कबीर दास का एक बड़ा मारक दोहा है - बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर. कमोबेश यही बात ताड़ के पेड़ (पाम ट्री) पर भी लागू होती है. लेकिन अब इसी गुण (ऊंचाई) के कारण ताड़ के पेड़ ओडिशा के लोगों के लिए जीवन रक्षक बन कर सामने आए हैं.
दरअसल, ओडिशा सरकार ने राज्य भर में करीब 20 लाख ताड़ के पेड़ों को लगाने का काम शुरू किया है, ताकि लोगों को लगातार गिरती बिजली से होने वाली दुर्घटनाओं से बचाया जा सके. अब सवाल है कि ताड़ के पेड़ इसमें कैसे मदद कर सकते हैं, और क्या वाकई राज्य के लोगों का बिजली गिरने की घटनाओं से बुरा हाल है?
अगस्त की 18 तारीख को राज्य के राजस्व और आपदा प्रबंधन मंत्री सुरेश पुजारी ने एएनआई से बातचीत में बताया कि ओडिशा बिजली गिरने की घटनाओं से गंभीर रूप से प्रभावित राज्यों में से एक है और ताड़ के पेड़ लगाने से इन आपदाओं से बचाव होगा.
पुजारी ने कहा, "राज्य वन विभाग ने पूरे राज्य में 20 लाख ताड़ के पेड़ लगाने शुरू कर दिए हैं. हमारा इरादा इसे पूरे राज्य में करने का है और संवेदनशील जगहों जैसे स्कूलों पर खास ध्यान केंद्रित करना है. हमें उम्मीद है कि हमारी इन कोशिशों से लोगों की जान जाने की संख्या में कमी आएगी और आखिरकार इसे शून्य पर लाया जा सकेगा." ओडिशा सरकार ने इस प्रस्ताव को पिछले महीने ही मंजूरी दे दी थी.
ओडिशा में बिजली गिरने की घटनाएं खतरनाक रूप से कितनी असरकारी हैं इस बात को ऐसे भी समझा जा सकता है कि साल 2015 में सूबे की सरकार ने इसे राज्य की विशिष्ट आपदा करार दिया था. पिछले 11 सालों की बात करें तो राज्य में बिजली गिरने से कुल 3,790 लोगों की जान जा चुकी है. इनमें से अकेले 791 लोगों की जान तो पिछले तीन सालों में गई है. यह बताता है कि राज्य में बिजली गिरने या वज्रपात की घटनाओं में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है.
इन बढ़ती घटनाओं की तस्दीक इस बात से भी होती है कि बीते साल 2 सितंबर को महज दो घंटे के अंतराल में ही 61,000 बार यह आसमानी आफत ओडिशा की धरती से टकराई. इसका नतीजा यह हुआ कि कम से कम 12 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक विशेष राहत आयुक्त कार्यालय ने बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 में बिजली गिरने से जहां 282 लोगों की मौत हुई, वहीं 2022-23 में यह आंकड़ा 297 रहा जबकि 2023-24 में कुल 212 लोगों की मौत हुई.
इस प्राकृतिक आपदा के कारण मौतों की सबसे ज्यादा घटनाएं मयूरभंज, क्योंझर, बालासोर, भद्रक, गंजम, ढेंकनाल, कटक, सुंदरगढ़, कोरापुट और नबरंगपुर जैसे जिलों में हुईं. साल 2015 से ही राज्य की विशिष्ट आपदा घोषित होने के बाद राज्य सरकार इस आपदा से होने वाली मौतों के लिए 4 लाख रुपये की अनुग्रह राशि देती है.
विशेष राहत आयुक्त कार्यालय ने इस प्रस्तावित योजना के लिए 7 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं. राज्य ने मौजूदा ताड़ के पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया है और शुरुआत में जंगलों की सीमाओं पर 19 लाख ताड़ के पेड़ लगाए जाएंगे.
बिजली गिरने के लिए ओडिशा क्यों हैं अतिसंवेदनशील?
इससे पहले कि सवाल पर आएं, आइए संक्षेप में समझते हैं कि बिजली गिरना क्या होता है. सरल शब्दों में कहें तो बिजली गिरने की घटना एक तरह से वायुमंडल में एक बड़े पैमाने पर और काफी तेज गति से इलेक्ट्रिसिटी का डिस्चार्ज होना होता है, और जिनमें से कुछ धरती की तरफ भी चली आती हैं. यह बिजली बहुत गर्म होती है, और इसका एक ही झटका आसपास की हवा को 30,000°C तक गर्म कर सकता है. इस गर्मी के कारण आसपास की हवा तेजी से फैलती और कंपन करती है, जिससे गड़गड़ाहट पैदा होती है और जिसे हम बिजली चमकने के बाद सुनते हैं.
ओडिशा उष्णकटिबंधीय क्षेत्र (भूमध्य रेखा के आसपास कर्क और मकर रेखा के बीच का क्षेत्र) में स्थित एक पूर्वी तटीय राज्य है जहां की गर्म, शुष्क जलवायु बिजली गिरने के लिए सही परिस्थितियां निर्मित करती हैं. क्लाइमेट रेजिलिएंट ऑब्जर्विंग सिस्टम्स प्रमोशन काउंसिल (सीआरओपीसी) और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) द्वारा प्रकाशित वार्षिक लाइटनिंग रिपोर्ट 2023-2024 के मुताबिक, पूर्वी और मध्य भारत में बादल से बिजली गिरने (क्लाउड टू लाइटनिंग या सीजी) की सबसे अधिक घटनाएं होती हैं.
साल 2021 में प्रकाशित आईएमडी का एक शोध पत्र बिजली गिरने की घटनाओं में बढ़ोत्तरी के लिए ग्लोबल वार्मिंग की भूमिका को भी जाहिर करता है. इसके मुताबिक अगर वैश्विक तापमान में एक डिग्री सेल्सियस की बढ़ोत्तरी होती है, तो इसके परिणामस्वरूप बिजली गिरने की संख्या में भी करीब 10 फीसद तक की बढ़ोत्तरी होती है.
फकीर मोहन विश्वविद्यालय, बालासोर में भूगोल के प्रोफेसर मनोरंजन मिश्रा इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताते हैं कि ओडिशा अपने "जलवायु कारकों के जटिल कॉम्बिनेशन की वजह से एक विशेष रूप से अतिसंवेदनशील राज्य है, जो प्री-मॉनसून और मॉनसून के दौरान समुद्र के तापमान और वायुमंडल की संवहनीय ऊर्जा से प्रभावित चक्रवातों सहित बिजली गिरने की घटना को प्रभावित करता है."
वायुमंडल की संवहनीय ऊर्जा हवा की गति के माध्यम से ऊष्मा और नमी का स्थानांतरण है. यह प्रक्रिया वायुमंडल में ऊष्मा, नमी और गति का संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है और यह ऊष्मा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए जिम्मेदार है.
ताड़ के पेड़ बिजली से कैसे रक्षा कर सकते हैं?
दरअसल, ताड़ के पेड़ अन्य पेड़ों के मुकाबले अपनी ऊंचाई के चलते बिजली के कंडक्टर के रूप में उपयुक्त होते हैं. इनमें बेहतर नमी और रस होता है जो बिजली को अपनी तरफ आकर्षित करता है. ये बिजली को अवशोषित कर सकते हैं और इस तरह धरती पर इसके डायरेक्ट प्रभाव को कम कर सकते हैं.
हालांकि विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव के बारे में चिंता जताई है और उचित डेटा एनालिसिस के आधार पर अधिक व्यापक और जमीनी रणनीति की मांग की है. विशेषज्ञों का कहना है कि ताड़ के पेड़ को 20 फीट की ऊंचाई हासिल करने में कम से कम 15 से 20 साल लगते हैं. ऐसी भी चिंता है कि बिजली गिरने के बाद कुछ पेड़ों में आग लग सकती है.
बिजली गिरने से सबसे ज्यादा प्रभावित ग्रामीण क्षेत्र के लोग
बिजली गिरने से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले ओडिशा के ग्रामीण क्षेत्र के लोग हैं. इन क्षेत्रों में करीब 96 फीसद बिजली गिरने की घटनाएं होती हैं, और किसान और खेतिहर मजदूर जैसे दिहाड़ी लोग इसका खामियाजा भुगतते हैं. ओडिशा की 80 फीसद से अधिक आबादी खेती और अन्य संबद्ध गतिविधियों पर निर्भर है, और खुले खेतों में लंबे समय तक काम करती है. यह भी एक कारण है जिससे बिजली गिरने के दौरान उनके हताहत होने की आशंका बढ़ जाती है .

