाएगा.
उत्तर प्रदेश में यह अभियान कांग्रेस के लिए और भी अहम है. 2027 में विधानसभा चुनाव से पहले 2026 के पंचायत चुनाव में पार्टी को अपनी अहमियत दिखानी होगी. 2021 के पंचायत चुनावों में जिला पंचायत की 75 में से 67 सीटों पर BJP का कब्जा रहा, समाजवादी पार्टी को पांच और कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली. ऐसे में कांग्रेस का मानना है कि मनरेगा जैसे मुद्दे के जरिए वह ग्रामीण गरीबों, मजदूरों और महिलाओं के बीच दोबारा संवाद बना सकती है.
यूपी कांग्रेस के मीडिया विभाग के वाइस चेयरमैन मनीष हिंदवी कहते हैं, “मनरेगा केवल रोजगार योजना नहीं है. यह ग्रामीण गरीबों की आजीविका और सम्मान से जुड़ा अधिकार है. सरकार नाम बदलने के बहाने इस अधिकार पर हमला कर रही है. कांग्रेस इसे बर्दाश्त नहीं करेगी.” उनके मुताबिक अभियान के तहत निरंतर आंदोलन होगा और सरकार के खिलाफ सड़क से सदन तक संघर्ष किया जाएगा. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस की रणनीति भावनात्मक अपील पर टिकी है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक विनम्र वीर सिंह कहते हैं, “कांग्रेस मनरेगा को गांधी से जोड़कर एक नैरेटिव बना रही है. पार्टी जानती है कि ग्रामीण गरीबों में मनरेगा को लेकर एक भावनात्मक जुड़ाव है. इसे तोड़ना BJP के लिए आसान नहीं होगा.”
योगी सरकार की काट : 'जी राम जी' का आक्रामक प्रचार
कांग्रेस के अभियान से पहले ही योगी सरकार ने अपने कदम तेज कर दिए हैं. संसद से मंजूरी मिलने के एक हफ्ते बाद 26 दिसंबर को ‘विकसित भारत–रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी VB-G-RAM-G का व्यापक प्रचार शुरू कर दिया गया. राज्य ग्रामीण विकास विभाग ने सभी 58,000 ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभाएं आयोजित कीं.
इन सभाओं में SC/ST, महिलाओं और कमजोर वर्गों को नई योजना की जानकारी दी गई. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य खुद श्रावस्ती के बाघा गांव में ग्राम सभा में मौजूद रहे. यह संदेश साफ था कि सरकार इस योजना को सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि इसे राजनीतिक रूप से भी मजबूत करना चाहती है.
सरकार का दावा है कि जी राम जी योजना मनरेगा से बेहतर है. रोजगार की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रावधान, प्रशिक्षण और आजीविका से जोड़ने की बात, और चौपालों के जरिए संवाद इसकी प्रमुख विशेषताएं बताई जा रही हैं. प्रमुख सचिव ग्रामीण विकास सौरभ बाबू के निर्देशों में यह भी साफ है कि ग्राम सभाओं की जियोटैग तस्वीरें, होर्डिंग्स और मोबाइल एप पर अपलोडिंग तक की व्यवस्था की गई है. यानी योजना के प्रचार में तकनीक और प्रशासन दोनों का पूरा इस्तेमाल. BJP के एक वरिष्ठ नेता गिरिजाशंकर गुप्ता कहते हैं, “विपक्ष नाम को लेकर राजनीति कर रहा है. असल मुद्दा यह है कि हम रोजगार के दिन बढ़ा रहे हैं और योजना को ज्यादा प्रभावी बना रहे हैं. गांव का आदमी काम चाहता है, नाम नहीं.”
पंचायत चुनाव और ग्रामीण गणित
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव का पैमाना विशाल है. 12 करोड़ से ज्यादा मतदाता, 8 लाख से अधिक पद, और गांव से जिला स्तर तक सत्ता की बिसात. 2021 के चुनावों में BJP ने यह साबित कर दिया कि वह बिना आधिकारिक पार्टी सिंबल के भी अपने समर्थित उम्मीदवारों को जितवा सकती है. महामारी के बावजूद संगठनात्मक ताकत और सरकारी योजनाओं की पहुंच ने BJP को बढ़त दिलाई.
अब कांग्रेस इस समीकरण को तोड़ना चाहती है. मनरेगा बचाओ अभियान के जरिए पार्टी गांव-गांव जाकर यह संदेश देना चाहती है कि BJP गरीबों के हक छीन रही है. दूसरी तरफ BJP 'जी राम जी' योजना के जरिए यह दिखाने में जुटी है कि वह रोजगार के नए अवसर दे रही है. राजनीतिक विश्लेषक विनम्र वीर सिंह मानते हैं कि यह टकराव सीधे पंचायत चुनाव को प्रभावित करेगा, “पंचायत चुनाव में स्थानीय मुद्दे अहम होते हैं, लेकिन सरकारी योजनाओं की छवि भी बड़ा रोल निभाती है. अगर BJP यह साबित कर देती है कि नई योजना से ज्यादा काम और फायदा मिल रहा है, तो कांग्रेस का नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है.”
नाम बदलने की राजनीति या संरचनात्मक बदलाव
विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने महात्मा गांधी का नाम हटाकर एक प्रतीकात्मक राजनीति की है. कांग्रेस इसे BJP-RSS की उस सोच से जोड़ रही है, जिसमें गांधीवादी विचारधारा को हाशिये पर रखा जाता है. वहीं सरकार का तर्क है कि यह सिर्फ नाम नहीं, बल्कि कानून और संरचना में बदलाव है.
लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री राजेश्वर कुमार कहते हैं, “ग्रामीण समाज में मनरेगा एक परिचित नाम है. अचानक बदलाव से भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है. सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि लोगों को लगे कि उनका अधिकार सुरक्षित है. सिर्फ पोस्टर और बैनर से यह भरोसा नहीं बनेगा.”
कांग्रेस की चुनौती : संगठन और विश्वसनीयता
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसका कमजोर संगठन है. पिछले कुछ वर्षों में पार्टी ग्रामीण स्तर पर अपनी पकड़ खो चुकी है. मनरेगा बचाओ अभियान तभी असरदार होगा जब पार्टी के कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों से संवाद करें. सिर्फ बयानबाजी से BJP के मजबूत संगठन का मुकाबला मुश्किल है. कांग्रेस से जुड़े एक रणनीतिकार मानते हैं, “हम जानते हैं कि राह कठिन है. लेकिन मनरेगा जैसे मुद्दे पर हमें गांव में सुनवाई मिल सकती है. पंचायत चुनाव हमारे लिए संगठन को फिर से खड़ा करने का मौका है.”
BJP का भरोसा : शासन और संसाधन
BJP को अपने शासन रिकॉर्ड और संसाधनों पर भरोसा है. जी राम जी योजना के प्रचार में जिस तरह सरकारी मशीनरी सक्रिय है, उससे साफ है कि पार्टी इसे पंचायत चुनाव का बड़ा हथियार बनाना चाहती है. चौपाल, ग्राम सभा, पोस्टर, रेलवे स्टेशन और बस अड्डों तक प्रचार, यह सब एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा है. राजनीतिक विश्लेषक आजाद प्रताप सिंह कहते हैं, “BJP की ताकत यह है कि वह योजनाओं को चुनावी नैरेटिव में बदलने में माहिर है. उज्ज्वला, आवास, शौचालय के बाद अब रोजगार का मुद्दा है. अगर लाभार्थी संतुष्ट रहे, तो विपक्ष का विरोध सीमित रह जाएगा.”
पंचायत चुनाव से पहले मनरेगा बनाम जी राम जी की यह जंग और तेज होगी. कांग्रेस इसे गरीबों के अधिकार की लड़ाई बताकर सड़क पर उतरेगी, जबकि BJP इसे विकास और रोजगार का नया मॉडल बताकर गांव-गांव पहुंचाएगी. असली परीक्षा तब होगी जब ग्रामीण मतदाता यह तय करेंगे कि उनके लिए क्या ज्यादा मायने रखता है, परिचित अधिकार या नया वादा. एक बात तय है कि यह टकराव सिर्फ योजनाओं का नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की ग्रामीण राजनीति की दिशा तय करने वाला होगा. पंचायत चुनाव के नतीजे यह संकेत देंगे कि गांव का मिजाज किसके साथ है और 2027 की सियासत का रास्ता किस ओर मुड़ेगा.

